वैश्विक रक्षा बाजार में भारत की नई ताकत का उदय
आज के दौर में दुनिया के डिफेंस मार्केट में सिर्फ एक ही नाम की गूंज सुनाई दे रही है – ‘अस्त्र’ मिसाइल। भारत की यह स्वदेशी बियॉन्ड विजुअल रेंज (BVR) एयर-टू-एयर मिसाइल अब केवल भारतीय वायुसेना का गौरव नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन का एक प्रमुख केंद्र बन चुकी है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देखें तो एक तरफ अमेरिका की महंगी एमराम (AMRAAM) मिसाइलें हैं, जिनके साथ वॉशिंगटन कड़ी शर्तें थोपता है। दूसरी तरफ चीन की PL-15 मिसाइल है, जिसकी विश्वसनीयता पर कोई भी गंभीर देश भरोसा नहीं कर पा रहा। वहीं, रूस की R-77 मिसाइल की आपूर्ति यूक्रेन संकट के कारण बुरी तरह प्रभावित हुई है।
ऐसी चुनौतीपूर्ण स्थिति में कई देशों के सामने संकट था कि वे अपने बेशकीमती लड़ाकू विमानों की मारक क्षमता को कैसे बनाए रखें। ठीक इसी समय भारत ने ‘अस्त्र’ मिसाइल को एक गेमचेंजर के रूप में दुनिया के सामने पेश किया। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, इस समय 6 से अधिक देश अस्त्र मिसाइल खरीदने की दौड़ में शामिल हैं। यह केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं है, बल्कि एक ऐसा भू-राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक है जो आने वाले समय में वैश्विक रक्षा समीकरणों को बदल देगा।
आखिर क्यों अस्त्र मिसाइल बन रही है दुनिया की पहली पसंद?
इस वैश्विक रुझान को समझने के लिए अस्त्र मिसाइल की उन खूबियों को जानना जरूरी है जो सऊदी अरब से लेकर इंडोनेशिया तक को लुभा रही हैं। अस्त्र एक ऐसी अत्याधुनिक मिसाइल है जो पायलट को अपने दुश्मन को देखे बिना ही 100 किलोमीटर से अधिक की दूरी से हवा में ही ढेर करने की ताकत देती है। अस्त्र मार्क-1 की गति मैक 4.5 है, जिसका अर्थ है कि यह ध्वनि की गति से लगभग साढ़े चार गुना तेज रफ़्तार से अपने लक्ष्य पर प्रहार करती है।
इस मिसाइल में उन्नत रडार टर्मिनल गाइडेंस और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटर मेजर (ECCM) तकनीक का उपयोग किया गया है। इसका मतलब है कि अगर दुश्मन का विमान रडार जैमर का उपयोग करता है, तब भी अस्त्र मिसाइल उस बाधा को पार कर अपने लक्ष्य को सटीकता से भेदने में सक्षम है। भारत ने अस्त्र मार्क-2 का भी सफल परीक्षण कर लिया है, जिसकी मारक क्षमता 160 से 200 किलोमीटर तक है।
यह वही मिसाइल है जिसे चीन की लंबी दूरी की PL-15E मिसाइल का सबसे प्रभावी जवाब माना जा रहा है। चीन ने पाकिस्तान को मिसाइलें देकर जो बढ़त बनाने की कोशिश की थी, भारत ने अस्त्र मार्क-2 के जरिए उसे पूरी तरह बेअसर कर दिया है। भविष्य में आने वाली अस्त्र मार्क-3, जो सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) तकनीक पर आधारित होगी, उसकी रेंज 300 किलोमीटर से अधिक होगी। ऐसे में दुनिया का इसकी ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है।
सऊदी अरब का अमेरिका को कूटनीतिक संकेत
सऊदी अरब ने भारत की अस्त्र मिसाइल में रुचि दिखाकर अमेरिकी रक्षा मुख्यालय ‘पेंटागन’ की चिंता बढ़ा दी है। सऊदी रॉयल एयरफोर्स के पास अमेरिकी F-15 और यूरोपीय यूरोफाइटर टाइफून जैसे आधुनिक विमानों का बड़ा बेड़ा है। लंबे समय से सऊदी अरब अपने हथियारों के लिए पश्चिमी देशों पर निर्भर रहा है, लेकिन हालिया भू-राजनीतिक बदलावों ने रियाद को नई रणनीति अपनाने पर मजबूर कर दिया है।
अमेरिका जब भी हथियार बेचता है, तो वह कई राजनीतिक शर्तें और मानवाधिकारों का हवाला देकर दबाव बनाने की कोशिश करता है। सऊदी अरब अब अपने ‘विजन 2030’ के तहत इस दबाव और ब्लैकमेलिंग से मुक्त होना चाहता है। यहीं पर भारत एक विश्वसनीय और सशक्त साझेदार के रूप में सामने आया है।
खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब अपने पश्चिमी लड़ाकू विमानों में भारतीय अस्त्र मिसाइल को एकीकृत (Integrate) करने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार कर रहा है। पश्चिमी प्लेटफॉर्म पर किसी भारतीय मिसाइल का लगाया जाना वैश्विक बाजार में भारत की बड़ी जीत होगी। अस्त्र की लागत अमेरिकी मिसाइलों से काफी कम है और भारत की नीति बिना किसी शर्त के रक्षा सहयोग प्रदान करने की है, जो सऊदी अरब को बहुत पसंद आ रही है।
इससे पहले खाड़ी देशों में भारतीय हथियारों को लेकर जो संशय था, वह अब पूरी तरह खत्म हो चुका है। विशेषज्ञ अब स्पष्ट रूप से मान रहे हैं कि भारतीय मिसाइलें न केवल सटीक हैं, बल्कि पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा के लिए सबसे भरोसेमंद विकल्प हैं।
आर्मेनिया के आसमान में तुर्की और पाकिस्तान की चुनौती का अंत
सिर्फ खाड़ी देश ही नहीं, बल्कि आर्मेनिया भी भारतीय हथियारों का एक बहुत बड़ा केंद्र बन गया है। पिनाका रॉकेट सिस्टम और आकाश एयर डिफेंस सिस्टम के बाद अब आर्मेनिया की नजरें अस्त्र मिसाइल पर हैं। पिछले संघर्ष में अजरबैजान ने तुर्की के ड्रोन्स और पाकिस्तानी समर्थन के कारण आर्मेनिया को नुकसान पहुँचाया था।
उस समय आर्मेनिया के पास रूसी सुखोई-30 विमान तो थे, लेकिन प्रभावी लंबी दूरी की मिसाइलों की कमी थी। मिसाइलों के बिना वे विमान केवल दिखावे के रह गए थे। अब आर्मेनिया समझ चुका है कि युद्ध जीतने के लिए सिर्फ विमान नहीं, बल्कि अस्त्र जैसी सटीक और मारक मिसाइलें जरूरी हैं।
भारत सुखोई-30 विमानों का सबसे बड़ा प्रचालक (Operator) है और हमने अस्त्र मिसाइल को इस विमान पर पहले ही सफलतापूर्वक तैनात कर दिया है। आर्मेनिया के लिए यह एक ‘प्लग-एंड-प्ले’ समाधान जैसा है। जैसे ही आर्मेनिया के सुखोई विमानों में भारतीय अस्त्र मिसाइलें लगेंगी, अजरबैजान के साथ-साथ तुर्की और पाकिस्तान के रक्षा रणनीतिकारों के लिए भी बड़ी परेशानी खड़ी हो जाएगी।
इंडोनेशिया और दक्षिण चीन सागर का नया समीकरण
दक्षिण चीन सागर में इंडोनेशिया के फैसले ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की नींद उड़ा दी है। ब्रह्मोस के बाद अब अस्त्र मिसाइल को लेकर दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ रहा है। इंडोनेशियाई वायुसेना के पास रूसी मूल के सुखोई विमान हैं, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों (CAATSA) के डर से वे रूस से नए हथियार नहीं खरीद पा रहे हैं।
रूस की अपनी सप्लाई चेन भी यूक्रेन युद्ध के कारण बाधित है। ऐसे में इंडोनेशिया के पास अपने विमानों को आधुनिक बनाने के लिए भारत से बेहतर कोई विकल्प नहीं है। दक्षिण चीन सागर में बढ़ते चीनी अतिक्रमण के बीच इंडोनेशिया को एक ऐसे हथियार की जरूरत है जो चीनी वायुसेना को कड़ी चुनौती दे सके।
भारत ने इंडोनेशिया को अस्त्र मिसाइल का प्रस्ताव दिया है, जो बिना किसी अमेरिकी प्रतिबंध के डर के उनके विमानों की ताकत को कई गुना बढ़ा देगा। इंडोनेशिया का यह कदम फिलीपींस और वियतनाम जैसे अन्य दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के लिए भी एक मिसाल बनेगा, जो पहले से ही भारतीय रक्षा उपकरणों में रुचि दिखा रहे हैं।
प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी और भारत का भविष्य
बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए भारत ने अपनी उत्पादन क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव किया है। अभी तक अस्त्र मिसाइल का उत्पादन केवल सरकारी कंपनी भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) तक सीमित था, लेकिन अब भारी वैश्विक ऑर्डर को देखते हुए निजी क्षेत्र के लिए दरवाजे खोल दिए गए हैं।
रक्षा मंत्रालय ने अस्त्र मार्क-2 के उत्पादन में टाटा, महिंद्रा, अडानी डिफेंस, भारत फोर्ज और आईकॉम जैसी दिग्गज निजी कंपनियों को शामिल करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। यह कदम देश के रक्षा इकोसिस्टम पर सरकार के अटूट भरोसे को दर्शाता है।
निजी क्षेत्र की भागीदारी से उत्पादन की गति और गुणवत्ता दोनों में सुधार होगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को समय पर डिलीवरी सुनिश्चित की जा सकेगी। भारत अब पश्चिमी देशों की तर्ज पर बड़े पैमाने पर रक्षा उत्पादन की दिशा में बढ़ रहा है, लेकिन अपनी स्वतंत्र शर्तों के साथ।
रक्षा निर्यात केवल पैसा कमाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह अन्य देशों के साथ दीर्घकालिक रणनीतिक संबंध बनाने का माध्यम भी है। जब दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भारतीय मिसाइलें तैनात होंगी, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रभाव काफी बढ़ जाएगा। भारत ने दुनिया को दिखा दिया है कि वह न तो चीन की तरह कर्ज के जाल में फंसाता है और न ही अमेरिका की तरह राजनीतिक गुलामी की शर्तें रखता है।
अस्त्र मिसाइल ‘मेक इन इंडिया’ और ‘मेक फॉर द वर्ल्ड’ का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी लंबी रेंज, एंटी-जैमिंग तकनीक और किफायती कीमत इसे वैश्विक बाजार में अपराजेय बनाती है। भारत की इस आक्रामक रक्षा कूटनीति ने स्पष्ट कर दिया है कि अब दुनिया की रक्षा जरूरतों का नया केंद्र भारत ही होगा।

