क्वाड समिट से पहले कोलकाता में कूटनीतिक हलचल: 15 साल बाद फिर खुला ‘गेटवे ऑफ द ईस्ट’

दुनिया की महाशक्ति अमेरिका का एक अति-विशिष्ट (VVIP) विमान पूरी गति से आसमान को चीरते हुए एशिया की ओर बढ़ रहा था। बीजिंग के सत्ता गलियारों में बैठे चीनी रणनीतिकार और सैन्य कमांडर अपनी राडार स्क्रीन पर नजरें गड़ाए हुए थे। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि यह विमान हमेशा की तरह नई दिल्ली के रनवे पर ही उतरेगा। लेकिन तभी कूटनीतिक जगत में एक ऐसा ‘यू-टर्न’ आया जिसने वैश्विक विशेषज्ञों को हैरान कर दिया। वह अमेरिकी विमान दिल्ली के बजाय अचानक पूरब की ओर मुड़ा और पश्चिम बंगाल की धरती पर लैंड कर गया। इस एक लैंडिंग ने बीजिंग से लेकर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय तक हड़कंप मचा दिया। चीनी विशेषज्ञ तुरंत नक्शों का विश्लेषण करने लगे कि वाशिंगटन और नई दिल्ली मिलकर भारत के पूर्वी मोर्चे पर कौन सा नया चक्रव्यूह तैयार कर रहे हैं। विमान से कोई साधारण अधिकारी नहीं, बल्कि अमेरिकी विदेश नीति की दिशा तय करने वाला शीर्ष रणनीतिकार उस धरती पर उतरा, जिसे दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार माना जाता है।

आखिर 15 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद अमेरिका ने बंगाल की भूमि पर अपने विदेश मंत्री का विमान क्यों उतारा? कोलकाता की इस धरती से चीन को क्या कड़ा संदेश दिया गया है, जिसने ड्रैगन की रातों की नींद उड़ा दी है? और कैसे एक शहर अचानक हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र का सबसे बड़ा कूटनीतिक केंद्र बन गया? इन प्रश्नों का उत्तर तब मिला जब कोलकाता एयरपोर्ट पर मार्को रुबियो ने कदम रखा। अमेरिकी विदेश मंत्री वाशिंगटन से सीधे कोलकाता पहुंचे हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कोई भी कदम बिना किसी ठोस कारण के नहीं उठाया जाता। जब कोई वैश्विक नेता राजधानी को छोड़कर किसी राज्य की राजधानी में उतरता है, तो उसके संदेश गहरे होते हैं। यह कोई सामान्य दौरा नहीं, बल्कि एक ऐसा भू-राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक है जिसकी गूंज बीजिंग तक सुनाई दे रही है।

इतिहास का दोहराव और बंगाल का नया शक्ति केंद्र

इस घटनाक्रम को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को देखना होगा। ठीक 15 साल पहले, 2012 में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भी दिल्ली से पहले कोलकाता पहुंची थीं। उस समय बंगाल में दशकों पुराने वामपंथी शासन का अंत हुआ था और अमेरिका ने नई लीडरशिप के साथ तालमेल बिठाने के लिए वह दौरा किया था। यह अमेरिकी विदेश नीति का एक पुराना तरीका है कि वह उभरते हुए सामरिक और आर्थिक केंद्रों के साथ सीधे संबंध बनाता है। लेकिन आज स्थितियां बदल चुकी हैं और भारत की कूटनीति पहले से कहीं अधिक आक्रामक है। इस बार बंगाल की धरती पर हुए बदलाव ने अमेरिका को अपना सबसे बड़ा मोहरा यहाँ उतारने पर विवश किया है।

इसका मुख्य कारण पश्चिम बंगाल में हुआ ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन है। 15 साल बाद बंगाल की राजनीति ने फिर करवट ली है और वहां एक नई विचारधारा की सरकार सत्ता में आई है। अमेरिका की वैश्विक नीति हमेशा उभरते हुए शक्ति केंद्रों को प्राथमिकता देती है। मार्को रुबियो का कोलकाता आना इस बात का प्रमाण है कि अमेरिका भारत के उन राज्यों के साथ सीधे जुड़ना चाहता है जो भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, यह खेल केवल आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध चीन की विस्तारवादी नीतियों को रोकने से है।

पड़ोसी देशों का संकट और चीन की घेराबंदी

यदि आप वैश्विक मानचित्र पर भारत के पड़ोस को देखें, तो पश्चिम बंगाल की सीमाएं बांग्लादेश से जुड़ी हैं। बांग्लादेश में हाल ही में हुए राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान चीन ने अपना प्रभाव बढ़ाने की पुरजोर कोशिश की थी। बीजिंग हमेशा भारत के पड़ोसियों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है। लेकिन भारत ने अपनी सशक्त विदेश नीति से चीन के उन मंसूबों को विफल कर दिया। ऐसे में मार्को रुबियो का कोलकाता आगमन चीन के लिए एक कड़ा कूटनीतिक जवाब है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा के तुरंत बाद उनके सबसे भरोसेमंद मंत्री का भारत के पूर्वी राज्य में आना यह संदेश देता है कि अमेरिका इस क्षेत्र में भारत के साथ मजबूती से खड़ा है।

कोलकाता को भू-राजनीति में ‘गेटवे ऑफ द ईस्ट’ कहा जाता है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी रणनीतियों को मजबूत करने के लिए अमेरिका के पास कोलकाता से बेहतर स्थान नहीं हो सकता। यह ध्यान देने योग्य है कि अमेरिका का दूसरा सबसे पुराना वाणिज्य दूतावास (Consular Office) कोलकाता में ही स्थित है। ब्रिटिश काल से ही इस शहर की सामरिक स्थिति का महत्व रहा है। दक्षिण-पूर्व एशिया के नेटवर्क को नियंत्रित करने के लिए कोलकाता आज भी एक आदर्श आधार है। वाशिंगटन जानता है कि यदि चीन के समुद्री व्यापार और दबदबे को चुनौती देनी है, तो भारत के पूर्वी तट को रक्षा तंत्र का हिस्सा बनाना अनिवार्य है।

मलक्का स्ट्रेट की सुरक्षा और ‘चाइना प्लस वन’ मॉडल

समुद्री सुरक्षा की चर्चा में मलक्का स्ट्रेट का जिक्र महत्वपूर्ण है। यह वह संकरा रास्ता है जहां से चीन का अधिकांश व्यापार और तेल आपूर्ति होती है। यदि भविष्य में यह मार्ग बाधित होता है, तो चीन की अर्थव्यवस्था संकट में पड़ सकती है। बंगाल की खाड़ी में भारतीय नौसेना का प्रभुत्व बीजिंग के लिए बड़ी चिंता का विषय है। अमेरिका का कोलकाता के साथ साझेदारी बढ़ाना चीन को यह अल्टीमेटम है कि अब समुद्र में उसकी मनमानी नहीं चलेगी। भारत ने अपने पूर्वी तटों को एक अभेद्य सुरक्षा कवच में बदल दिया है।

इसके साथ ही आर्थिक निवेश का पहलू भी जुड़ा है। भारत का पूर्वी हिस्सा अब एक वैश्विक आर्थिक हब बन रहा है। बंगाल में नई प्रशासनिक व्यवस्था से निवेशकों का भरोसा बढ़ा है। अमेरिका अपनी कंपनियों के लिए चीन के विकल्प के रूप में एक स्थिर और सुरक्षित स्थान देख रहा है। ‘चाइना प्लस वन’ की वैश्विक रणनीति में भारत का यह पूर्वी द्वार पूरी तरह फिट बैठता है। यह केवल कूटनीति नहीं, बल्कि चीन की मैन्युफैक्चरिंग एकाधिकार को तोड़ने का एक बड़ा आर्थिक प्रयास भी है।

नई दिल्ली का वॉर रूम और क्वाड की बैठक

कोलकाता में अपना संदेश देने के बाद मार्को रुबियो का अगला गंतव्य नई दिल्ली है। 26 तारीख को दिल्ली में ‘क्वाड’ (Quad) देशों का महासम्मेलन होने जा रहा है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का यह समूह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ एक मजबूत दीवार है। दिल्ली की इस बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर और मार्को रुबियो सहित चारों देशों के शीर्ष रणनीतिकार एक साथ बैठेंगे। इस चर्चा का मुख्य केंद्र चीन की घेराबंदी और एक स्वतंत्र हिंद-प्रशांत क्षेत्र सुनिश्चित करना होगा।

इस बार क्वाड का एजेंडा केवल सैन्य अभ्यास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ और ‘रेयर अर्थ एलिमेंट्स’ जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं। आधुनिक तकनीक, स्मार्टफोन और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए इन खनिजों की आवश्यकता होती है, जिस पर अब तक चीन का एकाधिकार रहा है। क्वाड देश अब एक स्वतंत्र सप्लाई चेन नेटवर्क तैयार कर रहे हैं, जिससे इस क्षेत्र में चीन की निर्भरता को समाप्त किया जा सके। दिल्ली की यह बैठक इसी ब्लूप्रिंट को अंतिम रूप देगी।

शक्तिशाली भारत की वैश्विक गूंज

इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका अत्यंत प्रभावशाली हो गई है। आज का भारत अपनी शर्तें खुद तय करता है। अमेरिका को यह अहसास हो चुका है कि एशिया में केवल भारत ही चीन को सीधी चुनौती देने में सक्षम है। क्वाड का असली मकसद एक ऐसा रणनीतिक जाल बुनना है जिसे भेदना बीजिंग के लिए असंभव हो। अमेरिकी विदेश मंत्री का दिल्ली से पहले कोलकाता को चुनना इस बात का प्रतीक है कि सुपरपावर अमेरिका अब भारत की क्षेत्रीय शक्ति को वैश्विक मान्यता दे चुका है।

निष्कर्ष यह है कि वैश्विक राजनीति अब केवल राजधानियों तक सीमित नहीं है। बंगाल के नए समीकरण, बांग्लादेश की स्थिति और क्वाड की बैठक, ये सभी एक बड़ी रणनीति के हिस्से हैं। चीन जो भारत को उलझाने की कोशिश कर रहा था, वह अब खुद अपने बुने जाल में फंसता नजर आ रहा है। बंगाल की खाड़ी से लेकर दक्षिण चीन सागर तक, भारत और उसके सहयोगियों ने ऐसी घेराबंदी की है कि चीन को हर मोर्चे पर पीछे हटना होगा।

कोलकाता की गलियों से लेकर दिल्ली के सत्ता गलियारों तक, भारत के कूटनीतिक वर्चस्व की गूंज सुनाई दे रही है। बीजिंग को कड़ा संदेश दिया जा चुका है। अब यह देखना होगा कि क्वाड बैठक के बाद चीन की क्या प्रतिक्रिया होती है। इस वैश्विक शतरंज में वर्तमान में बाजी भारत के पक्ष में नजर आ रही है।

Share This Article
Leave a Comment