भारत में साइबर सुरक्षा की चुनौती: 2 साल में 85% बढ़े साइबर इंसिडेंट्स, क्या डिजिटल इंडिया सुरक्षित है?

29 लाख 44 हजार 248। यह कोई मामूली अनुमान नहीं है, बल्कि साल 2025 के दौरान भारत के साइबर स्पेस में CERT-In द्वारा रिपोर्ट और ट्रैक किए गए साइबर सुरक्षा इंसिडेंट्स की आधिकारिक संख्या है। साल 2023 में यही आंकड़ा 15 लाख 92 हजार 917 था। इसका सीधा मतलब यह है कि महज दो वर्षों में करीब 13.51 लाख घटनाओं की वृद्धि हुई है, जो प्रतिशत के लिहाज से लगभग 84.8% का उछाल है। डिजिटल इंडिया जिस गति से प्रगति कर रहा है, उतनी ही तेजी से इसकी साइबर सुरक्षा को और अधिक सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है।

लेकिन यहां सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात को समझना आवश्यक है। 29.44 लाख का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि इतने ही डेटा ब्रीच या सफल हैकिंग मामले हुए हैं। यह CERT-In के पास दर्ज की गई कुल संदिग्ध साइबर गतिविधियों और सुरक्षा घटनाओं की संख्या है। इसमें कई तरह के सिक्योरिटी इवेंट्स शामिल हो सकते हैं, इसलिए इसे सीधे तौर पर साइबर अपराध या डेटा चोरी बताना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। सरकार ने 12 अगस्त 2026 को लोकसभा में इस शब्दावली को विस्तार से स्पष्ट किया है।

तीन साल के आंकड़ों में छिपा है साइबर स्पेस का बदलता चेहरा

पिछले तीन वर्षों का ट्रेंड देखें तो 2023 में 15,92,917 इंसिडेंट्स दर्ज हुए थे। 2024 में यह संख्या बढ़कर 20,41,360 हुई और 2025 में यह सीधा 29,44,248 तक पहुंच गई।

इसका मतलब है कि 2023 से 2024 के बीच लगभग 28% और 2024 से 2025 के बीच 44% की भारी वृद्धि देखी गई। 2025 के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो हर दिन औसतन 8,066 साइबर सुरक्षा घटनाएं ट्रैक की गईं। जबकि 2023 में यह औसत प्रतिदिन 4,364 था। यानी दो साल के भीतर ही प्रतिदिन के औसत में 3,700 अतिरिक्त घटनाओं का अंतर आया है।

यह डेटा इसलिए चिंताजनक है क्योंकि आज भारत की अर्थव्यवस्था, शासन प्रणाली और नागरिक सेवाएं पूरी तरह से डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर टिकी हैं। बैंकिंग, टैक्स, सरकारी लाभ, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं अब इंटरनेट-कनेक्टेड सिस्टम पर निर्भर हैं।

ऐसे में साइबर सुरक्षा केवल आईटी विभाग की जिम्मेदारी नहीं रह गई है, बल्कि यह देश की आर्थिक सुरक्षा, जनता के भरोसे और सुशासन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है।

सरकारी प्लेटफॉर्म्स की सुरक्षा पर विशेष ध्यान

इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय द्वारा 14 अगस्त 2026 को जारी जानकारी के अनुसार, CERT-In द्वारा मॉनिटर किए जाने वाले मामलों में सरकारी प्लेटफॉर्म्स से जुड़ी घटनाएं भी शामिल हैं। ऐसी किसी भी घटना के मामले में CERT-In संबंधित संगठनों, रेगुलेटर्स और कानूनी एजेंसियों के साथ मिलकर तुरंत एक्शन लेता है।

यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि सभी 29.44 लाख घटनाएं सरकारी वेबसाइटों या आधार और बैंकिंग डेटाबेस में सेंधमारी से जुड़ी नहीं हैं। इसलिए किसी भी प्रकार की सनसनीखेज व्याख्या से बचना चाहिए।

हालांकि, खतरे की गंभीरता कम नहीं है। आधुनिक राष्ट्र के लिए सरकारी पोर्टल्स की उपलब्धता और डेटा की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है। आज एक सरकारी प्लेटफॉर्म केवल वेबसाइट नहीं, बल्कि एपीआई, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटाबेस की एक जटिल संरचना है, जिसे सुरक्षित रखना प्राथमिकता है।

यही कारण है कि भारत को डिजिटल सेवाओं के साथ-साथ साइबर रेजिलिएंस पर भी भारी निवेश करना होगा।

पुराने वायरस से कहीं अधिक जटिल हुए साइबर खतरे

साइबर खतरों का स्वरूप अब तेजी से बदल रहा है। CERT-In ने मई 2025 की अपनी एडवाइजरी में रैनसमवेयर, DDoS अटैक, वेबसाइट डिफेसमेंट और मालवेयर इन्फेक्शन जैसे खतरों को लेकर संगठनों को सचेत किया था। इसके बचाव के लिए मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, सॉफ्टवेयर अपडेट और एन्क्रिप्शन जैसे सुरक्षा उपायों पर जोर दिया गया है।

इतना ही नहीं, अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की वजह से फिशिंग और सोशल इंजीनियरिंग हमले और भी घातक हो गए हैं। फर्जी मैसेज अब बिल्कुल असली जैसे लगते हैं और ऑटोमेटेड हमलों का पैमाना बढ़ गया है।

इसका अर्थ है कि अब केवल फायरवॉल लगाना काफी नहीं है। अब सुरक्षा के लिए 24×7 मॉनिटरिंग, पैचिंग, ऑडिटिंग और प्रशिक्षित कार्यबल की निरंतर आवश्यकता है।

साइबर सुरक्षा के लिए भारत का ‘मल्टी-लेयर’ नेटवर्क

भारत ने साइबर खतरों से निपटने के लिए एक मजबूत ढांचा तैयार किया है, जिसमें जिम्मेदारी किसी एक एजेंसी पर नहीं बल्कि कई स्तरों पर बांटी गई है।

नेशनल साइबर सिक्योरिटी कोऑर्डिनेटर विभिन्न एजेंसियों के बीच तालमेल बिठाते हैं। CERT-In के तहत संचालित NCCC साइबर स्पेस के खतरों का विश्लेषण कर राज्यों और संगठनों को अलर्ट भेजता है।

वहीं, देश की महत्वपूर्ण बुनियादी सेवाओं जैसे बिजली और परिवहन के लिए NCIIPC बनाया गया है। इसके अलावा, वित्त क्षेत्र के लिए CSIRT-Fin और बिजली क्षेत्र के लिए CSIRT-Power जैसी विशेष टीमें तैनात की गई हैं।

सरकारी वेबसाइटों का अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट

सरकारी दावों के मुताबिक, किसी भी सरकारी वेबसाइट या ऐप को होस्ट करने से पहले कड़े साइबर सुरक्षा ऑडिट से गुजरना पड़ता है। इसके बाद भी समय-समय पर इनका नियमित ऑडिट किया जाता है।

CERT-In ने इस काम के लिए 237 संगठनों को पैनल में रखा है जो सिक्योरिटी टेस्टिंग और रिस्क असेसमेंट में मदद करते हैं। सुरक्षा में सबसे बड़ी चुनौती घटना के बाद की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि हमले से पहले कमजोरी को ढूंढना है।

यही ‘प्रोएक्टिव सिक्योरिटी’ मॉडल आज डिजिटल इंडिया की मुख्य ताकत बन रहा है।

साइबर स्वच्छता केंद्र और मॉक ड्रिल्स

CERT-In का साइबर स्वच्छता केंद्र नागरिकों और संस्थाओं को वायरस और मालवेयर हटाने के लिए मुफ्त टूल और मार्गदर्शन प्रदान करता है।

इसके साथ ही, सरकारी विभागों की तैयारी जांचने के लिए नियमित रूप से ‘साइबर मॉक ड्रिल्स’ आयोजित की जाती हैं। जागरूकता बढ़ाने के लिए करीब 6,650 कार्यशालाएं की जा चुकी हैं, जिनमें लाखों लोगों ने हिस्सा लिया है।

यह इस बात का प्रमाण है कि तकनीक के साथ-साथ मानवीय जागरूकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि अधिकांश घटनाएं कमजोर पासवर्ड या गलत लिंक पर क्लिक करने से शुरू होती हैं।

साइबर इंसिडेंट और वित्तीय धोखाधड़ी में अंतर

यह समझना आवश्यक है कि CERT-In द्वारा दर्ज साइबर इंसिडेंट्स और नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर दर्ज वित्तीय धोखाधड़ी के आंकड़े अलग-अलग हैं।

साल 2025 में करीब 24 लाख वित्तीय धोखाधड़ी की शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें लगभग 22,495 करोड़ रुपये की राशि शामिल थी। वित्तीय साइबर अपराधों से निपटने के लिए I4C और 1930 हेल्पलाइन नंबर सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। इस सिस्टम के जरिए जून 2026 तक 11,158 करोड़ रुपये से अधिक की राशि को ठगे जाने से बचाया जा चुका है।

आम नागरिकों के लिए 1930 नंबर रामबाण है, क्योंकि जितनी जल्दी शिकायत दर्ज होगी, बैंक द्वारा संदिग्ध ट्रांजैक्शन को रोकने की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है।

दिल्ली में रिपोर्ट हुए सर्वाधिक मामले

मार्च 2026 में गृह मंत्रालय द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, दिल्ली से सबसे अधिक साइबर सुरक्षा घटनाएं रिपोर्ट की गईं। हालांकि, CERT-In इंसिडेंट्स से होने वाले कुल वित्तीय नुकसान का कोई एकल आंकड़ा नहीं रखता क्योंकि हर घटना का प्रभाव अलग होता है।

कुछ घटनाएं केवल शुरुआती हमले की कोशिश हो सकती हैं, जबकि कुछ संगठनों के संचालन के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं।

डिजिटल इंडिया की भविष्य की राह

भारत आज दुनिया की सबसे तेज गति से डिजिटाइज होती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। जैसे-जैसे सेवाएं ऑनलाइन होंगी, हमलों का खतरा भी बढ़ेगा। लेकिन इसका समाधान डिजिटलाइजेशन को रोकना नहीं, बल्कि सुरक्षा को इसकी नींव में शामिल करना है।

भारत की अब तीन मुख्य प्राथमिकताएं हैं—महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा, रीयल-टाइम सूचना साझा करना और नागरिकों की जागरूकता।

29.44 लाख का आंकड़ा डराने के लिए नहीं, बल्कि हमें और अधिक सतर्क और तैयार रहने के लिए प्रेरित करने वाला एक चेतावनी संकेत है।

डिजिटल इंडिया की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि वह कितनी सुरक्षित और भरोसेमंद सेवाएं अपने नागरिकों को प्रदान करता है। भारत ने अपना रक्षा कवच तैयार कर लिया है, अब चुनौती इसे आधुनिक तकनीक के साथ हमेशा अपडेट रखने की है।

21वीं सदी में किसी भी देश की संप्रभुता और शक्ति केवल उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसके डिजिटल स्पेस और डेटा की सुरक्षा से भी मापी जाएगी।

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