भारत की 11 टका वाली बिजली ठुकराकर चीन से 25 टका में क्यों खरीद रहा बांग्लादेश? जानिए इनसाइड स्टोरी

जब कट्टरपंथी विचारधारा अपनी सीमाओं से परे जाने की कोशिश करती है, तो उसका पतन निश्चित होता है। भारत में ब्रिक्स (BRICS) समिट की भारी सफलता के बीच, नई दिल्ली ने बिम्सटेक के अध्यक्ष के तौर पर पड़ोसी देश बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को भी आमंत्रित किया था। हालांकि, तारिक रहमान ने इसे कूटनीतिक मोड़ देते हुए दावा किया कि उन्हें द्विपक्षीय निमंत्रण नहीं मिला है और वे समिट में शामिल नहीं होंगे। शायद वे भूल गए हैं कि दिल्ली में अब वो दौर बीत चुका है जब भाईचारे के नाम पर देशों को अनुचित रियायतें दी जाती थीं। अब भारत सीधे हिसाब करने में विश्वास रखता है। जैसे ही ढाका से उनके न आने और मंत्रियों के विवादित बयानों की पुष्टि हुई, दिल्ली ने एक ‘साइलेंट बटन’ दबाया और तकनीकी खराबी के चलते पूरे बांग्लादेश की आधी बिजली गुल हो गई।

इस ‘तकनीकी खराबी’ के समय और प्रभाव को समझना जरूरी है। बांग्लादेश पहले से ही बिजली संकट से जूझ रहा है और भारत उसे बड़े पैमाने पर बिजली निर्यात करता है। अचानक झारखंड स्थित अडानी पावर के गोड्डा अल्ट्रा सुपरक्रिटिकल पावर प्लांट की दो इकाइयों में से एक बंद हो गई। द डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक, 800 मेगावाट की इस यूनिट के बॉयलर में गुरुवार आधी रात को खराबी आई। पावर ग्रिड बांग्लादेश के आंकड़ों के अनुसार, इस शटडाउन के बाद सप्लाई 1400 मेगावाट से गिरकर 750 मेगावाट से भी नीचे आ गई। बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड (PDB) के अधिकारियों के अनुसार, बॉयलर को ठंडा होने में 48 घंटे लगेंगे और सप्लाई बहाल होने में कई दिन लग सकते हैं।

बांग्लादेशी विशेषज्ञ मजमुल अहसान का मानना है कि पीएम के भारत न जाने के बयान के तुरंत बाद पावर प्लांट में खराबी आना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक कड़ा संदेश है। वर्तमान में बांग्लादेश में लोड शेडिंग 2500 मेगावाट को पार कर चुकी है। देश का पावर सिस्टम ईंधन की कमी से पहले ही चरमराया हुआ है। लेकिन बात सिर्फ बिजली तक नहीं है; बांग्लादेश की बीएनपी सरकार अब भारत के साथ हुए 101 समझौतों (MoUs) की समीक्षा और उन्हें रद्द करने की धमकी दे रही है। उनका मुख्य निशाना चटगांव और मोंगला पोर्ट हैं, जो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (असम, त्रिपुरा, मेघालय) के लिए जीवनरेखा का काम करते हैं।

भारत ने अपनी रणनीति के तहत अब ‘प्लान बी’ सक्रिय कर दिया है। बिना किसी सैन्य कार्रवाई के, मोदी सरकार ने बांग्लादेश की आर्थिक घेराबंदी शुरू कर दी है। कोलकाता एयरपोर्ट के जरिए बांग्लादेशी माल के निर्यात की विशेष सुविधा वापस ले ली गई है। साथ ही जूट, टेक्सटाइल, प्लास्टिक और लकड़ी के फर्नीचर जैसे कई बांग्लादेशी आयातों पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए हैं, जिसका सीधा असर ढाका की अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है।

कट्टरपंथ में अंधा होकर बांग्लादेश अब आत्मघाती कदम उठा रहा है। जिस भारत ने मामूली चार्ज पर सस्ती बिजली दी, उसका उसने विरोध किया। लेकिन अब वही बांग्लादेश चीन की कंपनी के साथ ‘वेस्ट-टू-एनर्जी’ प्रोजेक्ट के लिए 25 टका प्रति यूनिट देने को तैयार है। अमीनबाजार लैंडफिल प्रोजेक्ट के लिए दी जा रही यह कीमत भारत की 11.72 टका वाली दर से करीब 127% अधिक है। यह साफ दिखाता है कि बांग्लादेश अब चीन के उसी ‘डेब्ट ट्रैप’ (कर्ज के जाल) में फंस रहा है जिसने श्रीलंका का भविष्य तबाह कर दिया था।

बांग्लादेश के भीतर हालात बदतर होते जा रहे हैं। मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री ठप पड़ रही है और ग्रामीण इलाकों में 10 से 15 घंटे की कटौती हो रही है। बड़ी अंतरराष्ट्रीय कपड़ा कंपनियां अपना उत्पादन घटा रही हैं, जिससे लाखों मजदूर बेरोजगार हो रहे हैं। बिजली संकट के कारण झींगा पालन उद्योग, जो बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र है, पूरी तरह तबाह होने की कगार पर है। बाजारों को रात 8 बजे तक बंद करने का आदेश दिया गया है और एलपीजी की कमी से घरों में चूल्हे जलना भी मुश्किल हो गया है।

दूसरी ओर, भारत ने कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक चलते हुए बाढ़ प्रभावित नेपाल को अतिरिक्त बिजली देने का ऐलान किया है। जहां बांग्लादेश अंधेरे में डूबा है, वहीं भारत अपने मित्र देश नेपाल को रात 12 बजे से शाम 6 बजे तक बिजली देकर यह संदेश दे रहा है कि जो भारत का साथ देगा वो समृद्ध होगा, और जो दुश्मनी करेगा उसे परिणाम भुगतने होंगे।

बांग्लादेश की विदेश नीति अब पूरी तरह भटक चुकी है। वह भारत के साथ संबंधों को ‘रीसेट’ करने की बात कर रहा है और अमेरिका की ओर झुक रहा है। आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका अब बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है, जबकि भारत तीसरे स्थान पर खिसक गया है। बांग्लादेश ने अमेरिका के साथ बोइंग विमानों और भारी मात्रा में कृषि व ऊर्जा उत्पादों की खरीद के लिए अरबों डॉलर के सौदे किए हैं।

सबसे चिंताजनक पहलू बांग्लादेश और पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकियां हैं। ढाका और कराची के बीच सीधी उड़ानें शुरू हो गई हैं और दोनों देशों के बीच सैन्य खुफिया जानकारी साझा करने की खबरें भी आ रही हैं। जिस पाकिस्तान ने 1971 में बांग्लादेशियों पर अत्याचार किए, आज तारिक रहमान की सरकार उसी के साथ कूटनीतिक और रक्षा संबंधों को मजबूत कर रही है।

अजीब विरोधाभास यह है कि बांग्लादेश एक तरफ भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल है, तो दूसरी तरफ भारत-बांग्लादेश फ्रेंडशिप पाइपलाइन के जरिए अतिरिक्त डीजल की भीख भी मांग रहा है। भारत पहले ही 30 हजार टन अतिरिक्त डीजल भेज चुका है, लेकिन अब भारत की नीति स्पष्ट है: राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

मोदी सरकार ने संकेत दे दिए हैं कि यदि बांग्लादेश चटगांव पोर्ट से भारत को बाहर करने की कोशिश करेगा, तो कोलकाता पोर्ट के रास्ते उसके लिए बंद हो जाएंगे। अगर वह भारत की 11 टका की सस्ती बिजली ठुकराएगा, तो उसे चीन से महंगी बिजली खरीदकर अपनी अर्थव्यवस्था को और रसातल में ले जाने के लिए छोड़ दिया जाएगा।

यह नई दिल्ली का ‘साइलेंट पावर गेम’ है। भारत ने साबित कर दिया है कि वह एक जिम्मेदार सहयोगी है, लेकिन भारत विरोधी साजिश रचने वाले देशों को कूटनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर झुकना ही होगा। बिना सेना भेजे भारत ने बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की नब्ज पकड़ ली है।

इस कूटनीतिक घटनाक्रम पर आपकी क्या राय है? क्या भारत को बांग्लादेश के प्रति और अधिक सख्त रवैया अपनाना चाहिए? अपने विचार कमेंट बॉक्स में साझा करें।

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