15 अगस्त 2021 को काबुल की सत्ता बदलने के बाद दुनिया के बड़े हिस्से ने अनुमान लगाया था कि भारत का दो दशक में बनाया गया पूरा ‘अफगान आउटरीच’ लगभग खत्म हो जाएगा। भारत ने वहां संसद भवन, सलमा बांध, सड़कें, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक परियोजनाओं पर 3 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश किया था। लेकिन पांच साल बाद तस्वीर काफी अलग है। भारत ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी, फिर भी काबुल में भारतीय दूतावास फिर से सक्रिय है, तालिबान के वरिष्ठ मंत्री दिल्ली आ चुके हैं, एयर फ्रेट कॉरिडोर और चाबहार पर बातचीत आगे बढ़ी है और अफगानिस्तान फिर से भारत की क्षेत्रीय रणनीति के केंद्र में लौट आया है। सवाल यह है कि बिना औपचारिक मान्यता के भारत ने अपना राजनयिक स्थान कैसे वापस बनाया?
2021 में दूरी, लेकिन अफगानिस्तान को छोड़ा नहीं
सबसे पहले 2021 और 2026 के बीच के अंतर को समझना होगा। 2021 में भारत ने सुरक्षा कारणों से अपने राजनयिक कर्मियों को काबुल से निकाल लिया था। लेकिन नई दिल्ली ने अफगानिस्तान को पूरी तरह छोड़ने का फैसला नहीं किया। जून 2022 में एक तकनीकी मिशन काबुल भेजा गया। उसका फोकस मानवीय सहायता, व्यापार, चिकित्सा सहायता और अफगान लोगों के साथ संपर्क बनाए रखना था।
इसके बाद भारत ने गेहूं, दवाएं और दूसरी सहायता लगातार पहुंचाई। फरवरी 2025 तक भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 50,000 मीट्रिक टन गेहूं, करीब 300 टन चिकित्सा सहायता, 28 टन भूकंप राहत सामग्री और 40,000 लीटर मैलाथियान अफगानिस्तान भेजा जा चुका था। यह केवल राहत का मामला नहीं था। इससे भारत ने वह सद्भावना (Goodwill) बचाए रखी, जो उसने वर्षों की विकास साझेदारी के जरिए तैयार की थी।
2025 में आया बड़ा कूटनीतिक मोड़
फिर आया साल 2025 और यहीं से जुड़ाव की रफ्तार तेज हो गई। जनवरी 2025 में विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने दुबई में अफगान विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी से मुलाकात की। इसमें मानवीय सहायता के साथ विकास परियोजनाओं और चाबहार बंदरगाह के इस्तेमाल तक पर चर्चा हुई।
अक्टूबर 2025 में मुत्तकी भारत आए। 2021 के बाद किसी वरिष्ठ तालिबान नेता की यह पहली भारत यात्रा थी। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के साथ बातचीत में व्यापार, कनेक्टिविटी, विकास परियोजनाओं, स्वास्थ्य सेवा, सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, क्षमता निर्माण और सुरक्षा चिंताएं प्रमुख मुद्दे रहे।
और इसके कुछ ही दिनों बाद 21 अक्टूबर 2025 को भारत ने काबुल तकनीकी मिशन को आधिकारिक तौर पर भारतीय दूतावास में अपग्रेड कर दिया। यही वह बिंदु है जहां भारत की कूटनीति बेहद स्पष्ट दिखाई देती है। दूतावास का दर्जा बढ़ाना और किसी सरकार को औपचारिक मान्यता देना दो अलग-अलग बातें हैं। नई दिल्ली ने जुड़ाव बढ़ाया, लेकिन मान्यता की रेखा पार नहीं की।
भारत की नीति का आधार है राष्ट्रहित
यहीं भारत की नीति की असली ताकत दिखाई देती है। नई दिल्ली ने विचारधारा के बजाय राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी। भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अफगानिस्तान की जमीन किसी भारत-विरोधी नेटवर्क के लिए इस्तेमाल न हो।
अक्टूबर 2025 के भारत-अफगानिस्तान संयुक्त बयान में अफगान पक्ष ने यह प्रतिबद्धता दोहराई कि अफगानिस्तान के क्षेत्र का इस्तेमाल किसी दूसरे देश के खिलाफ नहीं होने दिया जाएगा। भारत के लिए यह बेहद अहम आश्वासन है।
इसके अलावा अफगानिस्तान के भूगोल को देखिए। एक तरफ ईरान, दूसरी तरफ पाकिस्तान, उत्तर में मध्य एशियाई गणराज्य और आगे चीन। यानी काबुल से संपर्क कमजोर करना केवल एक सरकार से दूरी बनाना नहीं होता, बल्कि दक्षिण एशिया से मध्य एशिया तक भारत के रणनीतिक विकल्पों को सीमित करना भी होता।
पाकिस्तान फैक्टर ने बदला पूरा क्षेत्रीय समीकरण
दूसरा बड़ा कारक पाकिस्तान है। 2021 में इस्लामाबाद में व्यापक धारणा थी कि काबुल में तालिबान की वापसी से पाकिस्तान का रणनीतिक प्रभाव बढ़ेगा। लेकिन अगले पांच वर्षों में समीकरण तेजी से बदले।
टीटीपी (TTP) को लेकर दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप, डूरंड रेखा पर मतभेद, सीमा बंदी और 2025-26 के गंभीर सीमाई तनाव ने अफगानिस्तान-पाकिस्तान संबंधों में गहरी दूरी पैदा की। इसका आर्थिक असर भी पड़ा, क्योंकि स्थल-रुद्ध (Landlocked) अफगानिस्तान लंबे समय से पाकिस्तानी पारगमन मार्गों पर काफी निर्भर रहा है।
जब रास्ते बार-बार बंद होते हैं, शिपमेंट रुकते हैं और व्यापारियों को अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है, तब काबुल के लिए वैकल्पिक मार्ग केवल कूटनीति नहीं बल्कि आर्थिक अस्तित्व का सवाल बन जाते हैं। यही वह जगह है जहां ईरान, मध्य एशिया और भारत का महत्व बढ़ता है।
चाबहार बना भारत का सबसे बड़ा कनेक्टिविटी कार्ड
यहीं चाबहार बंदरगाह भारत के लिए गेम चेंजर बनता है। ईरान में स्थित चाबहार, अफगानिस्तान को पाकिस्तान के ट्रांजिट रूट पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना अरब सागर तक पहुंचने का विकल्प देता है।
नवंबर 2025 में अफगान वाणिज्य मंत्री नूरुद्दीन अजीजी ने भारत से व्यापार बढ़ाने, कार्गो हब तैयार करने और चाबहार रूट का ज्यादा इस्तेमाल करने की बात की। अफगान पक्ष ने निमरोज में ड्राई-पोर्ट बुनियादी ढांचे जैसे प्रस्ताव भी रखे। इसी दौरान भारत-अफगानिस्तान के बीच एयर कार्गो कनेक्टिविटी को विस्तार देने पर भी सहमति बनी।
अफगानिस्तान भारत को सूखे मेवे, केसर, हींग, फल और दूसरे कृषि उत्पाद उपलब्ध करा सकता है, जबकि भारत दवाओं, वस्त्रों, मशीनरी, प्रसंस्कृत वस्तुओं और स्वास्थ्य सेवा में बड़ी भूमिका निभा सकता है। 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार करीब एक बिलियन डॉलर के आसपास रहने के औद्योगिक अनुमान सामने आए थे।
यानी इस रिश्ते के पीछे केवल भू-राजनीति नहीं है। यहां बाजार, लॉजिस्टिक्स और व्यावसायिक अवसर भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
भारत की सबसे बड़ी पूंजी — विकास और सद्भावना
तीसरा कारक वह है जिसे केवल पैसे में नहीं मापा जा सकता। यह है भारत की विकास विश्वसनीयता।
2001 से 2021 के बीच भारत ने अफगानिस्तान में अपनी पहचान बुनियादी ढांचे और मानव विकास के जरिए बनाई। अफगान संसद भवन, सलमा बांध यानी अफगान-भारत मैत्री बांध, जरंज-डेलाराम सड़क, बिजली परियोजनाएं, छात्रवृत्तियां और सैकड़ों सामुदायिक विकास परियोजनाएं भारत की मौजूदगी के प्रतीक बने।
भारत की यही रणनीति दूसरे क्षेत्रीय खिलाड़ियों से अलग रही। फोकस यह रहा कि परियोजनाएं सीधे अफगान लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ें। सत्ता बदलने के बावजूद इसी विरासत ने भारत के लिए सद्भावना का एक मजबूत आधार बनाए रखा।
2025 में दोनों पक्षों ने फिर स्वास्थ्य सेवा, जलविद्युत सहयोग, बुनियादी ढांचे और क्षमता निर्माण को आगे बढ़ाने पर बात की। यानी भारत पुराने निवेश को केवल इतिहास नहीं बनने देना चाहता, बल्कि उसे भविष्य की साझेदारी की नींव में बदल रहा है।
मान्यता पर भारत की बेहद नपी-तुली चाल
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है। तालिबान प्रशासन आज पूरी तरह से गैर-मान्यता प्राप्त नहीं है।
रूस ने जुलाई 2025 में तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता देकर ऐसा करने वाला पहला और अगस्त 2026 तक अकेला देश बनने का फैसला किया। चीन, ईरान, पाकिस्तान, यूएई, उजबेकिस्तान और कई दूसरे देशों ने राजनयिक जुड़ाव बढ़ाया है, लेकिन औपचारिक मान्यता अभी भी बेहद सीमित है।
भारत भी जुड़ाव रख रहा है, दूतावास चला रहा है, अफगान मंत्रियों से बातचीत कर रहा है, लेकिन तालिबान सरकार को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं दी गई है।
यानी नई दिल्ली का फॉर्मूला साफ है — संवाद होगा, विकास होगा, व्यापार होगा और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा भी होगी, लेकिन जुड़ाव को स्वचालित समर्थन नहीं बनने दिया जाएगा।
महिला अधिकार अब भी सबसे बड़ी सीमा
इस सावधानी की सबसे बड़ी वजह महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों की स्थिति है। यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां लगातार कह रही हैं कि अफगानिस्तान दुनिया का अकेला देश है जहां लड़कियों और महिलाओं की माध्यमिक और उच्च शिक्षा पर व्यापक प्रतिबंध लागू हैं।
यूनेस्को के मुताबिक लाखों अफगान लड़कियां औपचारिक माध्यमिक और उच्च शिक्षा से बाहर हैं। अगस्त 2026 में संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों ने एक बार फिर चेतावनी दी कि इन प्रतिबंधों की सामाजिक और आर्थिक कीमत लगातार बढ़ रही है।
भारत की अफगानिस्तान नीति दशकों से शिक्षा, छात्रवृत्ति, क्षमता निर्माण और समावेशी विकास पर आधारित रही है। इसलिए काबुल के साथ संबंध बढ़ने के बावजूद महिलाओं की शिक्षा, अवसर और बुनियादी अधिकार ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें नई दिल्ली आसानी से नजरअंदाज नहीं कर सकता।
यही वजह है कि भारत की नीति को तालिबान समर्थन के रूप में देखना एक तथ्यात्मक गलती होगी। यह अफगान लोगों के साथ जुड़ाव और काबुल की वर्तमान राजनीतिक वास्तविकता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है।
अर्थव्यवस्था सुधरी, लेकिन चुनौती बहुत बड़ी
अफगानिस्तान की आर्थिक तस्वीर भी पूरी तरह आसान नहीं है। विश्व बैंक ने मई 2026 में कहा कि अर्थव्यवस्था ने लचीलापन दिखाया है, लेकिन जनसंख्या का दबाव, बड़े पैमाने पर लौटे अफगान, आयात निर्भरता, कमजोर निवेश माहौल और घटती बाहरी सहायता जीवन स्तर पर दबाव बना रही है।
विश्व बैंक के मुताबिक 2025 में अर्थव्यवस्था में वृद्धि दर्ज हुई, लेकिन जनसंख्या वृद्धि और वापसी प्रवासन के कारण प्रति व्यक्ति जीडीपी में गिरावट आई। चालू खाता घाटा भी काफी बड़ा रहा और अर्थव्यवस्था की आयात निर्भरता अब भी संरचनात्मक चुनौती बनी हुई है।
इसका सीधा मतलब है कि तालिबान प्रशासन के लिए राजनयिक जुड़ाव केवल अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का मामला नहीं है। उसे बाजार चाहिए, बंदरगाह चाहिए, निवेश चाहिए, स्वास्थ्य सहयोग चाहिए और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी चाहिए।
और भारत इन्हीं जरूरतों के बीच बिना जल्दबाजी किए अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत कर रहा है।
17 अगस्त का दिल्ली रिसेप्शन क्यों है अहम?
अब सबसे नया संकेत देखिए। तालिबान की सत्ता में वापसी की पांचवीं वर्षगांठ के सिलसिले में 17 अगस्त 2026 को नई दिल्ली स्थित अफगान दूतावास में पहली सार्वजनिक ‘विजय दिवस’ रिसेप्शन रखी गई।
अफगान ‘चार्ज डी अफेयर्स’ नूर अहमद नूर की तरफ से राजनयिकों और दूसरे मेहमानों को निमंत्रण भेजे गए। भारतीय अधिकारियों की भागीदारी की संभावना भी सामने आई, लेकिन विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने पहले से किसी विशिष्ट भारतीय प्रतिनिधि की मौजूदगी की पुष्टि नहीं की थी।
यही छोटी सी डिटेल भारत की पूरी रणनीति समझाती है। बातचीत है। दूतावास है। मंत्रियों की यात्राएं हैं। व्यापार है। विकास सहयोग है। लेकिन हर राजनयिक प्रतीक को बेहद सावधानी से संभाला जा रहा है।
मध्य एशिया तक जाती है अफगानिस्तान की कहानी
भारत के लिए अफगानिस्तान केवल काबुल की मौजूदा सरकार का नाम नहीं है। यह मध्य एशिया तक पहुंच, चाबहार की व्यवहार्यता, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी, सुरक्षा निगरानी और दशकों में बनाई गई सद्भावना का सवाल है।
कजाकिस्तान, उजबेकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और किर्गिस्तान के साथ भारत अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंध बढ़ा रहा है। लेकिन अफगानिस्तान के भूगोल के बिना दक्षिण एशिया और मध्य एशिया को सीधे जोड़ना हमेशा मुश्किल रहेगा।
इसीलिए स्थिर और आर्थिक रूप से जुड़ा हुआ अफगानिस्तान भारत के व्यापक यूरेशियाई दृष्टिकोण में बेहद महत्वपूर्ण है।
पांच साल बाद सबसे बड़ी कहानी यही है कि भारत ने न तो 2021 की वास्तविकता को नजरअंदाज किया और न ही अपने पुराने सिद्धांतों को पूरी तरह छोड़ा। उसने मान्यता और जुड़ाव को अलग-अलग रखा, मानवीय सहायता को कूटनीति से जोड़ा, पाकिस्तान मार्ग की अनिश्चितता के बीच चाबहार और हवाई कनेक्टिविटी को आगे बढ़ाया और सुरक्षा चिंताओं को बातचीत की मेज पर रखा।
यही भारत की नपी-तुली कूटनीति है — न भावनात्मक दूरी, न जल्दबाजी वाली नजदीकी।
काबुल में भारत का बढ़ता कद किसी एक नाटकीय कदम का नतीजा नहीं है। यह पांच साल के चरण-दर-चरण रणनीतिक धैर्य का परिणाम है। अब असली परीक्षा यह होगी कि क्या यह जुड़ाव भारत की सुरक्षा, व्यापार और मध्य एशिया कनेक्टिविटी को मजबूत करने के साथ-साथ अफगान समाज में शिक्षा, अवसर और समावेशी विकास के लिए भी सार्थक स्थान तैयार कर पाता है।

