हूती संकट और पाकिस्तान का धोखा! सऊदी अरब में अजित डोभाल के ‘मास्टरस्ट्रोक’ ने बदली मिडिल ईस्ट की कूटनीति

रियाद के शाही महल में उस समय गहरी खामोशी थी, जब क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान लाल सागर में हूती विद्रोहियों की बढ़ती घेराबंदी से चिंतित थे। ईरान समर्थित विद्रोहियों के खतरे के बीच सऊदी अरब ने अपने पुराने सुरक्षा सहयोगी पाकिस्तान से मदद मांगी, लेकिन इस्लामाबाद ने हाथ पीछे खींच लिए। जब जनरल आसिम मुनीर और शहबाज शरीफ की सरकार ने सऊदी को अकेला छोड़ा, तब भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल एक गोपनीय मिशन पर रियाद पहुंचे। डोभाल और सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान की इस रणनीतिक मुलाकात ने न केवल पाकिस्तान को किनारे लगा दिया, बल्कि अरब सागर में भारत की स्थिति को एक ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ के रूप में मजबूती से स्थापित कर दिया।

यह मिशन केवल एक राजनयिक मुलाकात नहीं थी, बल्कि पश्चिम एशिया के सुरक्षा ढांचे में एक बड़े बदलाव का संकेत था। जहाँ एक ओर पश्चिमी देश दबाव महसूस कर रहे हैं, वहीं सऊदी अरब अपनी वायुसेना के लिए भारतीय मिसाइल प्रणालियों पर गंभीरता से विचार कर रहा है। लाल सागर और बाब अल-मंडेब जैसे महत्वपूर्ण जलमार्गों पर हूती विद्रोहियों का बढ़ता प्रभाव वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए बड़ा खतरा बन गया है। इस संकट के बीच भारत की भूमिका अब सबसे महत्वपूर्ण हो गई है, जिसे डिकोड करना आवश्यक है।

संकट के समय पाकिस्तान की गद्दारी

जब भी किसी देश पर सुरक्षा संकट आता है, वह अपने रक्षा भागीदारों की ओर देखता है। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पुराने रक्षा समझौतों के बावजूद, जब यमन सीमा पर तनाव बढ़ा, तो पाकिस्तान ने कन्नी काट ली। इस्लामाबाद को डर था कि यमन मामले में पड़ने से ईरान के साथ उसके रिश्ते खराब हो सकते हैं। अपनी चरमराती अर्थव्यवस्था और घरेलू राजनीतिक अस्थिरता के कारण जनरल आसिम मुनीर ने सऊदी अरब को केवल खोखले आश्वासनों तक सीमित रखा। यह दूसरी बार था जब पाकिस्तान ने जरूरत पड़ने पर सऊदी का साथ नहीं दिया, जिससे क्राउन प्रिंस का भरोसा उस पर से पूरी तरह उठ गया। इसी शून्य को भरने के लिए भारत ने अपनी कूटनीतिक और सामरिक दक्षता का परिचय दिया।

अरब सागर में भारतीय नौसेना का बढ़ता दबदबा

भारत की विदेश नीति हमेशा से किसी सीधे युद्ध में शामिल न होने की रही है, लेकिन अपने हितों की रक्षा के लिए भारत अब और भी अधिक मुखर है। अजित डोभाल की कूटनीति के तहत भारतीय नौसेना ने अरब सागर और अदन की खाड़ी में आईएनएस कोलकाता, आईएनएस कोच्चि और आईएनएस विशाखापत्तनम जैसे विनाशक पोतों को तैनात किया है। भारतीय मार्कोस कमांडो ने समुद्री लुटेरों और संदिग्ध हमलों से जहाजों को बचाकर दुनिया को अपनी ताकत दिखाई है। भारत ने किसी पश्चिमी गठबंधन का हिस्सा बने बिना सऊदी अरब को यह भरोसा दिलाया है कि भारतीय नौसेना व्यापारिक जहाजों और तेल टैंकरों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह मुस्तैद है।

रक्षा क्षेत्र में बढ़ता सहयोग: भारतीय मिसाइलों की मांग

सऊदी अरब अब अपनी रक्षा जरूरतों के लिए केवल अमेरिका या पश्चिम पर निर्भर नहीं रहना चाहता। रिपोर्ट्स के अनुसार, सऊदी अरब भारत की ‘अस्त्र’ मिसाइल प्रणाली में गहरी रुचि दिखा रहा है। डीआरडीओ द्वारा विकसित यह बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल अपनी सटीकता और कम लागत के कारण वैश्विक स्तर पर चर्चा में है। अजित डोभाल की यात्रा के दौरान न केवल ‘अस्त्र’, बल्कि ब्रह्मोस मिसाइल, रडार सिस्टम और ड्रोन टेक्नोलॉजी पर भी चर्चा हुई है। यदि यह रक्षा सौदा सफल होता है, तो यह मध्य पूर्व के हथियारों के बाजार में भारत के लिए एक नया अध्याय होगा।

ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा

NSA अजित डोभाल के मिशन का एक मुख्य केंद्र भारत की अपनी ऊर्जा सुरक्षा भी है। भारत अपनी तेल जरूरतों का 80% आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। लाल सागर में किसी भी प्रकार की बाधा भारतीय अर्थव्यवस्था में महंगाई को बढ़ा सकती है। डोभाल ने सऊदी नेतृत्व के साथ मिलकर एक ऐसा सुरक्षा तंत्र बनाने पर चर्चा की है जिससे तेल की आपूर्ति में कोई रुकावट न आए और वैश्विक सप्लाई चेन सुचारू रूप से चलती रहे।

26 लाख भारतीयों की सुरक्षा का रोडमैप

सऊदी अरब में करीब 26 लाख भारतीय नागरिक कार्यरत हैं, जो देश के लिए विदेशी मुद्रा का एक बड़ा स्रोत हैं। किसी भी क्षेत्रीय तनाव की स्थिति में इन नागरिकों की सुरक्षा भारत की प्राथमिकता है। डोभाल और सऊदी प्रशासन के बीच आपातकालीन स्थिति में भारतीयों की सुरक्षा और निकासी (Evacuation) की योजना पर भी विस्तृत बातचीत हुई है।

IMEC कॉरिडोर और भविष्य की रणनीति

यह कूटनीतिक सक्रियता ‘इंडिया-मिडल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर’ (IMEC) को जीवित रखने के लिए भी महत्वपूर्ण है। हालाँकि क्षेत्रीय संघर्षों के कारण इस पर सवाल उठ रहे थे, लेकिन भारत और सऊदी का मजबूत होता रिश्ता यह बताता है कि दोनों देश इस भविष्य के व्यापारिक मार्ग को लेकर गंभीर हैं। पाकिस्तान का सुरक्षा के बदले आर्थिक मदद वाला मॉडल अब विफल हो चुका है, जबकि भारत का सहयोग विकास और विश्वास पर आधारित है।

पाकिस्तान ने दशकों तक खाड़ी देशों को जो सुरक्षा का भ्रम बेचा था, वह अब टूट गया है। आज भारत और सऊदी अरब के बीच द्विपक्षीय व्यापार 50 अरब डॉलर से अधिक है। जहाँ पाकिस्तान निवेश के लिए गिड़गिड़ा रहा है, वहीं सऊदी अरब भारत के बुनियादी ढांचे में भारी निवेश कर रहा है।

अजित डोभाल की व्यावहारिक कूटनीति ने भारत को मध्य पूर्व में एक संतुलित शक्ति बना दिया है। भारत एक ओर सऊदी और यूएई के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है, तो दूसरी ओर ईरान के साथ चाबहार पोर्ट के माध्यम से अपने रास्ते खोल रहा है। भारत की यह स्वतंत्र विदेश नीति ही उसे वैश्विक राजनीति का एक महत्वपूर्ण ध्रुव बनाती है।

बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत और सऊदी अरब अब एक साझा विजन पर काम कर रहे हैं। समुद्री रास्तों की सुरक्षा से लेकर खुफिया जानकारी साझा करने तक, दोनों देशों के बीच तालमेल अब पहले से कहीं अधिक गहरा है। यह स्थिरता न केवल भारत बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के हित में है।

सऊदी अरब का भारत की ओर बढ़ता भरोसा इस बात का प्रमाण है कि नई दिल्ली अब संकट के समय केवल बयानबाजी नहीं करती, बल्कि मैदान में उतरकर सुरक्षा की जिम्मेदारी लेती है। आने वाले समय में भारत और सऊदी का यह गठजोड़ इंडो-पैसिफिक से लेकर पश्चिम एशिया तक एक नए युग की शुरुआत करेगा।

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