तालिबान का दिल्ली में बड़ा धमाका: ‘भारत और हमारा डीएनए एक’, पाकिस्तान की रणनीतिक हार!

काबुल की शतरंज पर भारत की सधी हुई चाल

सन्नाटा, खौफ और बेबसी—जब पाकिस्तान ने रात के अंधेरे में लाखों अफगानों को उनके घरों से बेदखल कर दिया, तब दुनिया देख रही थी कि कैसे एक देश अपने ही ‘मजहबी भाईचारे’ के दावों की धज्जियां उड़ा रहा है। लेकिन इसी बीच दिल्ली की धरती से एक ऐसी आवाज आई जिसने इस्लामाबाद के होश उड़ा दिए। तालिबान सरकार के एक मंत्री ने खुलेआम कह दिया कि भारत और अफगानिस्तान का डीएनए एक है। यह महज एक बयान नहीं था, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की उस गुप्त कूटनीति का नतीजा है, जिसने अफगानिस्तान में पाकिस्तान के दशकों पुराने प्रभुत्व को खत्म कर दिया है। क्या डोभाल ने अमेरिका के जाने से पहले ही कतर में ऐसी कोई डील कर ली थी जिससे आज काबुल, रावलपिंडी के बजाय दिल्ली की सुन रहा है?

आज हम उस भू-राजनीतिक खेल को समझेंगे जहां मोहरे भले ही पाकिस्तान के थे, लेकिन शह और मात भारत की है। अगस्त 2021 में जब अमेरिकी सेना अफगानिस्तान छोड़ रही थी, तब आईएसआई प्रमुख फैज हमीद काबुल में चाय पीते हुए मुस्कुरा रहे थे। उन्हें लगा कि अफगानिस्तान अब पाकिस्तान की कठपुतली बनेगा। लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि भारत ने सालों पहले ही वहां अपनी जमीन मजबूत कर ली थी।

डोभाल की ‘बैक-चैनल’ डिप्लोमेसी और तालिबान में विभाजन

भले ही भारत ने आधिकारिक तौर पर तालिबान सरकार को मान्यता न दी हो, लेकिन खुफिया स्तर पर ‘रॉ’ और भारतीय रणनीतिकारों ने बहुत पहले ही भविष्य की तैयारी कर ली थी। भारत जानता था कि तालिबान कोई एक संगठित गुट नहीं है।

तालिबान के भीतर दो बड़े धड़े हैं—एक हक्कानी नेटवर्क (जो पाकिस्तान का वफादार है) और दूसरा कंधारी या राष्ट्रवादी धड़ा (जिसमें मुल्ला बरादर और स्टेनकजई जैसे नेता हैं)। भारत ने बड़ी चतुराई से राष्ट्रवादी धड़े के साथ संबंध बनाए। भारत का संदेश साफ था: यदि अफगानिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता और आर्थिक स्थिरता चाहिए, तो उसे पाकिस्तान की गुलामी छोड़नी होगी। आज काबुल में वही धड़ा प्रभावी है जो पाकिस्तान के हस्तक्षेप के सख्त खिलाफ है।

मोदी का ग्लोबल ट्रायंगल: इजरायल, रूस और भारत

भारत ने अफगानिस्तान के चारों ओर एक ऐसा कूटनीतिक कवच बनाया है जिसे तोड़ना पाकिस्तान के लिए असंभव है। इसमें प्रधानमंत्री मोदी ने इजरायल और रूस को एक साथ जोड़कर एक ‘रणनीतिक ट्रायंगल’ तैयार किया है।

इजरायल के पास रेगिस्तानी खेती और जल प्रबंधन की बेहतरीन तकनीक है, जिसकी अफगानिस्तान को सख्त जरूरत है। भारत के जरिए यह तकनीक भविष्य में अफगानिस्तान पहुंच सकती है, जिससे वहां की भुखमरी खत्म होगी। जब अफगान युवा आत्मनिर्भर होंगे, तो वे पाकिस्तान के आतंकी शिविरों की ओर नहीं देखेंगे। भारत खाद्य सुरक्षा के जरिए आतंकवाद की जड़ पर प्रहार कर रहा है।

वहीं, रूस के साथ मिलकर भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि अफगानिस्तान में नए आतंकी गुट न पनपें। मॉस्को फॉर्मेट के जरिए भारत ने तालिबान को आर्थिक मदद और ऊर्जा सुरक्षा के रास्ते दिखाए हैं, ताकि उसकी पाकिस्तान के बंदरगाहों और ईंधन पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाए।

‘स्ट्रैटेजिक डेप्थ’ बनी पाकिस्तान की ‘डेथ’

पाकिस्तान की सेना ने दशकों से ‘स्ट्रैटेजिक डेप्थ’ की थ्योरी पाल रखी थी कि अफगानिस्तान उनका पिछवाड़ा बनेगा। लेकिन आज यही थ्योरी उनके लिए जी का जंजाल बन गई है।

जिन आतंकियों को पाकिस्तान ने पाला, वही टीटीपी (TTP) के रूप में आज पाकिस्तान पर हमले कर रहे हैं। डूरंड लाइन पर बाड़ लगाने को लेकर तालिबान और पाकिस्तानी सेना के बीच अक्सर झड़पें होती हैं। जिस तालिबान को पाकिस्तान अपना गुलाम समझता था, आज वही उसे घुटने टेकने पर मजबूर कर रहा है।

‘साझा डीएनए’ और ‘टू-नेशन थ्योरी’ का अंत

तालिबान के कृषि मंत्री मौलवी अताउल्लाह ओमरी का दिल्ली में यह कहना कि ‘भारत और हमारा डीएनए एक है’, पाकिस्तान की विचारधारा पर सबसे बड़ी चोट है।

एक कट्टर इस्लामी शासन के मंत्री का हिंदू बहुल भारत में आकर ऐसी बात कहना पाकिस्तान के उस प्रोपेगैंडा को ध्वस्त करता है, जो वह कश्मीर और मजहब के नाम पर फैलाता है। यह बयान साबित करता है कि अफगानिस्तान अब जान चुका है कि पाकिस्तान सिर्फ धर्म का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करता है।

पाकिस्तान की क्रूरता बनाम भारत का मानवीय हाथ

अपनी रणनीतिक हार से बौखलाया पाकिस्तान अब निहत्थे अफगान शरणार्थियों पर जुल्म कर रहा है। अक्टूबर 2023 से अब तक पाकिस्तान ने करीब 25 लाख अफगानों को जबरन देश से निकाल दिया है।

पाकिस्तानी पुलिस आधी रात को शरणार्थियों के घरों में घुसती है, उनके दस्तावेज फाड़ देती है और उनकी जीवन भर की कमाई लूट ली जाती है। संयुक्त राष्ट्र ने भी इस पर गहरी चिंता जताई है।

लेकिन इस संकट में भारत एक सच्चे मित्र की तरह सामने आया। भारत ने तुरंत टेंट, दवाइयां और राहत सामग्री की बड़ी खेप काबुल भेजी। जब पाकिस्तान अफगानों के घर तोड़ रहा था, तब भारत उनके लिए छतों का इंतजाम कर रहा था। सोशल मीडिया पर आज अफगान नागरिक ‘थैंक यू इंडिया’ के नारों से भारत का आभार जता रहे हैं।

सॉफ्ट पावर की असली ताकत

अफगान एक्टिविस्ट्स अब खुलकर कह रहे हैं कि पाकिस्तान ने उन्हें सिर्फ तबाही और दर्द दिया है, जबकि भारत ने हमेशा सम्मान और विकास में साथ दिया। मजहब के नाम पर पाकिस्तान अब उन्हें गुमराह नहीं कर सकता।

चाबहार पोर्ट: पाकिस्तान का आर्थिक बहिष्कार

पाकिस्तान हमेशा अफगानिस्तान को ट्रांजिट रूट के लिए ब्लैकमेल करता था। जब भारत ने गेहूं भेजना चाहा, तो पाकिस्तान ने अड़ंगा लगाया।

लेकिन मोदी सरकार ने ईरान के चाबहार पोर्ट और जरंज-डेलाराम हाईवे के जरिए एक नया रास्ता खोल दिया। अब अफगानिस्तान का व्यापार सीधे समुद्र के रास्ते भारत और दुनिया से होता है। इससे पाकिस्तान को करोड़ों डॉलर का नुकसान हुआ है और उसकी अहमियत खत्म हो गई है।

निर्माण बनाम विनाश: भारत का स्पष्ट विजन

भारत ने अफगानिस्तान में 3 बिलियन डॉलर का निवेश करके स्कूल, अस्पताल और डैम बनाए हैं।

काबुल का संसद भवन, हेरात का सलमा डैम (भारत-अफगान मैत्री बांध) और इंदिरा गांधी बाल चिकित्सालय—ये भारत के प्यार के प्रतीक हैं। वहीं पाकिस्तान ने वहां सिर्फ बारूद और नफरत भेजी।

यही फर्क है कि आज तालिबान के नेता भारत को अपना ‘डीएनए पार्टनर’ बताते हैं। पाकिस्तान के एक्सपर्ट्स अब टीवी पर बैठकर अपनी विफलता पर आंसू बहा रहे हैं।

भारत की नीति स्पष्ट है: अफगानिस्तान की संप्रभुता का सम्मान और विकास। आज बिना एक भी गोली चलाए, भारत ने अफगानिस्तान के दिल में जगह बना ली है और पाकिस्तान को पूरी तरह अलग-थलग कर दिया है।

क्या आपको लगता है कि पाकिस्तान अपनी इन गलतियों से कभी उबर पाएगा? अफगानिस्तान में भारत की इस बड़ी जीत पर आपकी क्या राय है? कमेंट में जरूर बताएं।

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