भारत-मंगोलिया मेगा डील: यूरेनियम और दुर्लभ खनिजों से चीन के एकाधिकार को चुनौती देंगे एस जयशंकर

भारत ने हाल ही में मंगोलिया और दक्षिण कोरिया जैसे रणनीतिक देशों के साथ अपने संबंधों को जिस तेजी से विस्तार दिया है, उसने बीजिंग से लेकर वॉशिंगटन तक हलचल पैदा कर दी है। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर का मंगोलिया की राजधानी उलानबटार का दौरा कोई सामान्य कूटनीतिक यात्रा नहीं है। इसे एक ऐसी ‘साइलेंट स्ट्राइक’ माना जा रहा है, जिसने वैश्विक महाशक्तियों को चौकन्ना कर दिया है। मंगोलिया एक ऐसा देश है जो भविष्य में भारत की ऊर्जा और खनिज सुरक्षा की दिशा में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। इस देश की बर्फीली जमीन के नीचे यूरेनियम, लिथियम, तांबा और रेयर अर्थ मिनरल्स का विशाल भंडार मौजूद है, जिस पर पूरी दुनिया की नजर है। भारत अब मंगोलिया के साथ एक ऐसी बड़ी डील की ओर बढ़ रहा है, जो वैश्विक बाजार में चीन के दबदबे को सीधी चुनौती देगी।

मंगोलिया की धरती में छिपे संसाधनों को पाने के लिए दुनिया की बड़ी ताकतें कतार में हैं। 90 हजार टन से अधिक प्रमाणित यूरेनियम भंडार वाले इस देश के साथ भारत की साझेदारी चीन के लिए रणनीतिक रूप से बड़ी चिंता का विषय है। एस जयशंकर की अपनी समकक्ष बत्त्सेत्सेग बत्मंख से मुलाकात केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एशिया के आर्थिक भूगोल को बदलने वाला कदम है। मंगोलिया रूस और चीन के बीच स्थित एक ‘लैंडलॉक्ड’ देश है, जिसके पास समुद्री मार्ग तो नहीं है, लेकिन इसके पास वह खनिज संपदा है जो किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकती है। भारत ने सही समय पर इस तिजोरी की चाबी हासिल करने का कूटनीतिक फैसला लिया है। अब दुनिया तेल से आगे बढ़कर भविष्य की तकनीक चलाने वाले खनिजों की ओर देख रही है, और मंगोलिया का गोबी रेगिस्तान इसी भविष्य का केंद्र है।

मंगोलिया की असली ताकत ‘यूरेनियम’ में छिपी है, जो आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा समीकरणों को नियंत्रित करेगा। यूरेनियम कोई साधारण धातु नहीं, बल्कि परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए आवश्यक ईंधन है। आज के दौर में जब दुनिया प्रदूषण मुक्त ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, कोयले के विकल्प के रूप में यूरेनियम सबसे शक्तिशाली स्रोत है। विज्ञान के अनुसार, यूरेनियम के एक छोटे से हिस्से में उतनी ही ऊर्जा होती है जितनी हजारों टन कोयले में होती है। यह शून्य उत्सर्जन के साथ सालों तक महानगरों को बिजली प्रदान करने की क्षमता रखता है।

अनुमान है कि मंगोलिया के पास लगभग 1 लाख 92 हजार टन के यूरेनियम संसाधन हैं, जिसमें से 90 हजार टन पूरी तरह प्रमाणित है। अब तक मंगोलिया में बड़े स्तर पर कमर्शियल माइनिंग सक्रिय नहीं थी, लेकिन भारत के प्रवेश ने खेल बदल दिया है। भारत का सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम दुनिया भर में प्रतिष्ठित है और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए हमें निरंतर बिजली की आवश्यकता है। अब तक भारत यूरेनियम के लिए कनाडा, कजाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया पर निर्भर रहा है, लेकिन मंगोलिया से आपूर्ति शुरू होने पर भारत की ऊर्जा सुरक्षा हमेशा के लिए मजबूत हो जाएगी और उद्योगों को नई गति मिलेगी।

संसाधनों का यह खेल केवल यूरेनियम तक सीमित नहीं है। मंगोलिया के गोबी रेगिस्तान के नीचे तांबे और सोने का भी असीमित भंडार है। दक्षिण गोबी क्षेत्र की ‘ओयु तोलगोई’ खदान दुनिया की सबसे बड़ी तांबा और सोना खदानों में शुमार है। मंगोलिया के पास 5.6 करोड़ टन से अधिक उच्च गुणवत्ता वाले तांबे का भंडार है, जिसे अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है।

तांबा हमारे भविष्य की इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) इंडस्ट्री के लिए रीढ़ की हड्डी के समान है। एक इलेक्ट्रिक कार को बनाने में सामान्य कारों की तुलना में कई गुना अधिक तांबा खर्च होता है। मंगोलिया का यह खजाना भारत को ईवी निर्माण के क्षेत्र में वैश्विक लीडर बना सकता है। इसके अतिरिक्त, मंगोलिया के पास 36 बिलियन टन कोकिंग कोल है, जो स्टील उत्पादन के लिए अनिवार्य है। भारत की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए यह कोयला किसी वरदान से कम नहीं है।

सबसे महत्वपूर्ण पहलू रेयर अर्थ मिनरल्स और लिथियम का है। मंगोलिया में लगभग 31 लाख टन रेयर अर्थ मिनरल्स के भंडार हैं। लिथियम, जिसे ‘सफेद सोना’ कहा जाता है, मोबाइल फोन से लेकर इलेक्ट्रिक बसों की बैटरी तक हर जगह उपयोग होता है। वहीं रेयर अर्थ मिनरल्स का उपयोग फाइटर जेट, मिसाइल सिस्टम और सुपर कंप्यूटर जैसे आधुनिक रक्षा उपकरणों में किया जाता है। इनके बिना कोई भी सेना आधुनिक नहीं बन सकती।

वर्तमान में इन खनिजों की वैश्विक आपूर्ति पर चीन का लगभग 80% नियंत्रण है, जिसका उपयोग वह अक्सर ब्लैकमेलिंग के लिए करता है। मंगोलिया के साथ भारत की साझेदारी चीन के इस एकाधिकार को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम है। मंगोलिया अपनी ‘थर्ड नेबर’ पॉलिसी के तहत भारत को एक भरोसेमंद सहयोगी के रूप में देखता है ताकि वह चीन और रूस के दबाव से बच सके। भारत और मंगोलिया के बीच यह गहराता सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंध बीजिंग की बेचैनी का मुख्य कारण है।

एस जयशंकर की इस रणनीति में एक और अहम मोड़ है। मंगोलिया के बाद वे सीधे दक्षिण कोरिया की यात्रा करेंगे। यहाँ कूटनीतिक बिंदु जुड़ते हैं: दक्षिण कोरिया के पास दुनिया की सबसे उन्नत बैटरी तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता है, लेकिन उनके पास कच्चा माल नहीं है। दूसरी ओर, मंगोलिया के पास कच्चा माल है लेकिन तकनीक नहीं। इन दोनों के बीच भारत एक ‘ग्लोबल पावरहाउस’ के रूप में खड़ा है, जिसके पास विशाल बाजार और विनिर्माण का विजन है।

यह भारत-मंगोलिया-दक्षिण कोरिया का त्रिकोण चीन की निर्भरता को पूरी तरह खत्म कर सकता है। मंगोलिया से कच्चा माल, दक्षिण कोरिया की तकनीक और भारत की मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां मिलकर एक नया ग्लोबल इकोसिस्टम तैयार करेंगी। भारत अगले 50 वर्षों की तैयारी कर रहा है, जहाँ ऊर्जा की राजनीति तेल से हटकर खनिजों और परमाणु शक्ति पर केंद्रित होगी। यह एक ऐसी साझेदारी है जिसमें भारत और उसके सहयोगियों की जीत सुनिश्चित है।

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