भारत और बांग्लादेश की सीमा पर जहां बीएसएफ के जवान पूरी मुस्तैदी के साथ निगरानी कर रहे हैं, वहीं पूर्वी समुद्री मोर्चे से एक ऐसी सुखद खबर आई है जिसने वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में हलचल पैदा कर दी है। अंडमान के गहरे नीले समंदर में भारत ने एक ऐसा रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक खेला है, जिसने अमेरिका से लेकर मध्य पूर्व तक के देशों को हैरान कर दिया है। इसे भारतीय ऊर्जा क्षेत्र का एक निर्णायक मोड़ (Turning Point) माना जा रहा है, जो भविष्य में देश की आर्थिक दिशा बदल सकता है।
अंडमान सागर और बंगाल की खाड़ी के नीचे चल रहा यह महा-ऑपरेशन महज एक सामान्य खोज नहीं है। यह भारत को एक आर्थिक महाशक्ति बनाने और भारतीय रुपये को वैश्विक स्तर पर मजबूती प्रदान करने का एक राष्ट्रीय मिशन बन चुका है। आखिर अंडमान बेसिन की गहराइयों में ऐसा क्या मिला है कि पूरी दुनिया की नजरें अब भारत के इस प्रोजेक्ट पर टिकी हैं? क्या महानदी, बंगाल-पूर्णिया, कावेरी और कृष्णा-गोदावरी जैसे बेसिन सचमुच भारत की तकदीर बदलने वाले हैं? आइए, इस महत्वपूर्ण मिशन की पूरी कहानी को विस्तार से समझते हैं।
इस मिशन की शुरुआत अंडमान द्वीपों के तट से करीब 15 किलोमीटर दूर एक रणनीतिक स्थान से हुई। यहां समंदर के तल से लगभग 1900 मीटर की गहराई पर ‘श्री विजयापुरम-3’ नामक कुएं की ड्रिलिंग की गई। ऑयल इंडिया लिमिटेड के इस साहसिक ऑपरेशन के जो परिणाम सामने आए, उसने भारत सरकार और विशेषज्ञों में उत्साह भर दिया है। टेस्टिंग के दौरान वहां गैस के जलने (फ्लेयरिंग) के स्पष्ट संकेत मिले, जिससे यह सिद्ध हो गया कि समंदर के नीचे एक पूरा ‘पेट्रोलियम सिस्टम’ सक्रिय है।
इसका सरल अर्थ यह है कि अंडमान के नीचे न केवल गैस मौजूद है, बल्कि वहां विशाल रिज़र्वयर (भंडार) भी उपलब्ध हैं। पहले अंडमान को श्रेणी-2 (संभावित क्षेत्र) में रखा गया था, लेकिन विजयापुरम-2 और 3 की इस बंपर खोज के बाद अब यह श्रेणी-1 की ओर बढ़ रहा है, जिसका अर्थ है कि यहां से व्यावसायिक उत्पादन जल्द शुरू किया जा सकता है।
यह खोज केवल एक कुएं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बड़े बदलाव का संकेत है जिसका भारत को दशकों से इंतज़ार था। इस सफलता ने भारत सरकार को वह आत्मविश्वास दिया है कि अब देश की ऊर्जा नीति का फोकस पश्चिमी तट (मुंबई हाई) से हटाकर पूर्वी तट पर केंद्रित किया जाए। अब तक उपेक्षित रहे पूरब के विशाल समुद्री क्षेत्र के लिए सरकार ने एक मेगा ऑफशोर सर्वे का खाका तैयार कर लिया है।
भारत अब अपने पूर्वी समुद्री तट का एक नया ‘डिजिटल अल्ट्रासाउंड’ कर रहा है। ‘टू-डी ब्रॉडबैंड मेरीन सीस्मिक’ तकनीक के जरिए आधुनिक जहाजों द्वारा समंदर की लहरों के नीचे 3D मैप तैयार किया जा रहा है। सुपरकंप्यूटर्स की मदद से यह पता लगाया जा रहा है कि किन चट्टानों के बीच गैस और तेल का खजाना छिपा है।
वर्तमान में भारत अपनी कच्चा तेल की जरूरत का 88% और गैस का 50% हिस्सा विदेशों से आयात करता है। मिडिल ईस्ट में तनाव या वैश्विक युद्धों के कारण तेल की कीमतों में होने वाली वृद्धि सीधे आम आदमी की जेब पर असर डालती है। ऐसे में ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को साकार करने के लिए स्वदेशी ऊर्जा उत्पादन अनिवार्य हो गया है, ताकि विदेशी झटकों से देश की अर्थव्यवस्था को बचाया जा सके।
कच्चे तेल की कीमतों में मामूली बढ़ोत्तरी भी देश के अरबों डॉलर बाहर ले जाती है। यदि यह पैसा देश में बचेगा, तो करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) कम होगा और रुपया मजबूत होगा। अंडमान की यह सफलता इसी दिशा में एक संजीवनी बूटी की तरह काम करेगी, जिसे सरकार की ‘ओपन एकरेज लाइसेंसिंग पॉलिसी’ से और अधिक बल मिल रहा है।
भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए चार प्रमुख बेसिन अब अग्रिम मोर्चे पर हैं। पहला है महानदी बेसिन, जहां ओडिशा के तट पर जैविक तरीके से बनी ‘बायोजेनिक गैस’ के अथाह भंडार मिलने की प्रबल संभावना है।
दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र बंगाल-पूर्णिया बेसिन है, जो 1.20 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है। विशेषज्ञों का मानना है कि यहां 10 किलोमीटर से भी गहरी सेडिमेंटरी परतें हैं, जो इसे भविष्य का नया ‘मुंबई हाई’ बना सकती हैं।
तीसरा है कावेरी बेसिन, जहां तमिलनाडु तट के गहरे पानी में छिपे बड़े तेल और गैस भंडार को निकालने की तैयारी चल रही है।
चौथा महत्वपूर्ण नाम कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन है, जिसे पहले से ही भारत का ‘गैस हब’ कहा जाता है। नई सीस्मिक स्टडीज से संकेत मिले हैं कि इसके अनछुए गहरे इलाकों में अभी भी ऊर्जा का विशाल भंडार छिपा हुआ है।
इस मेगा-मिशन का पैमाना इतना बड़ा है कि अगले दो सालों में बंगाल-पूर्णिया, अंडमान, केजी बेसिन और कावेरी के क्षेत्रों में लाखों किलोमीटर का सीस्मिक सर्वे किया जाएगा। यह एक निरंतर चलने वाला विशाल ऑपरेशन है जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नई ऊंचाई पर ले जाएगा।
जब घरेलू गैस उत्पादन बढ़ेगा, तो इसका सीधा लाभ आम जनता को मिलेगा। बिजली, खाद और औद्योगिक लागत कम होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने से भारत की विदेश नीति और भी सशक्त और मुखर होकर उभरेगी।
जब पूर्वी तट के ये भंडार सक्रिय हो जाएंगे, तो भारत वैश्विक मंच पर एक प्रभावशाली प्लेयर बन जाएगा। हम केवल एक बड़े आयातक (Buyer) नहीं रहेंगे, बल्कि अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खुद समर्थ होंगे, जिससे कोई भी विदेशी ताकत हमें आर्थिक रूप से दबाव में नहीं ले पाएगी।
इस मिशन में एआई (AI) और मशीन लर्निंग जैसी वर्ल्ड-क्लास टेक्नोलॉजी का उपयोग हो रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, भारत के पास अभी भी 42 बिलियन टन का अनटैप्ड हाइड्रोकार्बन पोटेंशियल है। अंडमान की सफलता इस बड़े विज़न की बस एक छोटी सी झलक है।
भारत के ऑफशोर क्षेत्रों में छिपी इस संभावना ने अब दुनिया की बड़ी तेल कंपनियों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है। उम्मीद है कि जल्द ही विदेशी निवेश और आधुनिक तकनीक के साथ ये प्रोजेक्ट्स भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में नई पहचान दिलाएंगे।
स्पष्ट है कि सीमा पर जवान और समंदर में हमारे वैज्ञानिक एक ही लक्ष्य के लिए काम कर रहे हैं—एक सशक्त और सुरक्षित भारत। अंडमान में मिली गैस की यह खोज साबित करती है कि भारत अब समंदर का सीना चीरकर अपनी शक्ति निकालने की क्षमता रखता है। महानदी से लेकर अंडमान तक, ऊर्जा की यह लौ भारत को आने वाले दशक में दुनिया की सबसे बड़ी ऊर्जा शक्तियों में शामिल करेगी।

