दुनिया के नक्शे पर इस वक्त एक ऐसी रणनीतिक बिसात बिछ चुकी है जिसने वॉशिंगटन से लेकर बीजिंग और मॉस्को से लेकर पूरे मिडिल ईस्ट तक खलबली मचा दी है। एक तरफ समंदर में बारूद सुलग रहा है, मालवाहक जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है और वैश्विक व्यापार की लाइफलाइन यानी ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) लगभग ठप होने की कगार पर है। लेकिन जब दुनिया इस संकट से त्राहि-त्राहि कर रही है, ठीक उसी वक्त क्रेमलिन से व्लादिमीर पुतिन ने एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला है जिसने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत का पुराना दोस्त रूस अब चीन के साथ मिलकर एक ऐसा ‘मेगा एनर्जी कॉरिडोर’ तैयार कर रहा है, जो आने वाले दशकों में वैश्विक जियोपॉलिटिक्स का रुख बदल देगा। समुद्री रास्ते के खतरों को देखते हुए पुतिन ने चीन की सबसे बड़ी कमजोरी को भांप लिया और बीजिंग के सामने एक ऐसी डील रख दी है, जिसे ठुकराना शी जिनपिंग के लिए मुमकिन नहीं है। यह खेल सिर्फ गैस की खरीद-फरोख्त का नहीं, बल्कि ग्लोबल सुपरपावर की गद्दी का है, जहां अमेरिका को चुनौती देने के लिए दो महाशक्तियां हाथ मिला चुकी हैं।
होर्मुज का महासंकट और चीन की बेचैनी
इस पूरी इनसाइड स्टोरी को समझने के लिए सबसे पहले हमें उस समंदर का रुख करना होगा जहां इस वक्त तनाव चरम पर है। ईरान और अमेरिका के बीच मिडिल ईस्ट में जारी तनातनी ने ग्लोबल पेट्रो-मार्केट को हिलाकर रख दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया का एक-तिहाई कच्चा तेल और गैस गुजरती है, वहां नाकेबंदी जैसे हालात हैं। भारत समेत दुनिया के तमाम बड़े देश इस बात से डरे हुए हैं कि अगर यह रूट बंद हुआ तो अर्थव्यवस्था का क्या होगा। लेकिन सबसे ज्यादा डर चीन के खेमे में था। चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर है। अगर होर्मुज से आने वाले जहाज रुक गए, तो चीन की फैक्ट्रियां और उसकी पूरी इकोनॉमी चंद हफ्तों में घुटनों पर आ जाएगी।
शी जिनपिंग इसी डर में थे कि तभी व्लादिमीर पुतिन ने अपने पिटारे से ‘पावर ऑफ साइबेरिया 2’ (Power of Siberia 2) गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट निकाला, जो चीन के लिए किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है। पुतिन ने साफ कर दिया है कि अगर समंदर का रास्ता बंद है, तो रूस अपनी सरजमीं से सीधे चीन की फैक्ट्रियों तक गैस पहुंचाएगा।
पावर ऑफ साइबेरिया 2: पुतिन का मेगा एनर्जी प्लान
यह कोई साधारण पाइपलाइन नहीं है, बल्कि आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा ऊर्जा ढांचागत प्रोजेक्ट बनने जा रहा है। इस योजना के तहत रूस के दुर्गम साइबेरियाई क्षेत्र से मंगोलिया के रास्ते होते हुए सीधे चीन तक हजारों किलोमीटर लंबी प्राकृतिक गैस पाइपलाइन बिछाई जाएगी। रूस की तैयारी है कि आगामी सितंबर तक कीमतों का सस्पेंस खत्म कर इस प्रोजेक्ट का निर्माण युद्ध स्तर पर शुरू किया जाए। क्रेमलिन के विदेश नीति सलाहकार यूरी उशाकोव ने भी पुष्टि की है कि पुतिन की चीन यात्रा के एजेंडे में यह डील सबसे ऊपर है। दोनों नेताओं के बीच होने वाली मुलाकातों में इस मेगा डील की एक-एक बारीक कड़ी को फाइनल किया जा रहा है।
रूस को विश्वास है कि मिडिल ईस्ट के हाहाकार और इंटरनेशनल मार्केट की उथल-पुथल के बाद अब चीन कीमतों को लेकर नखरे नहीं दिखाएगा। इससे पहले चीन मोलभाव कर रहा था, लेकिन अब चारों तरफ से रास्ते बंद देख चीनी अधिकारियों ने इस ठंडे पड़े प्रोजेक्ट की फाइलों पर काम की रफ्तार दस गुना बढ़ा दी है।
यूरोपीय बाजार का विकल्प बना एशिया
रूस इस डील के लिए इतना बेताब क्यों है, इसे समझना भी जरूरी है। यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर इतने कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं कि उसका सबसे बड़ा यूरोपीय गैस बाजार लगभग खत्म हो गया है। रूस को अपनी अर्थव्यवस्था चलाने, सैनिकों को वेतन देने और देश को मंदी से बचाने के लिए एक बहुत बड़े बाजार की जरूरत थी। यह जरूरत सिर्फ एशिया ही पूरी कर सकता था, जिसमें चीन सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा है।
मॉस्को के एक्सपर्ट वासिली काशिन का मानना है कि मिडिल ईस्ट का संकट और ईरान-अमेरिका की जंग दरअसल रूस-चीन के रिश्तों के लिए एक उत्प्रेरक (Catalyst) साबित हो रही है। इस संकट ने दोनों देशों को इतना करीब ला दिया है जिसकी कल्पना वॉशिंगटन ने कभी नहीं की थी।
33% सस्ती गैस: ट्रंप के लिए सबसे बड़ी चुनौती
इस डील की सबसे चौंकाने वाली बात इसकी कीमत है। प्रतिबंधों के चक्रव्यूह में फंसे रूस ने चीन को लुभाने के लिए अपने सारे पत्ते खोल दिए हैं। दावा किया जा रहा है कि रूस अपने पुराने ग्राहक यूरोप की तुलना में चीन को लगभग 33% कम कीमत पर गैस बेचेगा। साल 2029 तक चीन में रूसी गैस का एक विशाल नेटवर्क तैयार हो जाएगा, जो बेहद सस्ती दरों पर चीन की हर जरूरत को पूरा करेगा।
डोनाल्ड ट्रंप जो चीन पर नए ट्रेड वॉर और भारी टैरिफ की धमकी दे रहे हैं, उनके लिए यह बड़ी चुनौती है। ट्रंप का प्लान चीन को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने का था, लेकिन पुतिन ने चीन को सस्ती और सुरक्षित ऊर्जा की गारंटी देकर ट्रंप के प्रतिबंधों का असर आधा कर दिया है। बिना किसी समुद्री खतरे और अमेरिकी नेवी के डर के, रूसी गैस सीधे चीन पहुंचेगी। यह अमेरिकी प्रभुत्व (Hegemony) के मुंह पर एक बड़ा तमाचा है।
नए वर्ल्ड ऑर्डर की आहट और भारत
पुतिन और शी जिनपिंग की यह जुगलबंदी केवल बिजनेस डील नहीं, बल्कि एक नए वर्ल्ड ऑर्डर की स्क्रिप्ट है। एक ऐसा वर्ल्ड ऑर्डर जहां अमेरिका की डॉलर डिप्लोमेसी और नौसैनिक ताकत को सीधी चुनौती दी जा रही है। समंदर के रास्ते को ब्लॉक कर अमेरिका जिस चीन को घेरना चाहता था, रूस ने उसे जमीन के रास्ते सुरक्षित कॉरिडोर दे दिया है।
इस घटनाक्रम पर भारत की भी पैनी नजर है। रूस भारत का भरोसेमंद साझेदार है और भारत खुद रूस से रियायती तेल खरीद रहा है। हालांकि, रूस और चीन की बढ़ती नजदीकियां भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन की चुनौती पेश करती हैं। लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि पुतिन के इस मेगा प्लान ने दुनिया के बड़े-बड़े धुरंधरों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। यह पाइपलाइन आने वाले दिनों में सिर्फ ईंधन नहीं, बल्कि वैश्विक सियासत की नई आग भी साथ लाएगी।

