क्या वैश्विक समुद्री व्यापार का शक्ति संतुलन अब हमेशा के लिए बदलने वाला है? क्या ईरान के पास मौजूद वह ‘ब्रह्मास्त्र’, जिससे वह पूरी दुनिया को डराता था, अब बेअसर होने जा रहा है? मुंबई के तटों से उठी रणनीतिक लहर ने मिडिल ईस्ट से लेकर यूरोप तक ऐसा कौन सा चक्रव्यूह रच दिया है, जिसने अमेरिका और इजरायल जैसे देशों को भी हैरान कर दिया है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल, क्या भारत और सऊदी अरब का यह जॉइंट मास्टरस्ट्रोक ईरान की अर्थव्यवस्था को हिलाने की ताकत रखता है?
आज इजरायल के न्यूज रूम्स से लेकर मिडिल ईस्ट के सत्ता के गलियारों तक सिर्फ एक ही शब्द की गूंज है। एक ऐसा प्रोजेक्ट जिसने तेहरान की रातों की नींद उड़ा दी है—IMEC यानी इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर। इजरायली मीडिया और वहां के सामरिक विशेषज्ञ इसे ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स का सबसे बड़ा ‘गेमचेंजर’ मान रहे हैं। उनके अनुसार, यदि यह कॉरिडोर धरातल पर उतरा, तो ईरान का सबसे बड़ा हथियार, जिसका उपयोग वह दशकों से दुनिया को ब्लैकमेल करने के लिए करता आया है, मिट्टी में मिल जाएगा। लेकिन आखिर वह हथियार क्या है और भारत इसमें कौन सा खेल खेल रहा है?
इसे समझने के लिए आपको ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) के महत्व को समझना होगा। यह दुनिया का वह संकरा समुद्री रास्ता है, जहां से वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। ईरान अक्सर अपनी नौसैनिक शक्ति के दम पर इस रास्ते को बंद करने की धमकी देता रहता है। जब भी पश्चिमी देशों के साथ तनाव बढ़ता है, ईरान इसी ‘होर्मुज कार्ड’ का इस्तेमाल करता है। यदि यह रास्ता बंद होता है, तो वैश्विक तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी और सप्लाई चेन ठप हो जाएगी। अब तक दुनिया के पास इसका कोई ठोस विकल्प नहीं था।
यहीं पर भारत, सऊदी अरब, यूएई और अमेरिका के उस ग्रैंड विजन की एंट्री होती है, जिसे जी-20 समिट में लॉन्च किया गया था। आईमेक (IMEC) कॉरिडोर सिर्फ एक सड़क या रेलवे प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह से बायपास करने का एक मास्टरप्लान है। इसके दो मुख्य हिस्से हैं: पहला ‘ईस्टर्न कॉरिडोर’, जो भारत के मुंबई और मुंद्रा बंदरगाहों को अरब की खाड़ी से जोड़ेगा, और दूसरा ‘नॉर्ण कॉरिडोर’, जो यूएई, सऊदी अरब और जॉर्डन के रेल नेटवर्क के जरिए इजरायल के हाइफा पोर्ट तक पहुंचेगा, और वहां से सीधे यूरोप के प्रवेश द्वार ग्रीस तक जाएगा।
जरा सोचिए, यदि यह रूट चालू हो जाता है, तो ईरान का होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने का डर खत्म हो जाएगा। भारत का माल सीधे यूएई पहुंचेगा और वहां से ट्रेन के जरिए इजरायल होते हुए यूरोप। ईरान अपने ‘ट्रंप कार्ड’ के साथ हाथ पर हाथ धरे बैठा रह जाएगा। यही कारण है कि इजरायल इस प्रोजेक्ट को लेकर बेहद उत्साहित है, क्योंकि यह ईरान की ब्लैकमेलिंग पावर को शून्य कर देता है।
लेकिन कहानी सिर्फ माल ढुलाई तक सीमित नहीं है। आईमेक के ब्लूप्रिंट में एक ‘सीक्रेट लेयर’ भी है—ग्रीन एनर्जी और हाई-स्पीड डेटा केबल्स। इस मार्ग के साथ-साथ रिन्यूएबल एनर्जी ग्रिड्स और ग्रीन हाइड्रोजन पाइपलाइन्स बिछाने की भी तैयारी है। इजरायल, ग्रीस और साइप्रस के बीच एक बड़ा इलेक्ट्रिसिटी नेटवर्क जुड़ने वाला है। इसका सीधा अर्थ यह है कि यूरोप की तेल और गैस पर पुरानी निर्भरता अब तेजी से कम होने वाली है।
जैसा कि हम जानते हैं, ईरान की पूरी अर्थव्यवस्था और उसका डिफेंस बजट तेल निर्यात पर टिका है। जिस दिन यूरोप ने मिडिल ईस्ट से ग्रीन एनर्जी लेना शुरू कर दिया, तेहरान की इकोनॉमिक लाइफलाइन कट जाएगी। यह ईरान के लिए किसी रणनीतिक दुःस्वप्न से कम नहीं है।
भारत के नजरिए से यह विदेश नीति का एक ऐतिहासिक मोड़ है। सालों तक भारत ने पाकिस्तान के रास्ते व्यापार की कोशिश की, लेकिन वहां हमेशा अड़ंगे लगे। ईरान के चाबहार पोर्ट में निवेश के बाद भी भू-राजनीतिक चुनौतियां बनी रहीं। अब भारत ने इन बाधाओं को पार करते हुए अरब देशों के साथ मिलकर नया इतिहास रच दिया है। आईमेक से यूरोप तक माल पहुंचने के समय में 40% की कमी आएगी, जिससे भारतीय निर्यात चीन के ‘बेल्ट एंड रोड’ को कड़ी चुनौती देगा।
भारत की कूटनीतिक दूरदर्शिता का अंदाजा इस बात से लगाइए कि अडानी ग्रुप ने पहले ही इजरायल के रणनीतिक हाइफा पोर्ट का अधिग्रहण कर लिया था। वह डील सिर्फ बिजनेस नहीं, बल्कि आईमेक के नॉर्दर्न कॉरिडोर का सबसे महत्वपूर्ण द्वार था। भारत की इसी ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ ने अमेरिका और इजरायल को भारत का मुरीद बना दिया है। बिना किसी सैन्य गठबंधन के भारत ने मिडिल ईस्ट में अपनी मजबूत धाक जमा ली है।
ईरान की बौखलाहट अब साफ दिखाई दे रही है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि रेड सी में हूती विद्रोहियों द्वारा कमर्शियल जहाजों पर हमले सिर्फ गाजा युद्ध का असर नहीं, बल्कि इस नए ट्रेड रूट को डराने की कोशिश भी है। ईरान जानता है कि यदि भारत-सऊदी-इजरायल का यह नेक्सस मजबूत हुआ, तो मिडिल ईस्ट में उसके प्रॉक्सी संगठनों का टिकना मुश्किल हो जाएगा।
‘यरूशलम पोस्ट’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि इजरायल इस कॉरिडोर को तेजी से आगे बढ़ाता है, तो यह ईरान के लिए एक ऐसा झटका होगा जिससे वह शायद कभी न उबर पाए। हालांकि, गाजा युद्ध और आंतरिक राजनीति के कारण यदि इस प्रोजेक्ट में देरी होती है, तो इसका फायदा तुर्की और ईरान उठा सकते हैं। तुर्की पहले से ही आईमेक के जवाब में इराक के रास्ते अपना अलग कॉरिडोर बनाने की फिराक में है।
एक भारतीय के रूप में यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि हमारी अर्थव्यवस्था के भविष्य का सवाल है। जब भारत का माल कम समय और लागत में वैश्विक बाजार में पहुंचेगा, तो देश में मैन्युफैक्चरिंग बढ़ेगी और लाखों नौकरियां पैदा होंगी। चीन के ‘बीआरआई’ के सामने आईमेक आज दुनिया का सबसे भरोसेमंद विकल्प है, जिसका इंजन हमारा भारत है।
अब देखना यह है कि क्या भारत अपनी नौसेना को मिडिल ईस्ट में और अधिक आक्रामक तरीके से तैनात करेगा? क्या हूतियों का खात्मा ही इस कॉरिडोर की सुरक्षा का एकमात्र रास्ता है? वैश्विक व्यवस्था में भारत की इस बढ़ती ताकत पर आपकी क्या राय है? कमेंट में हमें जरूर बताएं।

