पाकिस्तान की सूखी रगों में खौफ
इस्लामाबाद के सत्ता के गलियारों में आजकल एक अलग ही खौफ पसरा हुआ है। यह डर किसी लड़ाकू विमान या सीमा पर तैनात टैंकों का नहीं, बल्कि पानी का है। वही पानी जो भारत के ऊंचे पहाड़ों से बहकर पाकिस्तान की प्यास बुझाता है और उसकी अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन है। दशकों तक आतंकवाद को पालने वाले पाकिस्तान को अब अहसास हो रहा है कि यदि भारत ने अपने हिस्से के पानी का रुख मोड़ दिया, तो उसका अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। नई दिल्ली के एक साहसिक और रणनीतिक निर्णय ने पाकिस्तान की नींद छीन ली है। भारत ने दोटूक कह दिया है कि ‘खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते’। इसी के साथ उस मास्टरस्ट्रोक की शुरुआत हो गई है, जिसे पाकिस्तान अब ‘हाइड्रो वॉर’ या जल युद्ध का नाम दे रहा है।
सिंधु जल संधि क्या है और भारत ने कैसे बदली रणनीति
इस पूरे मामले को समझने के लिए इतिहास में जाना जरूरी है। साल 1960 में वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता से भारत और पाकिस्तान के बीच ‘सिंधु जल संधि’ (Indus Water Treaty) हुई थी। इसके तहत सिंधु बेसिन की छह नदियों का बंटवारा किया गया। रावी, ब्यास और सतलुज जैसी तीन पूर्वी नदियों पर भारत का पूर्ण नियंत्रण रहा, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों का अधिकांश पानी पाकिस्तान के हिस्से में गया। पिछले 65 वर्षों से भारत ने एक आदर्श पड़ोसी की तरह इस संधि का पालन किया, लेकिन बदले में पाकिस्तान ने केवल आतंकवाद और घुसपैठ को बढ़ावा दिया।
भारत की सहनशीलता अब जवाब दे चुकी है। पिछले साल पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने स्पष्ट कर दिया कि अब बहुत हो चुका। अप्रैल 2025 से भारत ने इस संधि को निलंबित करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है। भारत का संदेश साफ है: जब तक सीमा पार से आतंक नहीं रुकेगा, तब तक किसी संधि का कोई औचित्य नहीं है। इस एकतरफा फैसले ने पाकिस्तान के पूरे सरकारी तंत्र को झकझोर दिया है।
पाकिस्तानी सीनेटर शेरी रहमान का ‘हाइड्रो वॉर’ का विलाप
भारत की इस आक्रामक रणनीति का असर पाकिस्तान में दिखने लगा है। पाकिस्तान की वरिष्ठ नेता और पूर्व जलवायु मंत्री शेरी रहमान ने इसे लेकर अपनी चिंता जाहिर की है। उन्होंने ‘जियो टीवी’ के लिए लिखे अपने लेख में इसे भारत का ‘हाइड्रो वॉर: पार्ट-1’ करार दिया है।
शेरी रहमान अपने लेख में ‘विक्टिम कार्ड’ खेलते हुए आरोप लगा रही हैं कि भारत हथियारों के बजाय बांधों और डेटा शेयरिंग को रोककर पाकिस्तान पर दबाव बना रहा है। उन्हें दुख इस बात का है कि भारत अब उस 65 साल पुराने कानूनी ढांचे को चुनौती दे रहा है जिसे पाकिस्तान अपनी ढाल मानता था। वह कहती हैं कि संधि के अनुच्छेद तीन के अनुसार भारत पश्चिमी नदियों का पानी रोकने के लिए बाध्य है, लेकिन भारत के वर्तमान रुख ने पाकिस्तान के कृषि और आम जनता के सामने जल संकट खड़ा कर दिया है।
अंतरराष्ट्रीय कानून और पाकिस्तान की बेबसी
जब पाकिस्तान खुद को घिरा हुआ पाता है, तो वह वैश्विक कानूनों की दुहाई देने लगता है। शेरी रहमान का दावा है कि भारत एकतरफा तरीके से संधि से पीछे नहीं हट सकता और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत इसका कोई महत्व नहीं है। वह अनुच्छेद 12 और हेग स्थित ‘परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ का हवाला दे रही हैं।
हालांकि, भारत अब इन कानूनी दांव-पेंचों से ऊपर उठकर अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय दबाव की परवाह किए बिना, भारत ने कश्मीर और आसपास के क्षेत्रों में अपने जल परियोजनाओं के निर्माण कार्य को तेज कर दिया है, जो पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
भारत के 17 प्रोजेक्ट्स और पाकिस्तान की बेचैनी
शेरी रहमान का मुख्य विरोध भारत की उन 17 जल परियोजनाओं को लेकर है जो सिंधु नदी तंत्र पर निर्माणाधीन हैं। उनका आरोप है कि भारत ‘हाइड्रो-हेजेमनी’ (जल-प्रभुत्व) स्थापित करना चाहता है। पाकिस्तान 2016 में भी किशनगंगा और रातले परियोजनाओं के खिलाफ कोर्ट गया था, लेकिन भारत के कदम नहीं थमे। भारत तेजी से अपने ‘रन-ऑफ-रिवर’ प्रोजेक्ट्स को पूरा कर रहा है।
पाकिस्तानी पक्ष का कहना है कि भारत बिना किसी जानकारी के सावलकोट, पाकल दुल, किरू, क्वार और रातले जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है। पाकिस्तान की बौखलाहट इतनी है कि उसने दुलहस्ती स्टेज-2 की मंजूरी को लेकर भी आपत्ति जताई है, जिसे जनवरी 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य है।
चिनाब के बहाव पर भारत का पूर्ण नियंत्रण
भारत अब रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक भूमिका में है। पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि 2025 में बुवाई के सीजन के दौरान भारत ने बगलिहार बांध के गेट बंद कर चिनाब का पानी रोक दिया था। इसके विपरीत, सलाल जलाशय से अचानक पानी छोड़ने के कारण पाकिस्तान के निचले इलाकों में बाढ़ जैसी स्थिति बन गई।
अब भारत सलाल प्रोजेक्ट से गाद (Silt) हटाने की तैयारी में है, जिससे पानी के प्रवाह पर भारत का नियंत्रण और भी मजबूत हो जाएगा। पाकिस्तान के अनुसार, उन्होंने इस संदर्भ में भारत को कई पत्र लिखे, लेकिन भारत की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। आंकड़ों के मुताबिक, मई 2025 में चिनाब का बहाव जिस तरह से बदला, वह भारत के रणनीतिक नियंत्रण का परिणाम था।
अमित शाह की घोषणा: पाकिस्तान के लिए अंतिम चेतावनी
भारत के गृह मंत्री अमित शाह के एक हालिया बयान ने पाकिस्तान में डर को और गहरा कर दिया है। उन्होंने घोषणा की है कि भारत अगले तीन सालों में चिनाब के पानी का रुख मोड़ने के लिए 113 किलोमीटर लंबी नहर का निर्माण करेगा। यह पानी जम्मू, पंजाब और राजस्थान के सूखे इलाकों की प्यास बुझाएगा।
अमित शाह ने स्पष्ट किया कि भारत अब सिंधु जल संधि को बहाल करने के पक्ष में नहीं है। वहीं, जल मंत्री ने भी संकेत दिए हैं कि भविष्य में पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी में भारी कटौती हो सकती है। यह नए भारत का विजन है, जहां संसाधनों का उपयोग पहले अपने नागरिकों के लिए किया जाएगा, न कि उस पड़ोसी के लिए जो पीठ में छुरा घोंपता है।
पाकिस्तान की धमकियां और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा का राग
कोई रास्ता न दिखने पर पाकिस्तानी नेता अब धमकियों पर उतर आए हैं। शेरी रहमान का तर्क है कि यदि भारत इन प्रोजेक्ट्स को युद्ध के हथियार की तरह इस्तेमाल करता है, तो इन्हें मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा समाप्त हो जाएगी। यह परोक्ष रूप से इन परियोजनाओं को निशाना बनाने की एक गीदड़भभकी है।
वह कहती हैं कि सिंधु संधि पाकिस्तान के किसानों की जीवनरेखा है। लेकिन वह यह भूल रही हैं कि भारत अब किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर अपनी सुरक्षा और संप्रभुता से समझौता करने को तैयार नहीं है।
भारत का कड़ा संदेश
आज की वास्तविकता यह है कि भारत ने उस पुरानी व्यवस्था को त्याग दिया है जो आतंकवाद और कूटनीति को अलग-अलग देखती थी। सिंधु संधि के प्रति भारत का सख्त रवैया और चिनाब पर जारी निर्माण कार्य यह दर्शाते हैं कि भारत अब निर्णायक भूमिका में है। पाकिस्तान के ‘हाइड्रो टेररिज्म’ के आरोप भारत के संकल्प को नहीं डिगा सकते। भारत ने तय कर लिया है कि जो देश भारत के खिलाफ साजिशें रचेगा, उसे अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए भी संघर्ष करना होगा।

