हिमालय की गोद में बसे उस देश के साथ हमारे रिश्ते अब बदल चुके हैं, जिसे हम कभी अपना दूसरा घर मानते थे। मई 2026 का यह समय इतिहास के पन्नों में एक चुनौतीपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज होने जा रहा है। भारत और नेपाल की वह सीमा, जहाँ कभी बेरोकटोक आवाजाही होती थी, आज लोहे की जंजीरों और सख्त नियमों की दीवारों से घिर गई है। नेपाल ने अचानक अपना रुख बदल लिया है। काठमांडू से निकले एक आदेश ने दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार तक की सरकारों को चिंता में डाल दिया है। क्या यह सिर्फ एक प्रशासनिक निर्णय है या भारत के विरुद्ध कोई बड़ी अंतरराष्ट्रीय बिसात बिछाई जा रही है?
आज नेपाल के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा का कड़ा पहरा है, और यह सख्ती अपनों के लिए ही बढ़ाई गई है। काठमांडू की बालेन सरकार ने ऐसी चाल चली है कि आज यदि आप भारत से नेपाल जाने का विचार कर रहे हैं, तो आपको सौ बार सोचना होगा। वहां प्रवेश करना अब किसी दूसरे ग्रह पर जाने जितना जटिल बना दिया गया है। लिपुलेख के पुराने विवाद से लेकर सीमा शुल्क की कड़ाई तक, नेपाल ने ऐसी घेराबंदी की है कि आम भारतीयों के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं। जिस नेपाल के साथ हमारा ‘रोटी-बेटी’ का अटूट रिश्ता था, वह आज कड़े तेवर दिखा रहा है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि कल तक का सहयोगी आज विरोध में खड़ा है? क्या इसके पीछे नेपाल की घरेलू राजनीति है या पश्चिम बंगाल के सियासी बदलावों का असर?
इस कड़वे सत्य को समझना आवश्यक है। पश्चिम बंगाल में हालिया चुनावी उलटफेर के बाद जैसे ही राष्ट्रवादी सरकार सत्ता में आई, अवैध घुसपैठियों और रोहिंग्याओं पर कड़ी कार्रवाई शुरू हुई। जब बंगाल में इन तत्वों के लिए जगह नहीं बची, तो उन्होंने नेपाल को सुरक्षित ठिकाने के रूप में देखा। इसी घुसपैठ के डर ने काठमांडू की चिंता बढ़ा दी है। नेपाल सरकार को भय है कि बंगाल से निकाले गए लोग नेपाल में शरण न ले लें। इसी को आधार बनाकर नेपाल ने मोरंग जिले की 38 किलोमीटर लंबी सीमा को पूरी तरह सील कर दिया है, जो पिछले 70 वर्षों में कभी नहीं हुआ था।
नेपाल प्रशासन ने अब स्पष्ट अल्टीमेटम दिया है कि बिना ‘वैध पहचान पत्र’ के किसी को भी प्रवेश नहीं मिलेगा। यदि आपके पास आधार कार्ड, वोटर आईडी या पासपोर्ट नहीं है, तो नेपाल के रास्ते आपके लिए बंद हैं। यहाँ तक कि 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए भी जन्म प्रमाण पत्र या स्कूल आईडी अनिवार्य कर दी गई है। यह केवल एक नियम नहीं, बल्कि सीमा पर रहने वाले उन भारतीयों के लिए एक मानसिक प्रताड़ना है जो रोजमर्रा के काम के लिए सीमा पार करते हैं। गरीब मजदूरों और व्यापारियों को पहचान पत्रों के नाम पर अपमानित कर बॉर्डर से वापस भेजा जा रहा है।
नेपाल की नई बालेन सरकार का रवैया अत्यंत आक्रामक और कट्टर राष्ट्रवादी है। काठमांडू के मेयर बालेन शाह का प्रभाव अब नेपाल की विदेश नीति पर स्पष्ट रूप से दिख रहा है। वे नेपाल को एक ‘कठोर राष्ट्र’ के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं, लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि नेपाल की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा भारत पर निर्भर है। भारतीय वाहनों की सघन जांच और ट्रकों को घंटों धूप में खड़ा रखने की प्रक्रिया ने व्यापार की कमर तोड़ दी है। भारतीय ड्राइवरों के साथ बदसलूकी की बढ़ती घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि नेपाल अब भारत पर दबाव बनाने की राजनीति कर रहा है।
नेपाल का यह दुस्साहस केवल प्रवेश प्रतिबंध तक सीमित नहीं है, उसने लिपुलेख जैसे विवादित क्षेत्रों पर भी फिर से स्वर मुखर करना शुरू कर दिया है। बालेन सरकार भारत विरोध के नाम पर अपनी जनता के बीच लोकप्रियता बटोरना चाहती है। लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि 2026 का भारत अब किसी भी प्रकार के अपमान को स्वीकार नहीं करेगा। यदि नेपाल ने अपनी सीमाएं सख्त की हैं, तो भारत की एसएसबी (SSB) भी अब ‘हाई अलर्ट’ पर है। अररिया से किशनगंज तक भारतीय जवानों ने भी सख्त निगरानी शुरू कर दी है, ताकि नेपाल को उसी की भाषा में जवाब दिया जा सके।
मोरंग प्रशासन ने सोनामनी गोदाम से लेकर आमबारी तक पुलिस और एपीएफ (APF) की भारी तैनाती कर दी है। रविवार के दिन सीमा पर जो तस्वीरें सामने आईं, वे किसी युद्ध क्षेत्र जैसी थीं। मेघा-मायागंज और सिकटी-सुनवार्षि बॉर्डर पर भारतीयों की लंबी कतारें लगी रहीं। छोटी-छोटी तकनीकी कमियों का बहाना बनाकर भारतीय नागरिकों को वापस भेजा जा रहा है। इस सख्ती का सबसे बुरा प्रभाव उन दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ रहा है जो रोज नेपाल जाकर अपनी जीविका कमाते थे। उनके लिए अब अपना जीवन यापन करना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
प्रशासनिक तौर पर इसे ‘स्ट्रिक्ट बॉर्डर मैनेजमेंट’ का नाम दिया गया है, लेकिन इसकी टाइमिंग कई सवाल खड़े करती है। जब भारत अपने यहाँ से अवैध तत्वों को बाहर कर रहा है, तो नेपाल की चिंता जायज हो सकती है, लेकिन उसका तरीका पूरी तरह भारत-विरोधी है। जब सीमा पर 90 प्रतिशत आवाजाही भारतीयों की है, तो इन नियमों का सीधा निशाना कौन है? भारत के राष्ट्रवादी हलकों में अब यह मांग उठने लगी है कि यदि नेपाल ऐसा व्यवहार कर रहा है, तो भारत को भी अपनी ‘ओपन बॉर्डर पॉलिसी’ को समाप्त कर देना चाहिए। भारत ने हमेशा बड़े भाई की भूमिका निभाई, लेकिन यदि मित्रता का जवाब परेशानी से दिया जाए, तो ऐसी नीति पर पुनर्विचार आवश्यक है।
इतिहास साक्षी है कि जब भी नेपाल ने भारत के साथ संबंधों में तनाव पैदा किया है, वहां की आम जनता को ही कष्ट झेलना पड़ा है। 2015 की नाकेबंदी हो या 2026 की यह नई जिद, नुकसान नेपाल का ही होगा। विराटनगर और मोरंग के बाजार आज भारतीय ग्राहकों के बिना सूने पड़े हैं। बालेन सरकार को समझना होगा कि भारत से विवाद मोल लेना नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकता है। भारत सरकार स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए है और कार्यवाहक कमांडेंट पी.एन. सिंह के अनुसार सुरक्षा में कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
नेपाल अब नए सीमा शुल्क नियम लाने की तैयारी में है, जो भारत की एक तरह से ‘आर्थिक घेराबंदी’ है। हर वस्तु पर भारी कर और जटिल कागजी प्रक्रिया भारतीयों को हतोत्साहित करने के लिए है। नेपाल को लगता है कि दीवारें ऊंची करने से वह सुरक्षित हो जाएगा, लेकिन वह यह भूल रहा है कि भारत की मित्रता ही उसका असली कवच है। यदि नेपाल ने यह कड़वाहट और बढ़ाई, तो उसे भविष्य के संकटों का सामना अकेले ही करना होगा। भारत सहयोग के लिए सदैव तत्पर है, लेकिन अपने स्वाभिमान की कीमत पर नहीं।

