राफेल बनाम J-10C: क्या सच में चीनी फाइटर जेट ने राफेल को दी मात? जानिए इस प्रोपेगेंडा का कड़वा सच

क्या आप इस बात पर भरोसा करेंगे कि जिस देश के फाइटर जेट्स के इंजन तक भरोसेमंद नहीं होते, वह दुनिया के सबसे आधुनिक लड़ाकू विमानों को धूल चटाने का दावा कर रहा है? वैश्विक रक्षा बाजार में चीन आज इसी तरह के सफ़ेद झूठ का जाल बुन रहा है। ड्रैगन एक ऐसा प्रोपेगेंडा फैला रहा है जिसे सुनकर रक्षा विशेषज्ञ भी हैरान हैं। चीन अपनी सरकारी मीडिया और पाकिस्तान के जरिए यह दावा कर रहा है कि उसके J-10C लड़ाकू विमान ने राफेल को 6-0 और यूरोफाइटर टायफून को 9-0 से हरा दिया है।

लेकिन क्या इन दावों में कोई सच्चाई है? क्या वाकई चीन का J-10C इतना शक्तिशाली है, या यह महज अपने ‘कबाड़’ को बेचने की एक नाकाम मार्केटिंग चाल है? आज हम इस चीनी प्रोपेगेंडा की गहराई से पड़ताल करेंगे और आपको बताएंगे कि कैसे भारतीय ब्रह्मोस मिसाइल के खौफ ने चीन और पाकिस्तान की रातों की नींद उड़ा रखी है।

झूठ का वैश्विक बाजार और चीन की छटपटाहट

वैश्विक रक्षा बाजार में चीन की स्थिति फिलहाल काफी नाजुक है। उसे अपने हथियारों के लिए नए खरीदार नहीं मिल रहे हैं। जब कोई उत्पाद नहीं बिकता, तो कंपनियां अक्सर भ्रामक विज्ञापनों का सहारा लेती हैं, और चीन भी यही कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने कई देशों को J-10C बेचने की कोशिश की, लेकिन उसे हर तरफ से असफलता ही मिली। इस विफलता को छिपाने के लिए चीन ने फर्जी मॉक ड्रिल्स और प्रोपेगेंडा का सहारा लेना शुरू कर दिया है।

यूरोफाइटर टायफून और 9-0 का फर्जी स्कोरकार्ड

चीन के सरकारी मीडिया सीसीटीवी (CCTV) ने हाल ही में दावा किया कि 2024 में एक मॉक हवाई युद्ध के दौरान J-10C के एक्सपोर्ट वर्जन ने यूरोफाइटर टायफून के खिलाफ सभी 9 मुकाबले जीत लिए। इस खबर के आते ही पाकिस्तानी मीडिया और सैन्य ब्लॉगर्स ने इसे ऐसे प्रचारित किया जैसे यह उनकी अपनी बड़ी उपलब्धि हो। ‘साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट’ जैसे अखबारों ने भी इस एजेंडे को हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

दिलचस्प बात यह है कि चीन ने इस अभ्यास की कोई विस्तृत जानकारी साझा नहीं की। हालांकि, पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा मशीनरी ने इसे जनवरी 2024 में कतर और पाकिस्तान के बीच हुए ‘जिलजाल-टू’ अभ्यास से जोड़ दिया। पाकिस्तान का दावा है कि उनके पायलटों ने J-10CE उड़ाते हुए कतरी वायुसेना के यूरोफाइटर्स को बुरी तरह पछाड़ दिया। उन्होंने थ्योरी दी कि बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइलों से चार बार और डॉगफाइट में पांच बार यूरोफाइटर को मार गिराया गया।

चीनी ब्लॉगर्स अब दावा कर रहे हैं कि उनके विमान यूरोपीय जेट्स से आगे निकल चुके हैं। हकीकत यह है कि ये दावे पुराने हैं और इन्हें बार-बार रिसाइकल करके पेश किया जाता है। चीन का मुख्य उद्देश्य उन छोटे देशों को लुभाना है जो कम बजट के कारण पश्चिमी या रूसी फाइटर जेट्स नहीं खरीद सकते और अपनी वायुसेना को अपग्रेड करना चाहते हैं।

राफेल का डर और 6-0 वाला चीनी एजेंडा

चीन और पाकिस्तान का सबसे बड़ा डर ‘राफेल’ है। जब से भारत ने राफेल को अपनी वायुसेना में शामिल किया है, तब से बीजिंग और इस्लामाबाद की चिंता बढ़ गई है। इसी डर को दबाने के लिए पाकिस्तान ने दावा किया था कि 2020 के एक टकराव में उनके J-10C ने राफेल सहित 6 भारतीय विमानों को मार गिराया था। यह एक ऐसा सफेद झूठ है जिस पर शायद ही कोई विश्वास करे।

असली तस्वीर यह है कि भारतीय वायुसेना के सिस्टम दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हैं। जिस टकराव की बात पाकिस्तान करता है, उसमें भारत ने अपने रडार और डिफेंस सिस्टम से ऐसी व्यूह रचना की थी कि दुश्मन के होश उड़ गए थे। भारत के पास S-400 जैसा उन्नत डिफेंस सिस्टम है जो सैकड़ों किलोमीटर दूर से ही दुश्मन के विमानों को नष्ट करने की क्षमता रखता है।

एक खुफिया रिपोर्ट के अनुसार, एक बार चीनी PL-15 मिसाइल राफेल के करीब जरूर आई थी, लेकिन राफेल अपने उत्कृष्ट इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट और चपलता के कारण पूरी तरह सुरक्षित रहा। यह घटना चीनी मिसाइल की रेंज और सटीकता की विफलता को दर्शाती है, जिसे वे अब अपनी कामयाबी के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।

ब्रह्मोस की सफलता ने उड़ाई चीन की नींद

चीन की सबसे बड़ी चिंता भारत का बढ़ता रक्षा निर्यात है। जहां चीन अपने J-10C के लिए पाकिस्तान के अलावा कोई दूसरा खरीदार नहीं ढूंढ पा रहा है, वहीं भारत की ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ने वैश्विक बाजार में धूम मचा रखी है। फिलीपींस को ब्रह्मोस की सफल डिलीवरी हो चुकी है और वे अगले ऑर्डर की योजना बना रहे हैं।

इतना ही नहीं, चीन के पड़ोसी देश इंडोनेशिया और वियतनाम के साथ भी भारत की ब्रह्मोस डील अंतिम चरण में है। दूसरी ओर, फ्रांस से इंडोनेशिया को राफेल की डिलीवरी भी शुरू हो गई है। यह स्थिति चीन के लिए किसी झटके से कम नहीं है।

पूरी दुनिया देख रही है कि चीन अपने उपकरणों को बेचने के लिए प्रोपेगेंडा का सहारा ले रहा है, जबकि भारत के पास ब्रह्मोस जैसी ‘प्रूवन’ तकनीक है। कोई भी देश अरबों डॉलर उस विमान पर खर्च नहीं करना चाहता जिसका युद्ध में कोई वास्तविक अनुभव न हो और जिसके दावे केवल सोशल मीडिया तक सीमित हों।

चीन की मार्केटिंग स्ट्रैटेजी और सरकारी मीडिया का सच

हाल ही में चीन की सरकारी मीडिया ने इंजीनियर झांग हेंग का इंटरव्यू प्रसारित किया, जिन्होंने स्वीकार किया कि चीन ने पाकिस्तान की तकनीकी मदद की है। यह बयान महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान हमेशा चीनी मदद से इनकार करता रहा है। यह अचानक किया गया कबूलनामा वास्तव में चीन की मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा है ताकि दुनिया को उनके विमान की क्षमता पर भरोसा हो सके।

‘चाइना डेली’ जैसे माध्यमों के जरिए J-10CE के नए अपग्रेड्स की खबरें जानबूझकर फैलाई जा रही हैं। इनका एकमात्र उद्देश्य छोटे देशों को यह विश्वास दिलाना है कि चीनी जेट पश्चिमी विमानों का एक बेहतर और सस्ता विकल्प हैं।

रक्षा बाजार में दावों से ज्यादा प्रदर्शन (Performance) मायने रखता है। राफेल और यूरोफाइटर टायफून ने युद्ध और विभिन्न मिशनों में अपनी श्रेष्ठता साबित की है। इनके मुकाबले J-10C की स्थिति अभी भी एक ‘कागज के शेर’ जैसी ही है। चीन और पाकिस्तान का यह गठजोड़ केवल फेक न्यूज फैलाने का जरिया बनकर रह गया है।

आज भारत एक उभरता हुआ रक्षा निर्माण केंद्र (Defense Manufacturing Hub) है। हमारी मिसाइलें और प्रणालियां दुनिया भर की पहली पसंद बन रही हैं। चीन का 6-0 और 9-0 का दावा केवल उसकी छटपटाहट और हताशा है, जो भारत की बढ़ती शक्ति और राफेल-ब्रह्मोस के घातक संयोजन को देखकर पैदा हुई है।

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