होर्मुज संकट और मार्को रुबियो का बड़ा बयान: क्या भारतीय नाविकों के नाम पर भारत को ईरान के खिलाफ मोर्चे पर लाना चाहता है अमेरिका?

होर्मुज संकट और मार्को रुबियो का बड़ा बयान: क्या भारतीय नाविकों के नाम पर भारत को ईरान के खिलाफ मोर्चे पर लाना चाहता है अमेरिका?

फारस की खाड़ी के संकरे मुहाने पर रात के सन्नाटे में समंदर की लहरें जितनी शांत दिखती हैं, उसके भीतर उतनी ही बड़ी भू-राजनीतिक हलचल चल रही है। इसी समुद्री रास्ते पर दुनिया के सबसे आधुनिक सर्विलांस सिस्टम और मानवरहित ड्रोन लगातार गश्त कर रहे हैं। ठीक इसी मोड़ पर वाशिंगटन से आए एक बड़े बयान ने पूरी दुनिया के डिप्लोमैटिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। अटलांटा में आयोजित जी-20 विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने सीधे तौर पर भारतीय नाविकों का जिक्र करते हुए एक ऐसा बयान दिया है जिसने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।

मार्को रुबियो ने खुले मंच से आरोप लगाया है कि ईरान का इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC जानबूझकर उन कमर्शियल जहाजों को निशाना बना रहा है जिन पर भारतीय सेलर्स तैनात हैं और जो जी-20 देशों के लिए ऊर्जा की सप्लाई ले जा रहे हैं। इस बयान के सामने आते ही कई बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। क्या मिडिल ईस्ट में चल रहे इस सामरिक टकराव में अब भारत को सीधे तौर पर खींचने की कोशिश हो रही है? क्या अमेरिका के इस दावे के बाद खाड़ी देशों से लेकर तेहरान तक कूटनीतिक समीकरण बदलने वाले हैं? फारस की खाड़ी में अगर टकराव इजरायल, पश्चिमी देशों और ईरान के बीच है, तो बार-बार कमर्शियल जहाजों पर भारतीय पासपोर्टधारी नाविक ही सबसे आगे क्यों नजर आते हैं? क्या वाकई तेहरान ने नई दिल्ली के भरोसे को तोड़ा है या फिर भारत को किसी बड़े वैश्विक सैन्य गुट में शामिल करने के लिए कोई गहरा कूटनीतिक दांव चला जा रहा है?

इन सवालों की तह तक जाने के लिए हमें समंदर के उस सबसे संवेदनशील रास्ते को समझना होगा जिसे दुनिया Strait of Hormuz यानी होर्मुज जलडमरूमध्य कहती है। अपने सबसे संकरे हिस्से में मात्र 39 किलोमीटर चौड़ा यह समुद्री गलियारा आज ग्लोबल इकोनॉमी की सबसे बड़ी लाइफलाइन बन चुका है। पूरी दुनिया के समुद्री कच्चे तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी छोटे से रास्ते से होकर गुजरता है।

मार्को रुबियो का यह बयान कोई इत्तेफाक नहीं है। इसके पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की एक सोची-समझी डिप्लोमैटिक स्ट्रैटेजी काम कर रही है। अमेरिका लंबे समय से यह चाहता है कि भारत लाल सागर और फारस की खाड़ी में चल रहे पश्चिमी देशों के नौसैनिक अभियानों का सीधा हिस्सा बन जाए। वाशिंगटन की कोशिश रही है कि भारत अमेरिकी कमान वाले कंबाइंड टास्क फोर्स CTF-153 और Operation Prosperity Guardian में अपने युद्धपोत उतार दे। लेकिन नई दिल्ली की नीति हमेशा से एकदम स्पष्ट रही है। भारत किसी दूसरे देश के झंडे या किसी विदेशी सैन्य गठबंधन के नीचे काम नहीं करता। भारतीय नौसेना केवल अपने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के तले और अपने राष्ट्रीय हितों के मुताबिक ऑपरेट करती है। ऐसे में जब अमेरिकी विदेश मंत्री ने भारतीय नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया, तो उसके पीछे का कूटनीतिक संकेत साफ था कि भारत के नीति-निर्माताओं और जनमानस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जाए ताकि नई दिल्ली तेहरान के खिलाफ पश्चिमी खेमे में आकर खड़ी हो जाए।

इंटरनेशनल शिपिंग का असली गणित और फ्लैग्स ऑफ कन्वीनियंस का रहस्य

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या वाकई ईरान भारतीय नाविकों को जानबूझकर टारगेट कर रहा है? इस दावे की जमीनी हकीकत को समझने के लिए इंटरनेशनल शिपिंग इंडस्ट्री के डेटा और उसके काम करने के तरीके को समझना जरूरी है। International Maritime Organization यानी IMO के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर की मर्चेंट नेवी में भारत की हिस्सेदारी कितनी विशाल है। आज दुनिया के समंदर में काम कर रहे लगभग 19 लाख सर्टिफाइड सीफेयरर्स में से 2.5 लाख से ज्यादा यानी करीब 10 से 12 प्रतिशत नाविक अकेले भारत के हैं।

जब बात फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी से गुजरने वाले विशालकाय कच्चे तेल के टैंकरों यानी VLCC (Very Large Crude Carriers) की आती है, तो भारतीय क्रू मेंबर्स का यह आंकड़ा बढ़कर 25 से 30 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। इसका सीधा और सरल मतलब यह है कि खाड़ी के इस संवेदनशील रास्ते से गुजरने वाले हर तीसरे या चौथे ऑयल टैंकर के नेविगेशन ब्रिज या इंजन रूम की कमान किसी न किसी भारतीय मर्चेंट नेवी ऑफिसर या सेलर के हाथ में होती है।

ग्लोबल शिपिंग इंडस्ट्री का ढांचा बेहद जटिल है जिसे तकनीकी भाषा में Flags of Convenience यानी FOC कहा जाता है। समंदर में तैरते किसी विशाल जहाज पर झंडा पनामा, लाइबेरिया या मार्शल आइलैंड्स जैसे छोटे देशों का लगा होता है। उसी जहाज का असली मालिकाना हक लंदन, न्यूयॉर्क या तेल अवीव में बैठे किसी बड़े कॉरपोरेट घराने के पास होता है। उस जहाज का डे-टू-डे मैनेजमेंट सिंगापुर या दुबई की कोई शिपिंग कंपनी संभालती है, जबकि उस जहाज को ऑपरेट करने वाला क्रू भारत या फिलीपींस का होता है।

जब ईरान की IRGC किसी कमर्शियल जहाज को रोकती है या उसे निशाना बनाती है, तो वह नाविकों की नेशनलिटी या पासपोर्ट देखकर कार्रवाई नहीं करती। ईरानी इंटेलिजेंस मुख्य रूप से तीन पहलुओं को ट्रैक करती है। पहला, क्या उस शिप की ओनरशिप किसी इजरायली, अमेरिकी या पश्चिमी कंपनी से जुड़ी है? दूसरा, क्या उस जहाज का कार्गो तेहरान के विरोधी देशों के सप्लाई नेटवर्क का हिस्सा है? और तीसरा, क्या उस जहाज ने अपना ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम यानी AIS ट्रांसपोंडर बंद करके ईरानी समुद्री क्षेत्र के नियमों का उल्लंघन किया है?

अप्रैल 2024 का उदाहरण सबके सामने है जब होर्मुज के पास पुर्तगाली झंडे वाले कंटेनर जहाज MSC Aries को ईरानी बलों ने अपने नियंत्रण में लिया था। उस जहाज पर 17 भारतीय नाविक सवार थे। उस कार्रवाई का कारण भारतीय क्रू की मौजूदगी नहीं थी, बल्कि उस शिपिंग कंपनी का एक इजरायली अरबपति कारोबारी से सीधा कारोबारी संबंध था। ऐसे जहाजों पर भारतीय नाविकों का होना ग्लोबल मर्चेंट नेवी की एक सांख्यिकी वास्तविकता है, न कि भारत के खिलाफ कोई लक्षित साजिश। तेहरान का नेतृत्व भी यह बात बखूबी जानता है कि कड़े पश्चिमी प्रतिबंधों के दौर में भारत जैसी बड़ी आर्थिक महाशक्ति के साथ कूटनीतिक और व्यापारिक संबंध बिगाड़ना ईरान के अपने अस्तित्व और अर्थव्यवस्था के लिए कितना भारी पड़ सकता है।

भारत की एनर्जी सिक्योरिटी और स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व की ताकत

लेकिन इस सिक्के का दूसरा पहलू भारत के लिए बेहद संवेदनशील है। भले ही यह टकराव पश्चिमी देशों और ईरान के बीच हो, लेकिन इस समुद्री मार्ग में अस्थिरता का सीधा असर भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। होर्मुज का यह 39 किलोमीटर चौड़ा रास्ता भारत की एनर्जी सिक्योरिटी की सबसे प्रमुख धमनी है। भारत अपनी कुल जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से इम्पोर्ट करता है। इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे देशों से आने वाला बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचता है। इसके अलावा भारत के फर्टिलाइजर प्लांट्स, पावर सेक्टर और करोड़ों घरों की पाइपलाइन गैस को चलाने वाली 60 प्रतिशत से अधिक LNG कतर और खाड़ी देशों से इसी समुद्री मार्ग के जरिए आती है।

अगर इस रूट पर तनाव बढ़ता है या सप्लाई चेन बाधित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय शिपिंग में War Risk Insurance Premium रातों-रात 300 से 500 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। ग्लोबल शिपिंग कंपनियां यह अतिरिक्त बोझ सीधे आयातक देशों पर डालती हैं। इससे देश का इम्पोर्ट बिल अरबों डॉलर बढ़ सकता है और Current Account Deficit यानी CAD पर सीधा दबाव पड़ता है।

ऐसी किसी भी आकस्मिक स्थिति से निपटने के लिए भारत ने अपनी जमीन के नीचे मजबूत सुरक्षा कवच तैयार कर रखा है। विशाखापट्टनम, मंगलुरु और पादुर में जमीन के नीचे विशाल चट्टानी गुफाओं में भारत के Strategic Petroleum Reserves यानी SPR मौजूद हैं। इस आपातकालीन भंडार की क्षमता लगभग 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है, जो अकेले करीब 9.5 दिनों की शुद्ध आयात जरूरत को पूरा कर सकती है। वहीं अगर भारतीय तेल कंपनियों के डिपो, रिफाइनरियों और पाइपलाइनों में मौजूद कमर्शियल स्टॉक को भी इसमें जोड़ दिया जाए, तो भारत के पास किसी भी वक्त लगभग 65 से 74 दिनों का कुल ऑयल बैकअप मौजूद रहता है। इसके बावजूद अगर खाड़ी का संकट महीनों तक खिंचता है और ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल के स्तर की तरफ बढ़ता है, तो यह पूरी दुनिया के साथ-साथ भारतीय बाजार में भी महंगाई की बड़ी चुनौती खड़ी कर सकता है।

चाबहार पोर्ट और INSTC कॉरिडोर पर अमेरिकी दबाव की असली वजह

दरअसल फारस की खाड़ी में भारत का दांव केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं है। यहां भारत का सबसे बड़ा सामरिक और व्यापारिक प्रोजेक्ट चाबहार पोर्ट और 7200 किलोमीटर लंबा International North-South Transport Corridor यानी INSTC भी जुड़ा हुआ है। मई 2024 में भारत की सरकारी कंपनी India Ports Global Limited यानी IPGL और ईरान के पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन के बीच चाबहार के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन के लिए 10 साल का ऐतिहासिक समझौता हुआ था। साल 2026 की शुरुआत तक भारत ने अपनी 120 मिलियन डॉलर की प्रतिबद्धता को पूरा करते हुए वहां छह हाई-कैपेसिटी मोबाइल हार्बर क्रेन और आधुनिक कंटेनर हैंडलिंग उपकरण तैनात कर दिए हैं, जिससे यह पोर्ट अब पूरी तरह से सेल्फ-सस्टेनिंग कमर्शियल फेज में आ चुका है।

ओमान की खाड़ी के तट पर स्थित यही चाबहार पोर्ट पाकिस्तान के कराची और चीन द्वारा विकसित किए गए ग्वादर पोर्ट को भारत का सबसे सटीक जवाब है। ग्वादर पोर्ट से मात्र 170 किलोमीटर की दूरी पर स्थित चाबहार ने पाकिस्तान की उस पुरानी रणनीति को पूरी तरह विफल कर दिया है जिसके तहत इस्लामाबाद ने दशकों तक भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया जाने के लिए जमीनी रास्ता देने से इनकार किया था। आज चाबहार के जरिए भारत पाकिस्तान को पूरी तरह बाईपास करके सीधे अफगानिस्तान, सेंट्रल एशिया, रूस और यूरोप से जुड़ रहा है। 628 किलोमीटर लंबी चाबहार-जाहेदान रेलवे लाइन का काम भी 89 प्रतिशत से अधिक पूरा हो चुका है। INSTC कॉरिडोर के जरिए मुंबई से मॉस्को और यूरोप तक माल पहुंचने का समय स्वेज नहर के पारंपरिक रास्ते के मुकाबले 40 दिनों से घटकर मात्र 15 से 20 दिन रह जाता है और ट्रांसपोर्टेशन लागत में 30 प्रतिशत की सीधी बचत होती है।

वाशिंगटन की असली असहजता इसी प्रोजेक्ट को लेकर है। अमेरिका अपने CAATSA कानून और प्रतिबंधों की समय-सीमा के जरिए लगातार यह दबाव बनाने की कोशिश करता रहा है कि भारत ईरान के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से अपने कदम पीछे खींच ले। लेकिन नई दिल्ली की कूटनीति इस बात को बहुत गहराई से समझती है कि अगर भारत ने अमेरिकी दबाव में आकर चाबहार या ईरान से अपना रणनीतिक स्पेस खाली किया, तो वहां चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी BRI और बीजिंग का निवेश तुरंत अपनी पकड़ बना लेगा। भारत अपनी दशकों की कूटनीतिक मेहनत और यूरेशिया के इस सबसे बड़े व्यापारिक दरवाजे को किसी भी कीमत पर चीन के हाथों में नहीं जाने दे सकता।

ऑपरेशन संकल्प और समंदर में भारतीय नौसेना का अभेद्य चक्रव्यूह

अपने नागरिकों और व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए भारत ने किसी विदेशी ताकत की मदद का इंतजार नहीं किया, बल्कि समंदर में अपना खुद का सुरक्षा कवच खड़ा किया है। जून 2019 में जब ओमान की खाड़ी में व्यापारिक जहाजों पर संकट शुरू हुआ था, तभी भारतीय नौसेना ने Operation Sankalp की शुरुआत कर दी थी। आज इस मिशन के तहत भारतीय नौसेना के सबसे अत्याधुनिक गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर्स और स्टेल्थ फ्रिगेट्स फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी, अदन की खाड़ी और अरब सागर में चौबीसों घंटे मुस्तैद हैं। INS विशाखापट्टनम, INS कोलकाता, INS कोच्चि और INS चेन्नई जैसे फ्रंटलाइन वॉरशिप्स समंदर में भारत के हितों की पहरेदारी कर रहे हैं।

इन युद्धपोतों पर भारतीय नौसेना के विशिष्ट MARCOS कमांडो तैनात रहते हैं जो किसी भी एंटी-पायरेसी या रेस्क्यू ऑपरेशन को अंजाम देने में सक्षम हैं। आसमान से निगरानी के लिए लंबी दूरी के P-8I नेप्च्यून मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट और हाई-एल्टीट्यूड MQ-9B सी गार्डियन ड्रोन्स चप्पे-चप्पे पर नजर रखते हैं। हरियाणा के गुरुग्राम में स्थित भारतीय नौसेना का Information Fusion Centre – Indian Ocean Region यानी IFC-IOR चौबीसों घंटे हिंद महासागर और खाड़ी क्षेत्र में चलने वाले हर जहाज के रियल-टाइम डेटा को मॉनिटर करता है। ऑपरेशन संकल्प के तहत भारतीय नौसेना अब तक 230 से ज्यादा मर्चेंट जहाजों को सुरक्षित एस्कॉर्ट कर चुकी है, जिनमें 4 अरब डॉलर से अधिक मूल्य का 90 लाख मीट्रिक टन कार्गो शामिल रहा है।

समंदर में नौसेना की मुस्तैदी के साथ-साथ भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी शांत और परिणाम देने वाली Back-channel Diplomacy है। जब भी खाड़ी में किसी जहाज या भारतीय क्रू पर संकट आया, नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक ने बिना किसी शोर-शराबे के सीधा एक्शन लिया। विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने अपने ईरानी समकक्ष से सीधी वार्ता की और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के रणनीतिक संवाद चैनल ने सीधे ईरान की Supreme National Security Council यानी SNSC के साथ संपर्क साधा।

इसी कूटनीतिक रसूख का नतीजा रहा कि जिस ईरान के साथ पश्चिमी देशों के संवाद पूरी तरह ठप हो जाते हैं, उसी तेहरान ने मात्र 48 घंटों के भीतर भारतीय राजनयिकों को भारतीय नाविकों से मिलने के लिए कॉन्सुलर एक्सेस दे दिया और भारतीय महिला कैडेट एन टेसा जोसेफ समेत तमाम नाविकों की सुरक्षित वतन वापसी सुनिश्चित हुई। भारत ने तेहरान को डिप्लोमैटिक स्तर पर बेहद स्पष्ट संदेश दे रखा है कि नई दिल्ली ईरान की संप्रभुता और द्विपक्षीय संबंधों का सम्मान करती है, लेकिन भारतीय नाविकों और नागरिकों की सुरक्षा भारत के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है जिस पर कोई समझौता नहीं हो सकता।

रणनीतिक स्वायत्तता और महाशक्तियों के बीच नए भारत का मास्टरस्ट्रोक

ऐसे में उन लोगों को जवाब मिल जाता है जो यह सोच रहे हैं कि क्या भारत अमेरिका के कहने पर ईरान के खिलाफ किसी सैन्य अभियान का हिस्सा बनेगा। इसका जवाब एकदम साफ है—भारत किसी दूसरे देश के भू-राजनीतिक टकराव में मोहरा नहीं बनता। भारत अपनी Strategic Autonomy यानी रणनीतिक स्वायत्तता से कभी समझौता नहीं कर सकता। खाड़ी के छह GCC देशों में आज 90 लाख से ज्यादा भारतीय नागरिक रहते हैं और काम करते हैं। ये प्रवासी भारतीय हर साल 40 अरब डॉलर से अधिक का Remittance देश की अर्थव्यवस्था में भेजते हैं। किसी भी एक सैन्य खेमे में शामिल होना इन 90 लाख भारतीयों के रोजगार और सुरक्षा को जोखिम में डाल सकता है।

आज का भारत पश्चिमी एशिया में एक बेहद परिपक्व और संतुलित विदेश नीति चला रहा है। एक तरफ इजरायल है जिसके साथ भारत की मजबूत रक्षा, टेक्नोलॉजी और एयर डिफेंस साझेदारी है। दूसरी तरफ सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देश हैं जिनके साथ भारत ने ऐतिहासिक CEPA व्यापार समझौते किए हैं और जो भारत के सबसे बड़े ऊर्जा व निवेश साझेदार हैं। और तीसरी तरफ ईरान है जो मध्य एशिया, अफगानिस्तान और रूस तक पहुंचने के लिए भारत का सबसे अहम रणनीतिक गलियारा है।

इतना ही नहीं, भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को होर्मुज की निर्भरता से बाहर निकालने के लिए भी तेजी से काम कर रहा है। रूस से आने वाले कच्चे तेल के अलावा नाइजीरिया, अंगोला, ब्राजील और गुयाना जैसे देशों से सीधे खुले अटलांटिक महासागर के रास्ते ऑयल इम्पोर्ट के दीर्घकालिक समझौते किए जा रहे हैं। देश के भीतर ओडिशा के चांदीखोल और कर्नाटक के पादुर में स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व के दूसरे चरण का विस्तार किया जा रहा है। साथ ही Maritime India Vision के तहत भारत अपने खुद के झंडे वाले कमर्शियल जहाजों का बड़ा बेड़ा तैयार कर रहा है ताकि भविष्य में भारत का व्यापार विदेशी शिपिंग कंपनियों के भरोसे न रहे।

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