‘जापान की अपनी ट्रेनें 2030 तक तैयार नहीं, फिर भी भारत पर उंगली!’: बुलेट ट्रेन विवाद पर नई दिल्ली का मुंहतोड़ जवाब

आज का नया भारत किसी भी विदेशी शक्ति के निराधार आरोपों को चुपचाप सुनने वाला नहीं है। जब बात देश के आत्मसम्मान और सबसे महत्वाकांक्षी इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की हो, तो नई दिल्ली का पलटवार इतना सशक्त होता है कि उसकी गूंज सीधे टोक्यो तक पहुंचती है। मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को लेकर जापान के एक पूर्व मंत्री द्वारा भारत पर उठाए गए सवालों का भारत ने कड़ा जवाब दिया है। पूर्व जापानी मंत्री ने भारत को ‘लापरवाह’ कहा था, लेकिन उन्हें शायद यह अंदाजा नहीं था कि जिस भारत पर वह आरोप लगा रहे हैं, उसने जापान की ही पोल खोलकर रख दी है।

जापानी मंत्री की बयानबाजी और बेबुनियाद आरोप

इस विवाद की जड़ में जापान के पूर्व उप अर्थव्यवस्था, व्यापार और उद्योग मंत्री हिदेकी माकिहारा का एक सोशल मीडिया पोस्ट है। माकिहारा ने दावा किया कि भारत की कार्यशैली में गंभीरता की कमी है और भारतीय अधिकारी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर किए गए वादों को पूरा नहीं करते। उन्होंने भारत के शीर्ष नेतृत्व के व्यवहार पर भी टिप्पणी की और प्रोजेक्ट में हो रही देरी का पूरा दोष भारत के सिर मढ़ने की कोशिश की।

इसी बीच, जापानी इंजीनियर इसाओ त्सुजिमुरा ने भी एक लेख के जरिए तंज कसा कि भारत का यूरोपीय सिग्नलिंग प्रणाली और खुद की हाई-स्पीड ट्रेन इस्तेमाल करने का निर्णय इस प्रोजेक्ट को अधूरा सपना बना देगा। यह सीधे तौर पर भारतीय इंजीनियरिंग और आत्मनिर्भर भारत के विजन को चुनौती देने जैसा था।

विदेशी सुर में सुर मिलाता विपक्ष

इस पूरे घटनाक्रम में विडंबना तब दिखी जब देश के भीतर ही विपक्षी दलों ने इन विदेशी बयानों को सरकार के खिलाफ हथियार बनाना शुरू कर दिया। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा जैसे नेताओं ने पूरी स्थिति का विश्लेषण किए बिना ही इसे देश के लिए शर्मनाक बता दिया। यह अक्सर देखा गया है कि जब भी कोई विदेशी शक्ति भारत की आलोचना करती है, तो विपक्ष एकजुट होने के बजाय विदेशी नैरेटिव को ही हवा देने लगता है, जबकि वास्तविकता इससे कोसों दूर थी।

भारत का करारा जवाब और जापान की असलियत

भारतीय विदेश मंत्रालय ने इन भ्रामक दावों का खंडन करते हुए स्थिति स्पष्ट की। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि यह केवल एक व्यक्ति की निजी और कुंठित राय है। असलियत तो यह है कि बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में देरी का मुख्य कारण खुद जापान है। समझौते के तहत जापान को ई-10 और ई-20 सीरीज की ट्रेनें देनी थीं, लेकिन ये ट्रेनें अभी भी विकास के चरण में ही अटकी हुई हैं। जापान खुद 2030 से पहले ये ट्रेनें भारत को सौंपने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में अपनी विफलता छिपाने के लिए भारत पर आरोप लगाना हास्यास्पद है।

आत्मनिर्भर भारत: 2027 में दौड़ेगी स्वदेशी हाई-स्पीड ट्रेन

भारत ने अब जापान की ट्रेनों का इंतजार न करने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। वंदे भारत एक्सप्रेस की बड़ी सफलता के बाद, भारतीय इंजीनियर अब अपनी खुद की ‘मेक इन इंडिया’ हाई-स्पीड ट्रेन तैयार कर रहे हैं। भारत का लक्ष्य है कि 2027 तक बुलेट ट्रेन के पहले चरण का संचालन शुरू कर दिया जाए। यूरोपीय सिग्नलिंग सिस्टम का उपयोग करना भी एक रणनीतिक फैसला है ताकि तकनीक के मामले में किसी एक देश का एकाधिकार न रहे।

प्रोजेक्ट की जमीनी प्रगति

508 किलोमीटर लंबा यह हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर महाराष्ट्र और गुजरात के बीच तेजी से आकार ले रहा है। भले ही शुरुआत में भूमि अधिग्रहण जैसी चुनौतियां थीं, लेकिन अब सूरत और बिलिमोरा के बीच का काम युद्ध स्तर पर जारी है। नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन (NHSRCL) 320 किमी/घंटा की रफ्तार के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे को दिन-रात तैयार कर रहा है।

कूटनीतिक मर्यादा और स्वाभिमान

भारत और जापान के रणनीतिक संबंध बेहद गहरे हैं और जापान भारत का एक प्रमुख आर्थिक साझेदार है। हालांकि, कूटनीति का अर्थ यह नहीं है कि भारत अपने स्वाभिमान से समझौता करेगा। भारत ने साफ कर दिया है कि वह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और आत्मनिर्भर होने का संकल्प ले चुका है। जो देश चंद्रयान-3 और मंगल मिशन को सफलतापूर्वक पूरा कर सकता है, उसके लिए अपनी हाई-स्पीड ट्रेन बनाना कोई असंभव कार्य नहीं है। 2027 में जब स्वदेशी ट्रेन पटरी पर दौड़ेगी, तो वह उन तमाम आलोचकों के लिए सबसे सटीक जवाब होगा।

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