भारत की बिना गोली चलाए ‘वाटर स्ट्राइक’, कैसे तबाह हुआ पीओके में पाकिस्तान का सबसे बड़ा नीलम-झेलम हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट?

पीओके (PoK) की वादियों में बना 5 बिलियन डॉलर का नीलम-झेलम हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट आज मलबे का ढेर बन चुका है। यह मात्र एक तकनीकी विफलता नहीं है, बल्कि दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा, बिना हथियारों के लड़ा गया कूटनीतिक और भू-राजनीतिक जल-युद्ध है। पाकिस्तान की संसद से लेकर रावलपिंडी के हेडक्वार्टर तक इस वक्त सिर्फ एक ही खौफ है कि क्या भारत ने बिना सीमा लांघे पाकिस्तान पर एक ऐसी ‘अंडरकवर वाटर-स्ट्राइक’ कर दी है, जिसकी भनक उनकी खुफिया एजेंसी आईएसआई को भी नहीं लगी?

साल 2024 में नीलम-झेलम की महा-टनल का अचानक ढहना और 2020 में एलओसी पर भारतीय सेना की भारी गोलाबारी के बीच क्या संबंध है? आज हम पाकिस्तान की बर्बादी के इस डार्क सीक्रेट को पूरी तरह डिकोड करेंगे।

संसद की गुप्त बैठक और वाप्डा (WAPDA) का बड़ा खुलासा

इस कहानी की शुरुआत पाकिस्तान की संसद के एक बंद कमरे से होती है, जहाँ सीनेट की जल संसाधन समिति की सीक्रेट मीटिंग चल रही थी। जब वाटर एंड पावर डेवलपमेंट ऑथोरिटी (WAPDA) के अधिकारी रिपोर्ट पेश करने आए, तो उनके सुर बदले हुए थे। उन्होंने स्वीकार किया कि मुजफ्फराबाद के पास बना 969 मेगावाट का नीलम-झेलम हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट पूरी तरह से कोलैप्स हो चुका है।

प्रोजेक्ट की अंडरग्राउंड हेडरेस टनल में आए ब्लॉकेज के कारण पूरा टनल सिस्टम ढह गया। अधिकारियों ने बताया कि इस डैमेज को ठीक करने में मार्च 2028 तक का वक्त लगेगा। यानी अगले कई वर्षों तक इस अरबों डॉलर के प्रोजेक्ट से बिजली की एक यूनिट भी पैदा नहीं होगी।

जैसे ही यह खबर लीक हुई, पूरे पाकिस्तान में हड़कंप मच गया। जिस प्रोजेक्ट को बनाने में पाकिस्तान ने 2007 से 2018 के बीच अपने खाली खजाने से लगभग 500 अरब रुपये (5 बिलियन डॉलर) फूंक दिए थे, वह आज सिर्फ कबाड़ का ढांचा रह गया है।

भारत का किशनगंगा मास्टरस्ट्रोक और ‘प्रायर एप्रोप्रिएशन’ की रणनीति

इस तबाही को समझने के लिए हमें इतिहास और भारत के उस मास्टरस्ट्रोक को समझना होगा जिसे किशनगंगा हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के नाम से जाना जाता है। पाकिस्तान ने नीलम-झेलम प्रोजेक्ट का निर्माण भारत को 1960 की सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) में फंसाने के लिए किया था।

इंटरनेशनल वाटर लॉ के तहत डॉक्ट्रिन ऑफ प्रायर एप्रोप्रिएशन का नियम है। इसका मतलब है कि जो देश किसी नदी पर पहले अपना प्रोजेक्ट पूरा कर लेगा, पानी पर पहला कानूनी अधिकार उसी का होगा। पाकिस्तान इसी का फायदा उठाकर नीलम (किशनगंगा) नदी पर भारत से पहले डैम बनाना चाहता था।

लेकिन नई दिल्ली की मोदी सरकार ने पाकिस्तान की चाल भांपते हुए बांदीपोरा में 330 मेगावाट का किशनगंगा प्रोजेक्ट युद्ध स्तर पर पूरा किया। भारत की इंजीनियरिंग इतनी सटीक थी कि हमने किशनगंगा का पानी रोककर एक टनल के जरिए उसे वुलर लेक की तरफ डायवर्ट कर दिया।

पाकिस्तान हेग स्थित इंटरनेशनल कोर्ट गया, लेकिन भारत की मजबूत दलीलों के आगे उसे हार माननी पड़ी। 2018 में भारत ने अपना प्रोजेक्ट शुरू कर दिया, जबकि पाकिस्तान का 500 अरब का प्रोजेक्ट भ्रष्टाचार और लेटलतीफी की भेंट चढ़ गया।

क्या 2020 की भारी बमबारी ने हिला दी नीलम-झेलम की बुनियाद?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस टनल के ढहने के तार 13 नवंबर 2020 की उस रात से जुड़े हैं, जब भारतीय सेना ने पाकिस्तानी गोलाबारी का करारा जवाब दिया था। उस जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तानी बंकरों को नेस्तनाबूद कर दिया गया था।

उस वक्त पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने रोते हुए दावा किया था कि भारतीय सेना के आर्टिलरी शेल्स नीलम-झेलम प्रोजेक्ट की टनल और डैम साइट के बेहद करीब गिरे हैं। चूंकि यह क्षेत्र संवेदनशील सिस्मिक जोन (Seismic Zone) में आता है, इसलिए धमाकों का असर गहरा था।

भारतीय तोपों के धमाकों से पैदा हुई शॉकवेव्स ने घटिया चीनी मटीरियल से बनी इस टनल में सूक्ष्म दरारें पैदा कर दीं। समय के साथ पानी के दबाव ने इन दरारों को चौड़ा किया और अंततः 2024 में पूरा स्ट्रक्चर बैठ गया। पाकिस्तान अपनी नाक बचाने के लिए इसे प्राकृतिक विफलता बता रहा है, लेकिन सच यह है कि भारतीय सेना के रिस्पॉन्स ने इसकी नींव बहुत पहले ही हिला दी थी।

चीनी कंपनियों का भ्रष्टाचार और ‘डेथ ट्रैप’

नीलम-झेलम प्रोजेक्ट के निर्माण का जिम्मा चीन की कंपनी गेझोउबा ग्रुप के पास था। लेकिन अब टनल ढहने के बाद चीनी इंजीनियर्स जिम्मेदारी लेने के बजाय प्रोजेक्ट साइट छोड़कर भाग खड़े हुए हैं।

यह चीन के कर्ज के जाल यानी डेट ट्रैप का जीता-जागता उदाहरण है। चीनी कंपनियों ने निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया और सुरक्षा मानकों की अनदेखी की।

आज जब पाकिस्तान चीन से गुहार लगा रहा है, तो चीन ने इसे फिर से बनाने के लिए निवेश करने से मना कर दिया है। पाकिस्तान में चीनी इंजीनियरों पर बढ़ते आतंकी हमलों ने भी ड्रैगन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है।

टू-फ्रंट वाटर वॉर: भारत और तालिबान का दोहरा प्रहार

पाकिस्तान आज एक ऐसे टू-फ्रंट वाटर वॉर में फंस गया है, जिससे निकलना उसके लिए नामुमकिन लग रहा है।

  • पूर्वी मोर्चा (भारत): भारत ने शाहपुर कंडी बैराज जैसे प्रोजेक्ट्स के जरिए रावी नदी का वह पानी रोक दिया है जो दशकों से मुफ्त में पाकिस्तान जा रहा था। अब भारत अपने हिस्से की एक-एक बूंद का इस्तेमाल जम्मू-कश्मीर और पंजाब के लिए कर रहा है।

  • पश्चिमी मोर्चा (तालिबान): अफगानिस्तान ने काबुल नदी पर आक्रामक ढंग से कोश टेपा कैनाल का निर्माण शुरू कर दिया है। काबुल नदी पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा की लाइफलाइन है, और तालिबान ने स्पष्ट किया है कि वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि को नहीं मानते।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और तालिबान के बीच एक ‘साइलेंट स्ट्रैटेजिक अंडरस्टैंडिंग’ काम कर रही है, जिसने पाकिस्तान को जल संकट के मुहाने पर खड़ा कर दिया है।

पीओके में पाकिस्तान के खिलाफ बढ़ता विद्रोह

नीलम-झेलम प्रोजेक्ट की बर्बादी ने पीओके के लोगों के गुस्से को चरम पर पहुंचा दिया है। वहाँ के संसाधनों से बनी बिजली पाकिस्तान के शहरों को रोशन करती है, लेकिन नीलम वैली के लोग आज भी अंधेरे में महंगे बिल चुकाने को मजबूर हैं।

वहाँ अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में ऐतिहासिक जनांदोलन खड़ा हो चुका है। लोग पाकिस्तानी सेना के खिलाफ सड़कों पर हैं और भारत के जम्मू-कश्मीर में हो रहे विकास को देखकर पाकिस्तान से आजादी की मांग कर रहे हैं।

यह जल-युद्ध मात्र पानी की लड़ाई नहीं है, बल्कि पाकिस्तान के उस प्रोपेगेंडा का अंत है जिसने उसे कंगाली के कगार पर ला खड़ा किया है। दूसरों के लिए गड्ढा खोदने वाला पाकिस्तान आज खुद उसी में दफन हो रहा है।

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