मोंगला पोर्ट पर चीन का बढ़ता प्रभाव: भारत की रणनीतिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती

भारत का पूर्वी सीमावर्ती क्षेत्र आज एक ऐसी कूटनीतिक और सामरिक उलझन का सामना कर रहा है, जिसकी कल्पना कुछ दशक पहले करना कठिन था। 1971 के युद्ध के बाद से जिस बांग्लादेश को भारत ने अपना सबसे विश्वसनीय सहयोगी माना, आज वही पड़ोसी एक ऐसी दिशा में बढ़ रहा है जो भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे (National Security Architecture) को सीधे चुनौती दे रहा है। यह मात्र एक सामान्य नीतिगत बदलाव नहीं है, बल्कि बंगाल की खाड़ी के शांत जल में भारत की व्यवस्थित घेराबंदी का एक स्पष्ट संकेत है।

मोंगला बंदरगाह का कूटनीतिक खेल

इस पूरे भू-राजनीतिक विवाद के केंद्र में मोंगला पोर्ट है। साल 2015 के समझौतों के बाद, इस बंदरगाह को भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग माना जा रहा था। भारत का लक्ष्य इस पोर्ट के माध्यम से दक्षिण-पूर्व एशिया तक अपनी पहुंच बनाना था। लेकिन तारिक रहमान की सरकार ने अचानक इस परियोजना का जिम्मा चीन की सरकारी कंपनी CCCC (चाइना सिविल इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन) को सौंप दिया, जिससे पूरे समीकरण बदल गए हैं।

कूटनीतिक दृष्टि से यह भले ही एक कमर्शियल डील दिखे, लेकिन सामरिक विशेषज्ञों के लिए यह खतरे की घंटी है। मोंगला पोर्ट भारतीय सीमा से सिर्फ 80 किलोमीटर दूर है। इतनी निकटता का अर्थ है कि विदेशी प्रभाव अब सीधे भारत की दहलीज पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन यहाँ समुद्री निगरानी प्रणाली (Maritime Surveillance) और इलेक्ट्रॉनिक जासूसी उपकरण तैनात कर सकता है। यदि ऐसा होता है, तो कोलकाता और हल्दिया बंदरगाह की हर गतिविधि चीनी रडार पर होगी और भारतीय नौसेना की पनडुब्बियों की चाल बीजिंग की नजरों से नहीं बच पाएगी।

चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति

चीन की यह ‘डेट ट्रैप’ यानी कर्ज के जाल में फंसाने की कूटनीति पुरानी है। श्रीलंका का हंबनटोटा और पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। अब वही पैटर्न बांग्लादेश में भी दोहराया जा रहा है। मोंगला पोर्ट के समीप 110 एकड़ जमीन का चीनी कंपनियों के लिए रिजर्व होना यह दर्शाता है कि चीन वहां केवल व्यापार नहीं, बल्कि अपना एक मजबूत इकोसिस्टम तैयार कर रहा है। इसके साथ ही बांग्लादेश की शिक्षा प्रणाली में मंदारिन भाषा का बढ़ता प्रभाव सांस्कृतिक वर्चस्व का भी संकेत है।

तीस्ता नदी और जल सुरक्षा का खतरा

पोर्ट के अलावा, तीस्ता नदी परियोजना में चीन की सक्रियता भारत के लिए एक और बड़ी समस्या है। तीस्ता का जल दोनों देशों की जीवनरेखा है, लेकिन चीन अब इस विवादित जल परियोजना में निर्माण कार्य तेज कर रहा है। यदि तीस्ता का नियंत्रण बीजिंग के हाथों में जाता है, तो वह भारत के खिलाफ पानी को एक हथियार (Water Weapon) के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। यह ‘चिकन नेक’ यानी सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास होने के कारण भारत की संप्रभुता के लिए एक सीधा सैन्य खतरा है।

शेख हसीना और बांग्लादेश की बदलती राजनीति

2024 के बाद बांग्लादेश में आए राजनीतिक भूचाल ने सत्ता के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ हुई कार्रवाई और उन्हें मिली सजा ने वहां एक बड़ा वैक्यूम पैदा किया है। हालांकि, हसीना ने अपने हालिया लेखों में स्पष्ट किया है कि वह शांत नहीं बैठेंगी। उन्होंने बांग्लादेश में बढ़ती तानाशाही और चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण देश की संप्रभुता से हो रहे समझौतों पर कड़ा रुख अपनाया है।

बांग्लादेश में वर्तमान अस्थिरता और सेना की तैनाती प्रशासन की कमजोरी को दर्शाती है। यदि बांग्लादेश पूरी तरह चीन के प्रभाव में चला जाता है, तो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का पावर बैलेंस बिगड़ जाएगा। यही कारण है कि अमेरिका और अन्य पश्चिमी शक्तियां भी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि बंगाल की खाड़ी में चीन की स्थाई मौजूदगी किसी के हित में नहीं है।

भारत की सक्रिय कूटनीति

भारत इस पूरी स्थिति को लेकर अत्यधिक सतर्क है। भारत के पास आर्थिक और कूटनीतिक रूप से ऐसे कई विकल्प हैं जिनसे वह दबाव बना सकता है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था आज भी बिजली आपूर्ति और व्यापार के लिए भारत पर निर्भर है। यदि भारत ने अपनी रणनीतिक सुरक्षा के लिए सख्त कदम उठाए, तो बांग्लादेश के वर्तमान नेतृत्व के लिए उसे संभालना चुनौतीपूर्ण होगा।

भारतीय नौसेना ने भी बंगाल की खाड़ी में अपनी पेट्रोलिंग और निगरानी बढ़ा दी है। अंडमान निकोबार कमांड का सुदृढ़ीकरण इसी दिशा में एक कदम है। भारत अब रक्षात्मक के बजाय ‘प्रोएक्टिव’ नीति अपना रहा है। नई दिल्ली यह समझ चुकी है कि चीन उसे पड़ोसी देशों के विवादों में उलझाकर रखना चाहता है ताकि भारत वैश्विक महाशक्ति न बन सके, लेकिन भारत अब अपने राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता नहीं करेगा।

मोंगला पोर्ट से लेकर तीस्ता नदी तक, भारत हर मोर्चे पर मुस्तैद है। चीन की ‘मोतियों की माला’ वाली रणनीति निश्चित रूप से एक बड़ी चुनौती है, लेकिन इसे काटने की क्षमता भारत के सामरिक ढांचे में मौजूद है। भविष्य यह तय करेगा कि यह तनाव कूटनीति से सुलझता है या इस क्षेत्र में एक नए शक्ति संघर्ष का उदय होगा।

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