‘अमेरिका फर्स्ट’ या चीन से दोस्ती? बीजिंग में जिनपिंग के मुरीद हुए डोनाल्ड ट्रंप, कूटनीति की बिसात से दुनिया हैरान

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच पर कब कौन सा खिलाड़ी अपनी चाल बदल दे, यह अनुमान लगाना बड़े-बड़े विशेषज्ञों के लिए भी कठिन है। वैश्विक राजनीति में न तो कोई स्थायी शत्रु होता है और न ही स्थायी मित्र, यहाँ केवल और केवल राष्ट्रहित ही सबसे ऊपर होते हैं। आज दुनिया एक ऐसा ही बड़ा और चौंकाने वाला कूटनीतिक मोड़ देख रही है। वह अमेरिका, जो कल तक ताइवान, दक्षिण चीन सागर और ट्रेड टैरिफ के मुद्दों पर चीन को सीधी चुनौती दे रहा था, आज उसी देश के राष्ट्रपति बीजिंग में हैं। डोनाल्ड ट्रंप चीन की धरती पर खड़े होकर राष्ट्रपति शी जिनपिंग की प्रशंसा कर रहे हैं। यह वही डोनाल्ड ट्रंप हैं जिन्होंने अपने पिछले कार्यकाल में चीन के प्रति सबसे सख्त नीतियां अपनाई थीं, लेकिन आज बीजिंग के ‘ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल’ में नजारा पूरी तरह बदला हुआ है। ट्रंप जिनपिंग को एक महान नेता बता रहे हैं और उनके साथ अपनी मित्रता को एक बड़ा सम्मान कह रहे हैं।

सवाल यह उठता है कि आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि अमेरिका और चीन के बीच यह नई गर्मजोशी दिखाई दे रही है? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि ड्रैगन के दरबार में चल रहे इस हाई-प्रोफाइल घटनाक्रम का भारत और शेष विश्व पर क्या प्रभाव पड़ेगा? आज हम इस भू-राजनीतिक बदलाव के हर पहलू को डिकोड करेंगे और समझेंगे कि डोनाल्ड ट्रंप की इस रणनीति के पीछे क्या उद्देश्य है।

सुपर डेलिगेशन और ट्रंप का व्यापारिक दांव

डोनाल्ड ट्रंप केवल एक राजनेता नहीं हैं, बल्कि वे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति होने के साथ-साथ एक अत्यंत कुशल और व्यावहारिक व्यवसायी भी हैं। ट्रंप जो भी कदम उठाते हैं, उसके पीछे एक ठोस ‘रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट’ (ROI) छिपा होता है। बीजिंग पहुंचने से पहले ट्रंप ने एक बड़ा दांव खेला। वे अपने साथ किसी सामान्य प्रतिनिधिमंडल को नहीं, बल्कि दुनिया भर के व्यापार पर दबदबा रखने वाले अमेरिका के शीर्ष 30 बिजनेस लीडर्स को लेकर चीन पहुंचे हैं। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि जब उन्होंने इन दिग्गजों को चीन चलने का प्रस्ताव दिया, तो किसी ने भी मना नहीं किया। अमेरिका को इस समय बड़ी डील्स की आवश्यकता है ताकि वह अपनी अर्थव्यवस्था को गति दे सके और अपने व्यापारिक घरानों के लिए नए अवसर तलाश सके।

यह मुलाकात किसी विचारधारा या वैचारिक समानता के बारे में नहीं है। यह पूरी तरह से ठोस व्यापार और डील-मेकिंग पर आधारित है। ट्रंप बखूबी जानते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को शीर्ष पर बनाए रखने के लिए चीन के विशाल विनिर्माण केंद्र और बाजार को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि वे जिनपिंग की प्रशंसा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। जब ट्रंप उन्हें एक महान नेता कहते हैं, तो उनका सीधा उद्देश्य जिनपिंग के अहंकार को संतुष्ट कर अमेरिका के लिए वे व्यापारिक छूट और समझौते हासिल करना है, जो दोनों देशों के बीच चल रहे ट्रेड वॉर के कारण रुके हुए थे।

चीन की विवशता और जिनपिंग का मास्टरप्लान

दूसरी ओर, शी जिनपिंग का व्यवहार भी बहुत कुछ संकेत दे रहा है। जिनपिंग ने जिस तरह से ट्रंप का भव्य स्वागत किया और साल 2026 को चीन-अमेरिका संबंधों का एक नया अध्याय बताया, वह चीन की आंतरिक चिंताओं को दर्शाता है। चीन की अर्थव्यवस्था वर्तमान में अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। रियल एस्टेट क्षेत्र संकट में है, विदेशी निवेशक बाहर जा रहे हैं और बेरोजगारी दर बढ़ रही है। ऐसे में अमेरिका के साथ कामकाजी संबंध बनाए रखना खुद शी जिनपिंग के अस्तित्व के लिए अनिवार्य हो गया है। चीन को पता है कि यदि ट्रंप जैसे आक्रामक नेता ने पुनः ट्रेड टैरिफ का कड़ा इस्तेमाल किया, तो चीनी अर्थव्यवस्था ढह सकती है। इसलिए, बीजिंग में जो मुस्कुराहटें दिख रही हैं, वे आपसी जरूरत और मजबूरी का मिश्रण हैं।

पीएम मोदी की प्रशंसा और भारत का स्पष्ट दृष्टिकोण

अब बात करते हैं उस पहलू की जो सीधे भारत से जुड़ा है। डोनाल्ड ट्रंप ने शी जिनपिंग को ‘महान नेता’ कहा है, लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि ट्रंप अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी अपना अच्छा मित्र और एक महान नेता बता चुके हैं। ऐसे में क्या अमेरिका भारत और चीन के साथ दोहरा खेल खेल रहा है?

इसे बहुत ही सरल शब्दों में समझने की जरूरत है। आज का भारत एक नया और ऊर्जावान राष्ट्र है जो किसी महाशक्ति के प्रमाण पत्र पर निर्भर नहीं है। ट्रंप का पीएम मोदी की तारीफ करना भारत की बढ़ती वैश्विक शक्ति, मजबूत अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमता का सम्मान है। ट्रंप जानते हैं कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन को संतुलित करने के लिए भारत के बिना अमेरिका का कोई भी कदम सफल नहीं हो सकता। भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जल्द ही तीसरी बनने की ओर अग्रसर है। हमारी बाजार शक्ति और जनसांख्यिकी किसी भी विदेशी ताकत को हमें नजरअंदाज करने की अनुमति नहीं देती।

ट्रंप का प्राथमिक लक्ष्य ‘अमेरिका फर्स्ट’ है। यदि उन्हें लगता है कि चीन के साथ मधुर बातें करने से अमेरिकी कंपनियों को लाभ होगा, तो वे ऐसा जरूर करेंगे। लेकिन नई दिल्ली का दृष्टिकोण भी स्पष्ट है। भारत की विदेश नीति आज अत्यंत आक्रामक और व्यावहारिक है। हम अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों के लिए किसी तीसरे देश पर आश्रित नहीं हैं। चाहे वह क्वाड हो, ब्रिक्स हो या एससीओ, भारत हर मंच पर अपने हितों को सर्वोपरि रखता है।

क्या वास्तव में बदल जाएगा वैश्विक क्रम?

इस मुलाकात का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि अमेरिका और चीन अचानक गहरे मित्र बन गए हैं। ऊपर से शांति दिखने के बावजूद, दोनों देशों के बीच वैश्विक रणनीतिक और सैन्य प्रतिस्पर्धा जारी रहेगी। तकनीक, एआई, सेमीकंडक्टर और अंतरिक्ष अनुसंधान में दोनों एक-दूसरे को पछाड़ने की कोशिश करेंगे। ताइवान को लेकर अमेरिका की प्रतिबद्धता और दक्षिण चीन सागर में चीन का रवैया ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं जो किसी भी समय इस तथाकथित मित्रता को समाप्त कर सकते हैं।

ट्रंप एक अनपेक्षित नेता हैं। उनकी आज की नीति कल बदल सकती है। इसलिए, भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने बुनियादी ढांचे, रक्षा उत्पादन और आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित रखे। ‘आत्मनिर्भर भारत’ का संकल्प ही हमें भविष्य की किसी भी भू-राजनीतिक चुनौती से सुरक्षित रखेगा।

निष्कर्ष यही है कि बीजिंग में जो कुछ हो रहा है, वह एक बड़ा राजनीतिक रंगमंच है। अमेरिका अपने आर्थिक हित साध रहा है और चीन अपनी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को बचाने की कोशिश कर रहा है। भारत एक शक्तिशाली पर्यवेक्षक की तरह इस स्थिति पर नजर बनाए हुए है। हमें न तो ट्रंप की बातों से अति-उत्साहित होने की जरूरत है और न ही चीन की चालों से घबराने की। आज का भारत अपनी शर्तों पर दुनिया से बात करता है और यही हमारी पहचान है।

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