ड्रैगन का गुरूर चकनाचूर! LAC पर भारत का अदृश्य ब्रह्मास्त्र ‘फोटोनिक रडार’ तैयार

पूरी दुनिया अभी क्वांटम रडार के ख्याली पुलाव ही पका रही थी और बीजिंग अपने कमांड रूम में बैठकर झूठे सपने बुन रहा था। लेकिन दिल्ली के साउथ ब्लॉक में बेहद खामोशी से भारत ने एक ऐसा अदृश्य ब्रह्मास्त्र तैयार कर लिया है, जिसने चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की रातों की नींद उड़ा दी है। आज हम बात करेंगे DRDO के उस सीक्रेट आविष्कार की जो चीन के अरबों डॉलर के J-20 स्टेल्थ फाइटर जेट्स को रातों-रात कबाड़ में बदलने की ताकत रखता है। बिना कोई रडार सिग्नल छोड़े, हवा में पूरी तरह खामोश रहकर भी भारतीय सेना तिब्बत में बैठे चीनी कमांडरों की हर गुप्त चाल को डिकोड कर रही है। LAC पर भारत ने एक ऐसा तकनीकी जाल बिछा दिया है, जिसे भेद पाना अब ड्रैगन के बस की बात नहीं है।

यह सिर्फ कोई खबर नहीं है, बल्कि यह एक नए, आक्रामक और तकनीकी रूप से सुपीरियर भारत का वो ब्लूप्रिंट है जिसने गलवान के बाद अपनी रणनीति को पूरी तरह बदल दिया है। 2020 की गलवान घाटी की घटना एक बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई। उस वक्त तक चीन को लगता था कि तिब्बत के पठार पर अपनी भौगोलिक ऊंचाई के दम पर वह भारत को दबा सकता है, लेकिन गलवान ने भारत को सतर्क कर दिया। अब फोकस सिर्फ सीमाओं पर खड़े रहने पर नहीं, बल्कि तकनीकी विषमता को जड़ से खत्म करने पर है। भारत अब एक ऐसा मल्टी-लेयर्ड सेंसर आर्किटेक्चर बना चुका है जो जमीन, आसमान, अंतरिक्ष और साइबर स्पेस में चीन की हर हरकत को ट्रैक कर रहा है। इसे ही असल युद्ध की तैयारी कहते हैं।

इस पूरे मारक जाल की शुरुआत अंतरिक्ष से होती है। हिमालय की ऊंची चोटियां और गहरी घाटियां अक्सर रडार के लिए ‘ब्लाइंड स्पॉट’ पैदा करती हैं, जिसका फायदा उठाकर दुश्मन के फाइटर जेट्स छिपकर उड़ सकते हैं। इस भौगोलिक कमजोरी को खत्म करने के लिए भारत ने अंतरिक्ष में अपनी ‘तीसरी आंख’ सक्रिय कर दी है। कार्टोसैट और EOS सीरीज के सैटेलाइट्स के कैमरे इतने शक्तिशाली हैं कि वे अंतरिक्ष से ही चीनी सैन्य वाहनों के मॉडल और बंकरों के निर्माण को सेंटीमीटर लेवल की सटीकता के साथ देख सकते हैं।

जब हिमालय में घने बादल और बर्फबारी के कारण सामान्य कैमरे काम करना बंद कर देते हैं, तब भारत की रीसैट (RISAT) सीरीज काम आती है। इसमें सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) तकनीक का इस्तेमाल होता है जो खराब मौसम को चीरकर दिन-रात सटीक तस्वीरें लेती है। आधुनिक युद्ध सिग्नल्स का होता है, और इसके लिए भारत ने एमीसैट (EMISAT) तैनात कर रखा है। चीन तिब्बत में चाहे कितने भी गुप्त एयरबेस बना ले, वहां से निकलने वाले रेडियो सिग्नल्स और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों को भारत अंतरिक्ष से ही इंटरसेप्ट कर लेता है। चीनी एयरबेस से किसी फाइटर जेट के उड़ान भरने से पहले ही भारत को उसकी खबर मिल जाती है।

तिब्बत का पठार चीन को जो नेचुरल हाई-ऑल्टिट्यूड एडवांटेज देता था, भारत ने अपने एयरबॉर्न रडार नेटवर्क से उसे बेअसर कर दिया है। ‘अवाक्स’ (AWACS) आसमान में उड़ते हुए रडार होते हैं। भारत का स्वदेशी नेत्रा Mk1 फ्लीट अब पूरी तरह ऑपरेशनल है, और इजरायली फाल्कन रडार 400 किलोमीटर दूर तक दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रख सकते हैं।

असली गेम चेंजर ‘नेत्रा Mk2’ प्रोजेक्ट है। इन नए विमानों में एक बेहद पावरफुल रडार लगा होगा जो 300-डिग्री का कवरेज देगा। इसका सबसे बड़ा फायदा इसकी ‘लुक-डाउन’ क्षमता है। जब कोई एयरबॉर्न रडार ऊपर से नीचे घाटियों की तरफ देखता है, तो उसे जमीन से टकराकर वापस आने वाले बेकार सिग्नल्स का सामना करना पड़ता है, लेकिन नेत्रा Mk2 के एडवांस एल्गोरिदम इन बाधाओं को फिल्टर करके हिमालय की घाटियों में छिपकर उड़ने वाले चीनी स्टेल्थ जेट्स को आसानी से पकड़ लेंगे।

हिमालय की रडार शैडो को खत्म करने के लिए भारत ने एक मल्टी-लेयर्ड माउंटेन रडार नेटवर्क बिछाया है। गुलमर्ग और नागालैंड में लगाए गए नए रडार इसकी शुरुआत मात्र हैं। इन माउंटेन रडार्स के साथ ‘अरुधरा’ और ‘अश्विनी’ जैसे एडवांस सिस्टम्स काम कर रहे हैं। अरुधरा एक मीडियम पावर रडार है जो फाइटर जेट्स, ड्रोन्स और क्रूज मिसाइलों को एक साथ मॉनिटर कर सकता है। अश्विनी AESA रडार की सबसे बड़ी ताकत उसकी गतिशीलता है, जिसे जरूरत पड़ने पर रातों-रात किसी भी हॉटस्पॉट पर तैनात किया जा सकता है। लो-फ्लाइंग ड्रोन्स और छोटे हेलीकॉप्टर्स के खतरे को खत्म करने के लिए भारत ने अपनी सुरक्षा को अभेद्य बना लिया है।

अब बात उस सीक्रेट हथियार की जिसने पूरी दुनिया के डिफेंस एक्सपर्ट्स को चौंका दिया है। दुनिया भर के देश अभी क्वांटम रडार के दावे ही कर रहे हैं, लेकिन उसे काम करने के लिए अत्यधिक ठंडे तापमान की जरूरत होती है। DRDO ने अपना फोकस ‘फोटोनिक रडार’ पर शिफ्ट किया और आज इसका सफल परिणाम दुनिया के सामने है।

DRDO की प्रयोगशाला LRDE ने भारत का पहला स्वदेशी फोटोनिक रडार विकसित कर लिया है। जहां पारंपरिक रडार रेडियो फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल करते हैं, वहीं फोटोनिक रडार लेजर और लाइट सिग्नल्स का उपयोग करता है। इसके फायदे इतने क्रांतिकारी हैं कि चीन का J-20 स्टेल्थ प्रोग्राम इसके सामने एक खिलौना नजर आएगा। फोटोनिक रडार की सिग्नल क्लैरिटी इतनी शार्प होती है कि वह बैकग्राउंड के शोर और स्टेल्थ एयरक्राफ्ट के बारीक रिफ्लेक्शन के बीच का फर्क आसानी से पकड़ लेता है। यह रडार चीनी जेट्स को आसमान में छिपने नहीं देगा और जैमिंग वाले माहौल में भी सटीकता से काम करता रहेगा।

भारत का सर्विलांस सिर्फ एक्टिव रडार्स तक सीमित नहीं है। LAC पर ‘पैसिव सर्विलांस’ का एक अदृश्य जाल बिछाया गया है। पैसिव रडार्स खुद कोई सिग्नल नहीं छोड़ते, बल्कि वे दुश्मन के विमानों से निकलने वाले रेडियो और डेटा लिंक सिग्नल्स को चुपचाप सुनते हैं। चीन का 5वीं पीढ़ी का फाइटर भले ही रडार को चकमा दे दे, लेकिन उसके संचार सिग्नल्स भारत के इन पैसिव सेंसर्स की पकड़ में आ जाते हैं।

इतने विशाल डेटा को प्रोसेस करने के लिए भारत के पास ‘इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम’ (IACCS) है। यह भारतीय रक्षा का सेंट्रल नर्वस सिस्टम है, जो स्पेस, स्काई और ग्राउंड से मिलने वाले डेटा को पलक झपकते ही फ्यूज करता है। इसमें AI का ऐसा खतरनाक तालमेल है कि अगर कोई चीनी फाइटर तिब्बत से उड़ान भरता है, तो IACCS तुरंत उसकी दिशा का विश्लेषण करके बता देता है कि उसे गिराने के लिए कौन सी मिसाइल सबसे बेहतर रहेगी।

चीन को भारत के सीक्रेट और अंडरग्राउंड इन्फ्रास्ट्रक्चर से भारी खौफ है। भारत सिर्फ सेंसर ही नहीं लगा रहा, बल्कि पहाड़ों के अंदर एक पूरी मिलिट्री दुनिया तैयार कर रहा है। एयरबेसेस पर ऐसे शेल्टर्स बनाए गए हैं जिन पर बमों का असर नहीं होता। सेला और अटल टनल जैसे प्रोजेक्ट्स के अंदर से होने वाली हथियारों की मूवमेंट को चीन के जासूसी सैटेलाइट भी नहीं देख सकते।

यदि चीन ने कोई हिमाकत की, तो उसका विनाश तय है। S-400 ट्राइंफ को रणनीतिक स्थानों पर तैनात किया गया है जो 400 किमी दूर तक किसी भी विमान को राख कर सकता है। पहाड़ों में दुश्मन के बंकरों को तबाह करने के लिए ‘ब्रह्मोस’ मिसाइल का विशेष संस्करण मौजूद है, जो 90 डिग्री के कोण पर गोता लगाकर छिपे हुए टारगेट्स को नष्ट कर देता है। इसके साथ ही स्वदेशी पिनाका सिस्टम महज 44 सेकंड में 72 घातक रॉकेट दागकर दुश्मन के बेस को श्मशान में बदलने की क्षमता रखता है।

भारत की सैन्य सोच अब केवल बचाव की नहीं, बल्कि आक्रामक रक्षा की हो गई है। माउंटेन स्ट्राइक कॉर्प्स का गठन इसी का सबूत है, जिसका काम युद्ध की स्थिति में सीधे तिब्बत के अंदर घुसकर कब्जा करना है। आज कश्मीर से लेकर अरुणाचल तक भारत ने एक ऐसा फौलादी जाल बुन लिया है जिसमें सेंसर, रडार, सैटेलाइट और फोटोनिक टेक्नोलॉजी एक साथ काम कर रहे हैं। ड्रैगन के गुरूर को तोड़ने के लिए भारत पूरी तरह तैयार है।

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