रक्षा क्षेत्र में भारत की बड़ी कामयाबी: ब्रह्मोस और आकाशतीर के लिए अरब देशों में मची होड़, दुनिया दंग!

जिस रूस ने कभी दुनिया को घातक मिसाइलें और उन्नत रक्षा प्रणालियाँ बनाना सिखाया था, आज वही रूस अपनी नौसेना को सशक्त बनाने के लिए भारत की ओर देख रहा है। दूसरी ओर, मध्य पूर्व का सबसे आधुनिक और संपन्न देश यूएई, अमेरिका के भरोसेमंद पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम को छोड़कर भारत की ब्रह्मोस मिसाइल और स्वदेशी आकाशतीर प्रणाली के लिए कतार में खड़ा है। इसी बीच, इजराइल के एक शीर्ष सैन्य कमांडर का अचानक गुप्त मिशन पर दिल्ली आना और एक बड़ी रक्षा डील पर सहमति जताना, बीजिंग से लेकर वाशिंगटन तक के रणनीतिकारों के लिए चिंता का विषय बन गया है। वैश्विक रक्षा बाजार में आए इस बड़े बदलाव ने महाशक्तियों के पुराने समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है।

जिस रूस ने दशकों पहले हमें मिसाइल तकनीक दी थी, आज वह स्वयं भारत से ब्रह्मोस खरीदने की स्थिति में है। आखिर ब्रह्मोस मिसाइल में ऐसी क्या विशेषता है कि दुनिया के शक्तिशाली देश इसे पाने के लिए उत्सुक हैं?

आज का भारत दुनिया के सामने केवल एक खरीदार नहीं, बल्कि एक ग्लोबल डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभरा है। एक समय था जब हम अपनी सैन्य जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर थे। साल 2013-14 में हमारा रक्षा निर्यात मात्र सात मिलियन डॉलर था, जो आज चार बिलियन डॉलर (लगभग 33,000 करोड़ रुपये) के विशाल आंकड़े को पार कर चुका है। यह उछाल उन ताकतों के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो भारत को हमेशा हथियारों के लिए निर्भर देखना चाहते थे।

आज भारतीय फैक्ट्रियों में निर्मित हथियार दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात किए जा रहे हैं। सरकारी कारखानों के साथ-साथ अब देश की निजी कंपनियां भी कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के डिफेंस कॉरिडोर में चौबीसों घंटे काम हो रहा है, जहाँ से निकलने वाले हाई-टेक वेपन सिस्टम विदेशी धरती पर अपनी धाक जमा रहे हैं।

मध्य पूर्व की राजनीति में हलचल पैदा करने वाली भारत और यूएई के बीच ब्रह्मोस और आकाशतीर एयर डिफेंस सिस्टम की डील अब अंतिम चरण में है। रक्षा विशेषज्ञ हैरान हैं कि यूएई को अचानक भारतीय हथियारों की इतनी आवश्यकता क्यों पड़ी। इसका मुख्य कारण मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव और ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ की सुरक्षा है, जहाँ से दुनिया का 20% कच्चा तेल गुजरता है। इस रास्ते में कोई भी बाधा यूएई की अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान पहुँचा सकती है।

आज के दौर में समंदर के इस हिस्से से रोजाना अरबों डॉलर का सामान गुजरता है। यदि कोई अज्ञात ड्रोन या मिसाइल वहां हमला करती है, तो वैश्विक बाजार क्रैश हो सकता है। यूएई समझता है कि आर्थिक शक्ति बनाए रखने के लिए अपनी सुरक्षा को अभेद्य बनाना अनिवार्य है।

यूएई को एक ऐसे अचूक हथियार की तलाश थी जो दुश्मन के रडार से बच सके और लक्ष्य को तुरंत नष्ट कर दे। अब तक यूएई अमेरिकी पैट्रियट और थाड सिस्टम पर निर्भर था, लेकिन उनकी अपनी सीमाएं और शर्तें हैं। साथ ही, उनका रख-रखाव और एक-एक इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत इतनी अधिक है कि छोटे ड्रोन्स के लिए उनका उपयोग करना घाटे का सौदा है।

पश्चिमी देशों के उपकरण खर्चीले होते हैं और उनके लिए शर्तों पर निर्भर रहना पड़ता है। यूएई अब रणनीतिक स्वायत्तता चाहता है। भारत का आकाशतीर सिस्टम एक स्वचालित ‘इलेक्ट्रॉनिक दिमाग’ की तरह है, जो मीलों दूर से खतरों को पहचान कर उन्हें हवा में ही खत्म करने का सटीक आदेश देता है।

आकाशतीर की खूबी यह है कि यह विभिन्न रडार और सेंसर्स के डेटा को रियल-टाइम में जोड़ता है। आधुनिक युद्ध में एक-एक सेकंड कीमती होता है। आकाशतीर दुश्मन के ड्रोन, फाइटर जेट या क्रूज मिसाइल की हर हलचल को पकड़ लेता है और यह खुद तय करने में सक्षम है कि आने वाला खतरा किस प्रकार का है।

यह रक्षा सौदा केवल व्यापारिक लेनदेन नहीं, बल्कि एक बड़ा सामरिक गठबंधन है। भारत इसके माध्यम से मध्य पूर्व में अपनी मजबूत पैठ बना रहा है। आज भारत ने उन महाशक्तियों के एकाधिकार को तोड़ दिया है जो खाड़ी देशों में हथियार बेचते थे। सऊदी अरब और कतर जैसे देश भी इस साझेदारी को बारीकी से देख रहे हैं।

जहाँ यूएई के साथ डील हो रही है, वहीं इजराइल के मेजर जनरल अमीर बरम की दिल्ली यात्रा भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को और गहरा करने का संकेत है। यदि इजराइल जैसा देश भारतीय तकनीक में रुचि दिखा रहा है, तो स्पष्ट है कि हमारी तकनीक अब विश्व स्तरीय है। भारत, इजराइल और यूएई का यह बढ़ता सहयोग शक्ति का नया केंद्र बना रहा है।

हथियारों की वास्तविक शक्ति का पता युद्ध के मैदान में चलता है। सीमा पर तनाव के दौरान भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत ब्रह्मोस मिसाइलों को अग्रिम चौकियों पर तैनात किया था। शून्य से नीचे के तापमान वाले कठिन इलाकों में ब्रह्मोस के मोबाइल लॉन्चर्स की तैनाती ने दुश्मनों के पसीने छुड़ा दिए थे।

दुश्मन के सैटेलाइट्स ने जब उन लॉन्चर्स की तस्वीरें भेजीं, तो उनके मुख्यालयों में सन्नाटा पसर गया। ब्रह्मोस की मौजूदगी मात्र ने दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया, क्योंकि उनके कमांड सेंटर और एयरबेस सीधे निशाने पर थे।

ध्वनि की गति से तीन गुना तेज उड़ने वाली ब्रह्मोस दुश्मन के एयर डिफेंस को सोचने तक का समय नहीं देती। इसकी उच्च गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) इतनी अधिक होती है कि बिना विस्फोटक के भी यह दुश्मन के बंकरों या युद्धपोतों को तहस-नहस कर सकती है।

यही मारक क्षमता ब्रह्मोस की वैश्विक मांग बढ़ा रही है। फिलीपींस को इसकी डिलीवरी पहले ही दी जा चुकी है, जिसने इसे दक्षिण चीन सागर की सुरक्षा के लिए तैनात किया है। वियतनाम और इंडोनेशिया भी इस घातक मिसाइल को अपनी नौसेना में शामिल करने के लिए तैयार हैं।

सेंट पीटर्सबर्ग में एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम के दौरान भारत ने रूस को ही ब्रह्मोस आपूर्ति करने का प्रस्ताव दिया। 1995 में रूस की तकनीक से शुरू हुआ यह सफर आज इस मुकाम पर है कि ब्रह्मोस में 75% से अधिक पुर्जे भारतीय हैं। यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ की एक शक्तिशाली दहाड़ है।

ब्रह्मोस की बहुमुखी प्रतिभा इसे विशेष बनाती है। इसका ‘सी-स्किमिंग’ वेरिएंट समुद्र की लहरों के एकदम ऊपर उड़ता है, जिससे यह रडार की पकड़ में नहीं आता। वायुसेना के सुखोई-30 MKI और ‘दागो और भूल जाओ’ (Fire and Forget) तकनीक इसे आसमान का सबसे बड़ा काल बनाती है।

भारत का रक्षा निर्यात अब तेज रफ्तार से बढ़ रहा है। ब्रह्मोस के साथ-साथ तेजस विमान और पिनाका रॉकेट लॉन्चर की भी भारी मांग है। जब हम किसी देश को हथियार देते हैं, तो वह केवल मशीन नहीं बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी होती है, जो भारत के वैश्विक रुतबे को नई ऊंचाइयों पर ले जा रही है।

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