चीन-पाकिस्तान में खलबली: आर्मेनिया के बाद अब मिस्र बनेगा भारत के ‘पिनाका’ का अगला खरीदार, जानें इस ब्रह्मास्त्र की ताकत

क्या वैश्विक डिफेंस मार्केट में अब अमेरिकी वर्चस्व खत्म होने वाला है? अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार से आई एक बड़ी खबर ने वाशिंगटन के पेंटागन से लेकर बीजिंग और इस्लामाबाद तक सनसनी फैला दी है। खबर यह है कि मिस्र (Egypt), जो पारंपरिक रूप से अपने सैन्य हथियारों के लिए अमेरिका और पश्चिमी देशों पर निर्भर रहा है, अब भारत के स्वदेशी पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर (MBRL) सिस्टम को अपनाने की तैयारी में है। मिस्र के शीर्ष रक्षा रणनीतिकार और जनरल इन दिनों पिनाका रॉकेट सिस्टम के विभिन्न वेरिएंट्स का गहन परीक्षण और मूल्यांकन कर रहे हैं। मिस्र की सेना का मानना है कि भारत का यह घातक हथियार अमेरिका के HIMARS का सबसे सटीक और किफायती विकल्प साबित हो सकता है।

यह केवल हथियारों की खरीद का सौदा नहीं है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन (Global Power Dynamics) में एक बड़े बदलाव का संकेत है। कभी हथियारों के सबसे बड़े खरीदार के रूप में पहचाना जाने वाला भारत, आज दुनिया के प्रमुख रक्षा निर्यातकों की श्रेणी में खड़ा है। मिस्र का भारत की ओर यह झुकाव कायरो की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह अपने रक्षा बेड़े को केवल पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं रखना चाहता। बीते वर्षों में दुनिया ने देखा है कि कैसे विकसित देश हथियारों की आपूर्ति को भू-राजनीतिक दबाव (Geopolitical Pressure) के लिए इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में मिस्र अपनी लंबी दूरी की आर्टिलरी को आधुनिक बनाने के लिए भारत को एक भरोसेमंद साझेदार मान रहा है।

अगर इसे युद्ध के अर्थशास्त्र (War Economics) के नजरिए से देखा जाए, तो सवाल उठता है कि मिस्र ने अमेरिकी HIMARS जैसे प्रतिष्ठित सिस्टम को दरकिनार क्यों किया? इसका प्रमुख कारण है ‘कॉस्ट टू परफॉर्मेंस रेशियो’। यूक्रेन-रूस युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध में केवल वही देश टिक सकता है जिसका रक्षा बजट टिकाऊ हो। पश्चिमी देशों के हथियार इतने महंगे हैं कि उनका निरंतर उपयोग किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ सकता है।

आंकड़ों की तुलना करें तो अमेरिका के M142 HIMARS से दागे जाने वाले एक GMLRS रॉकेट की कीमत करीब 1.5 लाख से 2 लाख डॉलर (लगभग 1.2 से 1.6 करोड़ रुपये) होती है। इसके विपरीत, भारत के स्वदेशी गाइडेड पिनाका रॉकेट के एक राउंड की लागत केवल 84,000 डॉलर (लगभग 70 लाख रुपये) है। यानी अमेरिका के एक रॉकेट की कीमत में भारत के दो अचूक रॉकेट दागे जा सकते हैं। युद्ध के मैदान में हजारों रॉकेट्स की आवश्यकता होती है, ऐसे में पिनाका का चयन मिस्र के रक्षा बजट में भारी बचत सुनिश्चित करेगा।

पिनाका की विशेषता केवल उसकी कीमत नहीं, बल्कि युद्धक्षेत्र में मचाई जाने वाली तबाही भी है। पिनाका का 214 mm कैलिबर का एक लॉन्चर महज 44 सेकंड में 12 रॉकेट दागने में सक्षम है। जब पूरी एक पिनाका बैटरी (जिसमें 6 लॉन्चर होते हैं) एक्शन में आती है, तो वह एक मिनट से भी कम समय में 72 रॉकेट दुश्मन पर बरसा देती है।

यह 72 रॉकेट लगभग 1 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को पूरी तरह मलबे के ढेर में तब्दील कर सकते हैं। दुश्मन के बंकर, रसद डिपो और सैन्य शिविर पलक झपकते ही नष्ट हो जाते हैं। भगवान शिव के धनुष ‘पिनाक’ के नाम पर आधारित यह हथियार अपनी मारक क्षमता से पौराणिक विनाश की याद दिलाता है।

आज के दौर में केवल भारी गोलाबारी काफी नहीं है, बल्कि ‘सटीक हमला’ (Precision Strike) अनिवार्य है। DRDO की प्रयोगशालाओं ARDE और HEMRL ने पिनाका को एक स्मार्ट गाइडेड हथियार में तब्दील कर दिया है। नया पिनाका सिस्टम अब INS, GPS और भारत के अपने नेविगेशन सिस्टम NavIC से लैस है।

NavIC की मौजूदगी का मतलब है कि कोई भी विदेशी शक्ति युद्ध के समय इसके सिग्नल को जाम या बंद नहीं कर सकती। इस उन्नत तकनीक के कारण पिनाका का CEP (Circular Error Probable) बहुत कम हो गया है, जिससे यह 75 से 90 किलोमीटर दूर बैठे दुश्मन के रडार और कमांड सेंटर्स को सीधे हिट करता है।

मिस्र के लिए पिनाका की बढ़ती रेंज सबसे बड़ा आकर्षण है। 1999 के कारगिल युद्ध के समय पिनाका Mk-1 की रेंज 37.5 किमी थी, जो अब Mk-1 Enhanced में 60 किमी तक पहुंच चुकी है। पिनाका Mk-2 की मारक क्षमता 75 किमी है और अब भारत ने 120 किमी रेंज वाले LRGR (Long Range Guided Rocket) का भी सफल परीक्षण कर लिया है।

DRDO अब पिनाका में सॉलिड रामजेट तकनीक के इस्तेमाल पर काम कर रहा है, जिससे इसकी रेंज 200 से 300 किलोमीटर तक पहुंच सकती है। इसके बाद पिनाका एक साधारण आर्टिलरी न रहकर एक ‘क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल’ की तरह कार्य करेगा। यह दुश्मन के लिए बेहद घातक और महंगा पड़ने वाला सौदा होगा क्योंकि जो काम करोड़ों की ब्रह्मोस मिसाइल करती है, वह काम पिनाका का एक सस्ता रॉकेट कर पाएगा।

पिनाका सिस्टम BEML और टाटा के 8×8 टाट्रा ट्रकों पर तैनात है, जो इसे अद्भुत गतिशीलता (Mobility) प्रदान करते हैं। इसकी सबसे बड़ी खूबी ‘शूट एंड स्कूट’ तकनीक है। इसके तहत रॉकेट फायर करने के तुरंत बाद लॉन्चर अपनी जगह बदल लेता है, जिससे दुश्मन के रडार उसकी लोकेशन ट्रैक करके जवाबी हमला नहीं कर पाते।

यही वह रणनीति थी जिसने आर्मेनिया-अज़रबैजान युद्ध में तहलका मचाया था। जब आर्मेनिया ने भारत से पिनाका खरीदा, तो इसकी मोबिलिटी ने तुर्की के प्रसिद्ध बेयराक्तर TB2 ड्रोन्स की रणनीति को विफल कर दिया। इसी वास्तविक युद्ध सफलता ने मिस्र का भरोसा भारत पर और मजबूत किया है।

पिनाका ने भारत को चीन और पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक बढ़त दी है। पाकिस्तान के पास मौजूद चीनी A-100 MLRS की तुलना में पिनाका पूरी तरह स्वदेशी है, जिसकी सप्लाई लाइन कभी बाधित नहीं हो सकती। इसके साथ ‘स्वाति’ (Swati) वेपन लोकेटिंग रडार का मेल दुश्मन की तोपों के लिए काल साबित होता है।

लद्दाख और अरुणाचल के पहाड़ी इलाकों में कम हवा के दबाव के कारण पिनाका की रेंज और भी बढ़ जाती है। 120 किमी की रेंज के साथ भारतीय सेना वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पार किए बिना ही तिब्बत के अंदर चीनी सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकती है।

भारत का रक्षा निर्यात आज 38,424 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर गया है। सरकार ने सोलर इंडस्ट्रीज, एलएंडटी और टाटा पावर जैसी निजी कंपनियों को साथ लेकर रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिखी है।

वर्तमान में भारतीय सेना के पास 10 पिनाका रेजिमेंट हैं और भविष्य में इसे 22 तक ले जाने की योजना है। आर्मेनिया के बाद मिस्र तक पिनाका का पहुंचना आत्मनिर्भर भारत की शक्ति का प्रमाण है। यह उन दुश्मनों के लिए चेतावनी है जो भारत की सीमाओं पर नजर गड़ाए बैठे हैं कि 44 सेकंड में बरसने वाले 72 रॉकेट किसी भी दुस्साहस का अंत करने के लिए पर्याप्त हैं।

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