भारत और अफ्रीका के रिश्ते पर एक बड़ा दावा घूम रहा है: चीन का व्यापारिक किला ढह रहा है और भारतीय जहाजों ने महज 150 दिनों में बाजार पलट दिया। उपलब्ध आंकड़े इस कहानी की पुष्टि नहीं करते। चीन-अफ्रीका व्यापार 2024 में रिकॉर्ड 295.6 अरब डॉलर तक पहुंचा। भारत की मौजूदगी तेजी से बढ़ी है, लेकिन मुकाबले की तस्वीर समझने के लिए सही आंकड़े और जमीनी हकीकत देखना जरूरी है। असली सवाल यह है कि भारत अफ्रीका में भरोसेमंद और दीर्घकालिक भागीदार कैसे बन रहा है।
व्यापार बढ़ा, पर आंकड़ों का दायरा समझिए
भारत सरकार के विदेश राज्य मंत्री ने अगस्त 2025 में कहा था कि 2024-25 में भारत-अफ्रीका व्यापार 100 अरब डॉलर पार कर गया। वहीं CII की India-Africa Report 2025 में 54 देशों के साथ वस्तु व्यापार 81.9 अरब डॉलर बताया गया: भारत का निर्यात 42.7 अरब और आयात 39.2 अरब डॉलर। इन आंकड़ों में अंतर गणना के दायरे या सेवाओं को शामिल करने के तरीके से हो सकता है। इसलिए एक संख्या को हर तरह के व्यापार का अंतिम हिसाब बताना ठीक नहीं। दोनों आंकड़े, हालांकि, अफ्रीका की भारत के लिए बढ़ती अहमियत दिखाते हैं।
चीन का व्यापार 2024 में 295.6 अरब डॉलर का रिकॉर्ड बना। इसलिए भारत के व्यापार बढ़ने का अर्थ यह नहीं कि चीन पीछे हट चुका है। चीन अभी भी अफ्रीका का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। भारत के सामने चुनौती चीन को एक झटके में हटाने की नहीं, बल्कि उन क्षेत्रों में अपनी जगह मजबूत करने की है जहां भारतीय कंपनियां गुणवत्ता, कीमत, बिक्री के बाद सेवा और स्थानीय साझेदारी से भरोसा जीत सकती हैं।
रुपये में भुगतान: सुविधा, जादुई समाधान नहीं
डॉलर की उपलब्धता और मुद्रा में उतार-चढ़ाव कई अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाओं के लिए वास्तविक चुनौती हैं। RBI की Special Rupee Vostro Account व्यवस्था के तहत पात्र साझेदार देशों के साथ भारतीय रुपये में व्यापार निपटाने का रास्ता बनाया गया है। इसमें भारतीय आयातक रुपये में भुगतान करते हैं, रकम साझेदार बैंक के विशेष खाते में जाती है और खाते की उपलब्ध राशि से भारत को निर्यात करने वाले पक्ष को भुगतान हो सकता है। यह विकल्प व्यापार को सुविधाजनक बना सकता है, मगर इससे अफ्रीका में डॉलर की कमी एक झटके में खत्म नहीं होती। हर देश और कारोबार में इस व्यवस्था के इस्तेमाल का प्रमाण भी अलग से देखना होगा।
भारत की दूसरी ताकत विकास परियोजनाओं के लिए रियायती Line of Credit है। विदेश मंत्रालय के अनुसार अगस्त 2024 तक भारत ने 42 अफ्रीकी देशों को 196 ऐसी क्रेडिट लाइनें दी थीं, जिनकी कुल कीमत करीब 12 अरब डॉलर थी। ये सड़क, बिजली, परिवहन, कृषि और अन्य विकास जरूरतों की परियोजनाओं से जुड़ी हैं। भारत की पेशकश की मजबूती इस बात से तय होगी कि परियोजनाएं समय पर पूरी हों, स्थानीय क्षमता बढ़े और उनका लाभ वहां के लोगों तक पहुंचे।
सड़कों पर भारतीय कंपनियों की पहचान
मोटरसाइकिल के बाजार में Bajaj Boxer और TVS Star HLX जैसे मॉडल अफ्रीका के कई देशों में पहचाने जाते हैं। Boxer की उपयोगिता को व्यावसायिक सवारी और कठिन सड़कों के संदर्भ में बताया जाता है। TVS ने 2024 में अपनी HLX श्रृंखला के अंतरराष्ट्रीय बाजारों में 35 लाख ग्राहकों का आंकड़ा पार करने की घोषणा की थी। यह पूरी दुनिया के अंतरराष्ट्रीय बाजारों का आंकड़ा है, केवल अफ्रीका का नहीं। इससे भारतीय कंपनियों की पहुंच तो समझ आती है, लेकिन यह दावा साबित नहीं होता कि नाइजीरिया या केन्या से चीनी मोटरसाइकिलें रातों-रात गायब हो गईं या लाखों वाहन कबाड़ बन गए। ऐसे दावों के लिए स्वतंत्र, देशवार आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
दोपहिया वाहनों से आगे भी अवसर हैं। भारतीय ट्रक, बस, ट्रैक्टर, दवाएं, रिफाइंड पेट्रोलियम, मशीनरी और इंजीनियरिंग सामान अफ्रीकी बाजारों में जाते हैं। दक्षिण अफ्रीका के साथ 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार करीब 18 अरब डॉलर रहा। मिस्र के साथ उसी वित्त वर्ष में भारत का व्यापार करीब 4.8 अरब डॉलर था, जबकि दोनों देशों ने इसे आगे बढ़ाकर 12 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। इसलिए 7.3 अरब डॉलर को मिस्र के साथ मौजूदा व्यापार बताना पुराना संदर्भ है: वह आंकड़ा 2021-22 से जुड़ा था।
स्थानीय उत्पादन से AfCFTA का अवसर
अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र यानी AfCFTA का उद्देश्य देशों के बीच व्यापार आसान करना और साझा बाजार बनाना है। समझौते पर 54 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं। इससे 1.2 अरब से अधिक लोगों और करीब 3.4 ट्रिलियन डॉलर की संयुक्त GDP वाले बाजार की संभावना जुड़ी है। पर यह कोई ऐसा नियम नहीं कि किसी बाहरी देश का हर माल बिना शुल्क पूरे महाद्वीप में पहुंच जाएगा। शुल्क छूट उत्पाद, नियमों और मूल-स्थान यानी Rules of Origin की शर्तों पर निर्भर करती है। स्थानीय उत्पादन और वैल्यू एडिशन से भारतीय कंपनियों को फायदा मिल सकता है, लेकिन हर इकाई को स्वतः शुल्क-मुक्त पहुंच नहीं मिलती।
भारत के लिए मिस्र, दक्षिण अफ्रीका, मोरक्को और अन्य औद्योगिक केंद्रों में स्थानीय कंपनियों के साथ साझेदारी, असेंबली और सप्लाई नेटवर्क बढ़ाना व्यावहारिक रास्ता हो सकता है। इससे रोजगार और तकनीकी प्रशिक्षण को बढ़ावा मिल सकता है। यह उन अफ्रीकी देशों के लक्ष्य से भी मेल खाता है जो कच्चे माल के निर्यात से आगे बढ़कर अपने यहां प्रसंस्करण और निर्माण करना चाहते हैं। लेकिन किसी परियोजना को सफल कहने के लिए निवेश की घोषणा नहीं, बल्कि शुरू हुआ उत्पादन, स्थानीय खरीद और रोजगार जैसे नतीजे देखने होंगे।
बिजली, डिजिटल सेवाएं और स्वास्थ्य
अफ्रीका की ऊर्जा जरूरतें बहुत बड़ी हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार उप-सहारा अफ्रीका में करीब 60 करोड़ लोगों के पास बिजली की पहुंच नहीं है। यह आंकड़ा अवसर के साथ जिम्मेदारी भी दिखाता है: सौर ऊर्जा, मिनी-ग्रिड, ऊर्जा भंडारण और पानी के पंपों में निवेश तभी असरदार होगा जब उसके साथ किफायती वित्त, मरम्मत और स्थानीय तकनीकी प्रशिक्षण उपलब्ध हो। International Solar Alliance ने अफ्रीका में वितरित नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को वित्त देने के लिए Africa Solar Facility की पहल की है। यह सहयोग का ढांचा है; इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि भारत ने पूरे अफ्रीका में सौर ढांचा पहले ही खड़ा कर दिया है।
डिजिटल क्षेत्र में भी भारत अपना अनुभव साझा कर सकता है, मगर हर अफ्रीकी देश अपनी प्राथमिकताओं और नियमों के अनुसार समाधान चुनेगा। e-VidyaBharati और e-AarogyaBharati यानी e-VBAB परियोजना ऑनलाइन शिक्षा और टेली-मेडिसिन के लिए भारत-अफ्रीका सहयोग का स्थापित उदाहरण है। इसे हर अफ्रीकी मरीज को भारतीय विशेषज्ञों से इलाज मिलने या हर देश में UPI लागू होने के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। भुगतान प्रणाली और सार्वजनिक सेवाओं में साझेदारी के लिए स्थानीय डेटा सुरक्षा, तकनीकी क्षमता और नागरिकों का भरोसा अहम होंगे।
दवाओं के मामले में भारत की भूमिका मजबूत है। भारतीय कंपनियां अफ्रीकी देशों को जेनेरिक दवाएं और स्वास्थ्य उत्पाद निर्यात करती हैं। Cipla सहित कई कंपनियों ने सस्ती एंटीरेट्रोवायरल दवाओं की उपलब्धता पर अंतरराष्ट्रीय बहस में अहम भूमिका निभाई। लेकिन “हर पांच में एक दवा भारत से आती है” जैसे महाद्वीप-व्यापी अनुपात को स्पष्ट स्रोत और परिभाषा के बिना दोहराना उचित नहीं। दवा की कीमत के साथ उसकी गुणवत्ता, नियामकीय मंजूरी और नियमित उपलब्धता भी उतनी ही जरूरी है।
साझेदारी का असली पैमाना
भारत की कूटनीतिक उपलब्धियों में 2023 में African Union को G20 का स्थायी सदस्य बनाने का निर्णय अहम है। भारत की अध्यक्षता में हुआ यह कदम अफ्रीकी देशों को वैश्विक मंच पर अधिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में था। भारत ने अफ्रीका के साथ ऐतिहासिक संबंधों, शिक्षा, प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग और व्यापार के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई है। फिर भी 55 देशों को एक जैसी प्राथमिकताओं वाला समूह मानना भूल होगी: हर देश की अर्थव्यवस्था, राजनीतिक जरूरत और विकास योजना अलग है।
चीन के ऋणों को लेकर अफ्रीका में चिंता और बहस मौजूद है, लेकिन यह कहना कि चीन का पूरा मॉडल केवल संसाधनों पर कब्जे के लिए है या अफ्रीकी देशों की संपत्तियां निश्चित रूप से उससे छिन रही हैं, उपलब्ध तथ्यों से आगे जाना होगा। कई देशों पर कर्ज का दबाव है और उसके कारण बहुस्तरीय हैं। चीन-अफ्रीका व्यापार का रिकॉर्ड स्तर बताता है कि अफ्रीकी सरकारें और कारोबारी एक से अधिक साझेदारों के साथ काम कर रहे हैं। भारत को अपनी ताकत साझेदारी, प्रतिस्पर्धी उत्पाद, विश्वसनीय सेवा, समयबद्ध परियोजनाओं और स्थानीय रोजगार से साबित करनी होगी।
आने वाले वर्षों में भारत-अफ्रीका रिश्ते की असली परीक्षा सिर्फ व्यापार के कुल डॉलर से नहीं होगी। सवाल यह होगा कि क्या भारतीय कंपनियां अफ्रीका में उत्पादन बढ़ाती हैं, क्या परियोजनाएं तय समय पर पूरी होती हैं, क्या तकनीक और कौशल स्थानीय लोगों तक पहुंचते हैं, और क्या दोनों तरफ के कारोबारियों को स्थिर बाजार मिलता है। भारत के पास अवसर बड़ा है, पर उसे चीन की हार घोषित करने की जरूरत नहीं। अफ्रीका के साथ टिकाऊ रिश्ता बराबरी, सम्मान और साझा लाभ से बनेगा; यही वह रास्ता है जिस पर नई दिल्ली को लगातार आगे बढ़ना है।





