अफ्रीका में ड्रैगन का गेम ओवर! भारत के मास्टरस्ट्रोक से चीन का 282 अरब डॉलर का साम्राज्य तहस-नहस

अफ्रीका में ड्रैगन का गेम ओवर! भारत के मास्टरस्ट्रोक से चीन का 282 अरब डॉलर का साम्राज्य तहस-नहस

जब दुनिया की बड़ी-बड़ी महाशक्तियां और यूरोप के सुस्त बाजार मंदी का रोना रो रहे थे, ठीक उसी वक्त हिंद महासागर की लहरों को चीरते हुए भारत के प्रमुख बंदरगाहों से निकले हजारों व्यापारिक जहाज एक बिल्कुल नए और आक्रामक मिशन पर आगे बढ़ रहे थे। सिर्फ 150 दिनों के भीतर भारत के व्यापारिक तंत्र ने वो कर दिखाया, जिसकी भनक बीजिंग के बड़े-बड़े रणनीतिकारों और योजनाकारों को भी नहीं लगी। आज अफ्रीका के 54 देशों में रातों-रात एक ऐसा भू-राजनैतिक और आर्थिक भूचाल आया है, जिसने चीन के 282 बिलियन डॉलर के व्यापारिक किले को जड़ से हिला कर रख दिया है।

नाइजीरिया और केन्या की सड़कों से अचानक चीन की करोड़ों मोटरसाइकिलें गायब हो गई हैं और कबाड़ के ढेर में तब्दील हो चुकी हैं। स्वेज नहर के मुहाने पर बैठा मिस्र अब चीनी जहाजों को इग्नोर करके भारत से तेजी से माल मंगवा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस पूरे अफ्रीकी महाद्वीप को बीजिंग खरबों डॉलर का कर्ज देकर अपनी मुट्ठी में बंद करने का ख्वाब देख रहा था, वहां बिना एक भी देश को कर्ज के जाल में फंसाए, भारत ने 55 देशों के अफ्रीकी संघ का अटूट भरोसा आखिर कैसे जीत लिया? यह कोई सामान्य व्यापारिक फेरबदल नहीं है, बल्कि ग्लोबल ट्रेड और जियोपॉलिटिक्स का बहुत बड़ा शक्ति संतुलन है, जो अब सीधे तौर पर नई दिल्ली के पक्ष में झुक चुका है। वाणिज्य मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि भारत का अफ्रीका को होने वाला कुल वार्षिक व्यापार 100 बिलियन डॉलर के ऐतिहासिक मील के पत्थर को छू चुका है। भारत का निर्यात 51.2 बिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर को पार कर गया है। भारत ने बेहद सोची-समझी आक्रामक रणनीति के तहत अपने जहाजों का रुख अफ्रीका और आसियान (ASEAN) देशों की तरफ मोड़ दिया है।

डॉलर का भयंकर संकट और भारतीय रुपये की ग्रांड एंट्री

इस पूरे मिशन में सबसे बड़ी रुकावट थी अमेरिकन डॉलर की भयंकर कमी। साल 2022 के बाद जब ग्लोबल लेवल पर डॉलर मजबूत होना शुरू हुआ, तो अफ्रीका के लगभग सभी देशों के विदेशी मुद्रा भंडार बुरी तरह सूखने लगे। मिस्र का पाउंड 50 प्रतिशत से ज्यादा टूट गया, नाइजीरिया का नायरा अपने रिकॉर्ड निचले स्तर पर चला गया और केन्या के पास जरूरी सामान इम्पोर्ट करने के लिए डॉलर ही नहीं बचे। चीन इसी ताक में बैठा था। ड्रैगन ने इस मजबूरी का फायदा उठाकर अफ्रीकी देशों पर और ज्यादा रियायती कर्ज लादने की खौफनाक साजिश रची, ताकि वहां की सोने, तांबे और लिथियम की खदानों पर पूरी तरह से कब्जा किया जा सके।

लेकिन यहीं पर भारत ने अपना सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक खेला। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने अफ्रीकी देशों के केंद्रीय बैंकों के साथ मिलकर ‘स्पेशल रुपी वोस्ट्रो अकाउंट्स’ (SRVA) का एक अभेद्य और मजबूत चैनल तैयार कर दिया। भारत ने डॉलर को बायपास करते हुए सीधे स्थानीय मुद्राओं और भारतीय रुपये में द्विपक्षीय व्यापार शुरू करवा दिया। अब भारतीय आयातकों ने अफ्रीका से कच्चा तेल, दालें, तांबा और उर्वरक सीधे स्थानीय मुद्रा या रुपये में खरीदा और उसी खाते से अफ्रीकी व्यापारियों ने भारत से गाड़ियां, इलेक्ट्रॉनिक्स और दवाएं सीधे रुपये में खरीद लीं। डॉलर का संकट एक ही झटके में हवा हो गया। साथ ही भारत सरकार और एक्जिम बैंक (Exim Bank) ने 12 बिलियन डॉलर से ज्यादा की लाइन ऑफ क्रेडिट (LoC) दी। इसकी सबसे बड़ी शर्त यह थी कि इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए कम से कम 75 प्रतिशत सामान और सेवाएं भारत से ही जाएंगी। इस एक कदम ने अफ्रीका में भारतीय कंपनियों का पूरा इकोसिस्टम खड़ा कर दिया।

कबाड़ बनीं चीनी गाड़ियां और अफ्रीका में दौड़ा ‘बजाज’

इस व्यापारिक और कूटनीतिक जंग का सबसे रोमांचक मोड़ अफ्रीका की सड़कों पर देखने को मिला। नाइजीरिया में कमर्शियल बाइक टैक्सी को ‘ओकाडा’ कहा जाता है और पूर्वी अफ्रीका में इसे ‘बोडा-बोडा’ कहते हैं। साल 2000 के बाद चीनी कंपनियों ने वहां बेहद सस्ती और घटिया बाइकों की बाढ़ ला दी थी। ये गाड़ियां भारतीय और जापानी मॉडल्स से 30 से 40 प्रतिशत सस्ती जरूर थीं, लेकिन दो-तीन साल के भीतर ही चीन की क्वालिटी का पर्दाफाश हो गया। अफ्रीका की कच्ची और गड्ढों वाली सड़कों पर चीनी मोटरसाइकिलों के फ्रेम बीच में से चटकने लगे। चीनी कंपनियों के पास ना कोई सर्विस नेटवर्क था और ना ही स्पेयर पार्ट्स। खराब होते ही चीन की करोड़ों गाड़ियां रातों-रात कबाड़ बन गईं।

तभी भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर ने अफ्रीका में ऐतिहासिक एंट्री मारी। बजाज ऑटो (Bajaj Auto) ने अपनी बेहद मजबूत और रफ-एंड-टफ बाइक ‘Bajaj Boxer’ को मैदान में उतारा, जिसे आज अफ्रीका में ‘अफ्रीका का घोड़ा’ कहा जाता है। बॉक्सर का चेसिस भारी लोहे से बना था, जो भारी वजन और उबड़-खाबड़ रास्तों को आसानी से झेल लेता है। बजाज ने अफ्रीका के सुदूर इलाकों तक पार्ट्स की सप्लाई पहुंचाई और स्थानीय मैकेनिकों को ट्रेनिंग दी। आज नाइजीरिया में कमर्शियल बाइक का दूसरा नाम ही ‘बॉक्सर’ बन चुका है। दूसरी तरफ टीवीएस मोटर (TVS Motor) ने अपनी ‘Star HLX’ सीरीज के साथ अफ्रीकी बाजार में जबरदस्त पकड़ बनाई। टीवीएस ने ग्लोबल लेवल पर 35 लाख से ज्यादा गाड़ियां बेचकर चीनी प्रतिद्वंद्वियों को पूरी तरह मार्केट से आउट कर दिया है। शहरी इलाकों में चलने वाले टुक-टुक या केके मर्फा (थ्री-व्हीलर) में भी बजाज और टीवीएस ने चीनी मॉडल्स को रीसेल वैल्यू और मजबूती में मीलों पीछे छोड़ दिया है।

कमर्शियल और भारी वाहनों में भी भारतीय कंपनियों का ही जलवा है। टाटा मोटर्स (Tata Motors) ने दक्षिण अफ्रीका के असेंबली प्लांट के जरिए मजबूत ट्रकों और बसों की सप्लाई तेज कर दी है। अफ्रीकी जलवायु में टाटा की गाड़ियां चीनी ट्रकों से दोगुनी उम्र तक बिना थके काम करती हैं। वहीं महिंद्रा (Mahindra) के पिक-अप ट्रक्स और मैकेनिकल ट्रैक्टर्स ने घाना, अल्जीरिया और केन्या के खेतों में क्रांति ला दी है। छोटे अफ्रीकी किसानों के लिए बिना किसी जटिल इलेक्ट्रॉनिक्स वाले महिंद्रा के ट्रैक्टर सबसे बड़ा सहारा बन गए हैं, जबकि चीनी मशीनें तकनीकी खराबी के कारण खेतों में धूल फांक रही हैं।

फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (AfCFTA) और स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग का गेमचेंजर

चीन को सबसे बड़ा रणनीतिक झटका तब लगा, जब 54 अफ्रीकी देशों ने मिलकर 3.4 ट्रिलियन डॉलर का अफ्रीकन कॉन्टिनेंटल फ्री ट्रेड एरिया (AfCFTA) शुरू किया। चीन का हमेशा से एक ही एक्सप्लॉइटेटिव मॉडल रहा है— अपने देश में माल बनाओ और उसे अफ्रीका के बंदरगाहों पर डंप कर दो। लेकिन AfCFTA के कड़े ‘रूल्स ऑफ ओरिजिन’ ने साफ कर दिया कि टैक्स में भारी छूट सिर्फ उसी उत्पाद को मिलेगी, जिसका वैल्यू एडिशन अफ्रीका की जमीन पर होगा। चीन अपने मैन्युफैक्चरिंग मॉडल के चलते अफ्रीका में स्थानीय कारखाने लगाने से हमेशा कतराता रहा।

भारत ने इसी कमजोरी पर सीधा प्रहार किया। भारतीय कंपनियों ने दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, मोरक्को और मॉरीशस में स्थानीय साझेदारों के साथ असेंबली और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स शुरू कर दीं। स्वेज नहर के रणनीतिक मुहाने पर बैठे मिस्र के एससीजोन (SCZONE) में उत्पाद तैयार करके भारतीय कंपनियां अब पूरे अफ्रीकी महाद्वीप और वहां से यूरोप के बाजारों में बिना किसी भारी आयात शुल्क के अपना माल पहुंचा रही हैं। भारत ने उस सिस्टम का फायदा उठाया जिसे चीन केवल बाहर से खड़े होकर देख रहा था। आज दक्षिण अफ्रीका भारत के शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में शामिल है और मिस्र के साथ हमारा व्यापार 7.3 बिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर है।

इलेक्ट्रॉनिक्स, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और जासूसी पर प्रहार

जिस इलेक्ट्रॉनिक्स मार्केट को बीजिंग का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था, वहां भी भारत की ‘मेक इन इंडिया’ और पीएलआई (PLI) स्कीम ने बहुत बड़ा उलटफेर किया है। भारत का कुल इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 29 बिलियन डॉलर को पार कर गया है। नोएडा और तमिलनाडु के कारखानों में बने किफायती और टिकाऊ स्मार्टफोन्स अब मिस्र और नाइजीरिया के युवाओं के हाथों में हैं। इसके अलावा, अफ्रीका के 60 करोड़ लोग आज भी पावर ग्रिड से कटे हुए हैं। चीन वहां बिना वारंटी वाले घटिया सोलर पैनल बेचता था। भारत ने इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) के तहत वहां ऑफ-ग्रिड सोलर सिस्टम का पूरा ढांचा खड़ा कर दिया। घरेलू उपकरणों में गोदरेज (Godrej), वोल्टास (Voltas) और हैवेल्स (Havells) के पंखे, फ्रिज और टीवी अफ्रीकी परिवारों की पहली पसंद हैं क्योंकि वे अफ्रीकी ग्रिड्स में होने वाले तेज वोल्टेज उतार-चढ़ाव को आसानी से झेल लेते हैं।

टेक की दुनिया में भी चीन ने हुवावे (Huawei) के जरिए पूरे अफ्रीका में अरबों डॉलर का सर्विलांस नेटवर्क बिछाया था, जिसका मकसद सिर्फ और सिर्फ डेटा चोरी और जासूसी करना था। इसके ठीक उलट, भारत ने अफ्रीका को असली डिजिटल आजादी दी है। भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) पूरी तरह ओपन-सोर्स और ट्रांसपेरेंट है। केन्या और नामीबिया जैसे देश अब भारत के यूपीआई (UPI) आर्किटेक्चर के आधार पर अपने नेशनल पेमेंट प्लेटफॉर्म तैयार कर रहे हैं।

भरोसे की बुनियाद: दवाएं, जी20 और अफ्रीका का अपना भारत

रणनीति और कूटनीति की सबसे मजबूत रीढ़ ‘भरोसा’ होती है, जिसे ड्रैगन अपने अरबों डॉलर से भी नहीं खरीद पाया। जब पूरा अफ्रीका एड्स महामारी से जूझ रहा था और पश्चिमी कंपनियां लाखों रुपये वसूल रही थीं, तब भारत की सिप्ला (Cipla) ने मात्र 1 डॉलर प्रति दिन से भी कम खर्च पर जीवनरक्षक दवाएं देकर लाखों अफ्रीकियों की जान बचाई थी। आज अफ्रीका की हर पांच में से एक जेनेरिक दवा भारत से आती है। सन फार्मा (Sun Pharma) और सीरम इंस्टीट्यूट जैसी कंपनियों ने वहां हेल्थकेयर को नई जिंदगी दी है। कोविड के समय में भारत की ‘वैक्सीन मैत्री’ ने अफ्रीका के घर-घर में दस्तक दी।

चीन का मॉडल सिर्फ दोहन और शोषण पर टिका था— कर्ज दो, अपने ही चीनी मजदूर लाओ, स्थानीय संसाधनों पर कब्जा करो और अफ्रीकी युवाओं को कोई तकनीकी स्किल मत दो। चीनी कर्ज की वजह से अफ्रीकी जनमानस में चीन की छवि एक ‘नए औपनिवेशिक लुटेरे’ जैसी बन गई है। दूसरी तरफ, भारतीय मूल के लोग 150 सालों से अफ्रीका के ताने-बाने का हिस्सा हैं। भारतीय कंपनियों ने वहां बड़े स्किल ट्रेनिंग सेंटर्स खोलकर स्थानीय युवाओं को इंजीनियर बनाया है। भारत ने अपनी जी20 अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकन यूनियन को स्थायी सदस्यता दिलाकर जो कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक खेला, उसने अफ्रीका का अटूट राजनीतिक भरोसा भारत की झोली में डाल दिया है।

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