हथियारों की दुनिया में भारत का डंका: अब रूसी सुखोई-57 को क्यों है भारतीय ब्रह्मोस-एनजी की जरूरत?

हाल ही में हुए एक बड़े खुलासे ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। जहाँ पश्चिमी मीडिया यह प्रचार करने में लगा था कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा मात्र एक सामान्य रक्षा सौदा है, वहीं असलियत इसके ठीक उलट निकली। दशकों से चले आ रहे खरीदार और विक्रेता के रिश्ते में अब ऐतिहासिक बदलाव आ चुका है। आज भारत न केवल रूस से आधुनिक हथियार ले रहा है, बल्कि रूस भी अपनी पाँचवीं पीढ़ी के सबसे घातक फाइटर जेट्स के लिए भारत की एडवांस मिसाइल टेक्नोलॉजी और स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक्स पर निर्भर होने लगा है।

इस रणनीतिक बदलाव की नींव किर्गिस्तान के बिश्केक में एससीओ समिट के दौरान ही रख दी गई थी। यहाँ पीएम मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच एक बुलेटप्रूफ लिमोजिन में हुई चालीस मिनट की गोपनीय बातचीत ने भविष्य का रोडमैप तैयार कर दिया था। भारत ने स्पष्ट कर दिया कि वह अपनी ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ से कभी समझौता नहीं करेगा। जब पुतिन दिल्ली पहुँचे, तो फाइलों में दर्ज समझौते सिर्फ सैन्य डील्स नहीं थे, बल्कि एक नए वैश्विक समीकरण की शुरुआत थे।

ब्रह्मोस-एनजी और रूस की रणनीतिक जरूरत

इस द्विपक्षीय वार्ता का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र ‘ब्रह्मोस-एनजी’ मिसाइल रही। रक्षा जगत के विशेषज्ञ इस बात पर गौर कर रहे हैं कि रूस को अचानक भारत की इस सुपरसोनिक मिसाइल की आवश्यकता क्यों पड़ी? शुरुआत में ब्रह्मोस प्रोजेक्ट में रूस की हिस्सेदारी पैंसठ प्रतिशत थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भारत ने इसमें अस्सी प्रतिशत से अधिक स्वदेशी कलपुर्जे लगा दिए हैं। भारत द्वारा विकसित मात्र सत्रह ग्राम की ‘जी3ओएम’ नेविगेशन चिप ने इस मिसाइल की मारक क्षमता को डिजिटल क्रांति से जोड़ दिया है।

यूक्रेन युद्ध के अनुभवों ने रूस को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर किया है, जहाँ नाटो के एयर डिफेंस सिस्टम ने भारी मिसाइलों को चुनौती दी है। वहीं ब्रह्मोस-एनजी, जिसका वजन मात्र 1.2 टन है और रफ्तार मैक 3.5 है, दुश्मन के रडार के लिए लगभग अदृश्य है। यह मिसाइल अपनी छोटी बनावट और अत्यधिक गति के कारण एक अचूक ‘ब्रह्मास्त्र’ साबित हो रही है।

सबसे रोमांचक पहलू यह है कि रूस के पास अपने पाँचवीं पीढ़ी के ‘सुखोई-57 फेलन’ के इंटरनल वेपन्स बे में फिट होने वाली कोई सुपरसोनिक मिसाइल नहीं थी। ब्रह्मोस-एनजी को विशेष रूप से इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह इस स्टील्थ जेट के अंदर समा सके। इससे रूसी फाइटर जेट्स अपनी अदृश्यता बनाए रखते हुए 400 किलोमीटर दूर से ही दुश्मन को तबाह कर सकेंगे। लखनऊ में स्थापित नया प्लांट अब इस मिसाइल के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तैयार है।

सुपर सुखोई और एयर डिफेंस का अभेद्य किला

भारतीय वायुसेना की ताकत बढ़ाने के लिए 92 हजार करोड़ रुपये के ‘सुपर सुखोई’ अपग्रेडेशन प्रोजेक्ट को अंतिम रूप दे दिया गया है। इसके तहत 84 सुखोई विमानों को भारतीय ‘विरुपाक्ष एईएसए रडार’ और डिजिटल कॉकपिट से लैस किया जाएगा। इसमें रूस की ‘आर-37एम’ मिसाइल का एकीकरण किया जा रहा है, जो 400 किलोमीटर की दूरी से ही दुश्मन के विमानों का शिकार करने में सक्षम है।

इसके साथ ही, रूस ने सुखोई-57 के इंजन की कोर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT) करने पर सहमति जताई है, जो भारत के स्वदेशी ‘एएमसीए’ (AMCA) प्रोजेक्ट के लिए मील का पत्थर साबित होगी। वहीं, एयर डिफेंस के मोर्चे पर एस-400 की पाँचवीं स्क्वाड्रन की डिलीवरी नवंबर तक पूरी होने की उम्मीद है। रूस ने भारत में ही इन प्रणालियों के लिए एमआरओ हब (MRO Hub) बनाने का भी प्रस्ताव दिया है।

डॉलर के वर्चस्व को चुनौती और आर्थिक साझेदारी

रक्षा क्षेत्र के अलावा, दोनों देशों ने ‘पेट्रो-डॉलर’ के वैश्विक प्रभाव को कम करने की दिशा में भी बड़े कदम उठाए हैं। भारत और रूस का व्यापार 65 बिलियन डॉलर को पार कर चुका है, जिसे 2030 तक 100 बिलियन डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य है। पश्चिमी प्रतिबंधों को बेअसर करने के लिए भारतीय ‘एसएफएमएस’ और रूसी ‘एसपीएफएस’ मैसेजिंग सिस्टम को जोड़ा गया है।

वर्तमान में तीस से अधिक रूसी बैंक भारतीय बैंकों में ‘स्पेशल रुपी वोस्ट्रो अकाउंट्स’ के जरिए कारोबार कर रहे हैं। इसके अलावा, रूस ने अपने साइबेरियाई क्षेत्र के खनिज संसाधनों जैसे लिथियम, टाइटेनियम और निकल के भंडार को भारतीय कंपनियों के लिए खोल दिया है, जो भविष्य की तकनीक के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

भू-राजनीति और नया वैश्विक ढांचा

व्यापारिक कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने के लिए ‘INSTC कॉरिडोर’ पर तेजी से काम हो रहा है, जो मुंबई से सेंट पीटर्सबर्ग तक का समय और लागत दोनों को काफी कम कर देगा। अमेरिका की ‘काट्सा’ (CAATSA) प्रतिबंधों की धमकी के बावजूद भारत अपने हितों पर अडिग है। अमेरिका भी जानता है कि इंडो-पैसिफिक में चीन को रोकने के लिए उसे भारत की जरूरत है, इसलिए वह प्रतिबंधों के बजाय सहयोग की राह तलाश रहा है।

निष्कर्षतः, भारत और रूस के बीच हालिया घटनाक्रम केवल रक्षा सौदों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक बहुध्रुवीय विश्व की नींव है। यह गठबंधन अब मात्र क्रेता-विक्रेता का नहीं, बल्कि दो समान महाशक्तियों की ऐसी साझेदारी है जो वैश्विक राजनीति की दिशा और दशा को नई परिभाषा दे रही है।

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