भारत-रूस और तालिबान का महा-गठबंधन! पाकिस्तान के खिलाफ मॉस्को में तैयार हुआ ‘चक्रव्यूह’

रूस की राजधानी मॉस्को के एक सुरक्षित और गोपनीय कमरे में हुई एक रणनीतिक बैठक ने पाकिस्तान के सैन्य मुख्यालय रावलपिंडी की नींद उड़ा दी है। बाहर बर्फबारी हो रही थी, लेकिन भीतर जो कूटनीतिक खिचड़ी पक रही थी, उसने पाकिस्तानी जनरलों के माथे पर पसीना ला दिया है। सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब अफगानिस्तान के रक्षा मंत्री मुल्ला याकूब मुजाहिद की मॉस्को यात्रा के दौरान भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी वहीं मौजूद थे। इस हाई-प्रोफाइल मुलाकात के बाद जब मुल्ला याकूब काबुल लौटे, तो उनके शब्दों में वह आत्मविश्वास था जिसने इस्लामाबाद के हुक्मरानों को डरा दिया है।

काबुल हवाई अड्डे पर उतरते ही तालिबान के रक्षा मंत्री ने पाकिस्तान को ऐसी चुनौती दी जिसने पड़ोसी देश के रणनीतिकारों को हिलाकर रख दिया है। इस बैठक के बाद हुए कूटनीतिक बदलावों ने पाकिस्तान में हड़कंप की स्थिति पैदा कर दी है। अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रक्षा विशेषज्ञों के बीच यह सवाल तैर रहा है कि क्या भारत ने अपने पुराने मित्र रूस के साथ मिलकर तालिबान की पीठ पर हाथ रख दिया है? अगर ऐसा है, तो यह पाकिस्तान के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं होगा।

तालिबान की मदद के लिए भारत और रूस ने मॉस्को में ऐसा कौन सा मास्टरस्ट्रोक चला है जिसे काबुल कभी नहीं भूलेगा? क्या मुल्ला याकूब की पाकिस्तान को दी गई चेतावनी के पीछे रूस का वह घातक ‘ब्रह्मास्त्र’ है जिससे दुनिया थर्राती है? क्या रूस अब तालिबान को अपने सबसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम जैसे S-400 या S-300 देने की तैयारी में है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत और तालिबान मिलकर पाकिस्तान को एक ऐसे सामरिक जाल में फंसा रहे हैं जहाँ से निकलना मुमकिन नहीं होगा?

इन तमाम कूटनीतिक चालों ने दक्षिण एशिया का पूरा नक्शा और समीकरण बदलने की शुरुआत कर दी है। मुल्ला याकूब के आक्रामक तेवर बताते हैं कि अफगानिस्तान अब रक्षात्मक रहने के मूड में नहीं है। मॉस्को में हुई गुप्त संधियों के बाद याकूब ने पाकिस्तान को सीधा संदेश दिया है कि अब अफगान सीमा में घुसकर बमबारी करने की जुर्रत पाकिस्तान को बहुत भारी पड़ेगी। यह अब तक की सबसे सीधी और खतरनाक चेतावनी है, जो रूस जैसी वैश्विक महाशक्ति के साथ हुए सामरिक समझौतों के दम पर दी गई है।

रूस और अफगानिस्तान के बीच हुए सैन्य-तकनीकी समझौते ने पाकिस्तानी जनरलों को बेचैन कर दिया है। हालाँकि, आधिकारिक तौर पर इसे केवल पुराने रूसी हेलीकॉप्टरों की मरम्मत का सौदा बताया जा रहा है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि मामला इससे कहीं अधिक गहरा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, मॉस्को में आधुनिक हथियारों की सप्लाई और हाई-लेवल मिलिट्री ट्रेनिंग पर चर्चा हुई है। यदि काबुल के आसमान की सुरक्षा रूसी एयर डिफेंस सिस्टम करने लगे, तो पाकिस्तान के फाइटर जेट्स का अफगान सीमा पार करना आत्मघाती साबित होगा।

S-400 या पैंटसिर जैसे सिस्टम अगर अफगानिस्तान को मिलते हैं, तो पाकिस्तान की हवाई ताकत का कोई मोल नहीं रह जाएगा। S-400 एक ऐसा अभेद्य रक्षा कवच है जो दुश्मन के विमान को पलक झपकते ही हवा में राख कर देता है। वहीं पैंटसिर सिस्टम ड्रोन्स और क्रूज मिसाइलों के लिए काल है। अगर ये हथियार तालिबान के हाथ लग गए, तो पाकिस्तान के F-16 और JF-17 विमान केवल अपनी सीमा के भीतर ही उड़ पाएंगे। यह पाकिस्तान के लिए न केवल सामरिक हार होगी, बल्कि एक बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका भी होगा।

अफगानिस्तान को इन मजबूत रक्षा प्रणालियों की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि पाकिस्तान ने पिछले कुछ महीनों में तालिबान के ठिकानों पर एयरस्ट्राइक की है। पाकिस्तान का आरोप है कि टीटीपी (TTP) के लड़ाके अफगान जमीन का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी तनातनी के बीच पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ की धमकियों ने काबुल को रूस के करीब धकेल दिया। अब मुल्ला याकूब ने स्पष्ट कर दिया है कि अफगानिस्तान किसी भी देश की धौंस को अब बर्दाश्त नहीं करेगा।

रूस का यह कदम मध्य एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने की एक सोची-समझी रणनीति है। लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे रोचक पहलू भारत की भूमिका है। मॉस्को के उसी अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मंच पर अजीत डोभाल की उपस्थिति महज एक संयोग नहीं थी। भारत चाहता है कि पाकिस्तान की आतंकवाद समर्थक नीतियों पर लगाम लगे और एक मजबूत अफगानिस्तान इस क्षेत्र में पाकिस्तान की दादागिरी को खत्म करने में मददगार साबित हो सकता है। यह भारत की लंबी दूरी की कूटनीति का हिस्सा है।

अगर अफगानिस्तान अपनी हवाई सुरक्षा में सक्षम हो जाता है, तो पाकिस्तान की रणनीतिक बढ़त शून्य हो जाएगी। मुल्ला याकूब ने अपने बयान में बहुत सधे हुए शब्दों में कहा कि उनका देश भविष्य में आधुनिक रक्षा प्रणालियाँ हासिल करने के लिए स्वतंत्र है। यह पाकिस्तान के लिए एक चेतावनी थी कि अब आसमान में एक ‘लोहे की दीवार’ खड़ी होने वाली है।

आर्थिक रूप से बदहाल पाकिस्तान के लिए एक भी लड़ाकू विमान खोना अपूरणीय क्षति होगी। आईएमएफ (IMF) के कर्ज पर निर्भर पाकिस्तान के पास इतना बजट नहीं है कि वह रूस और भारत समर्थित इस नए समीकरण का मुकाबला कर सके। इस गठबंधन ने न केवल पाकिस्तान को बल्कि उसके ‘सदाबहार’ दोस्त चीन को भी चिंता में डाल दिया है, क्योंकि रूस-भारत-अफगानिस्तान की यह धुरी बीजिंग की बेल्ट एंड रोड पहल को भी प्रभावित कर सकती है।

रूस से लौटने के बाद तालिबान का बदला हुआ रवैया इस बात का प्रमाण है कि वह अब ईंट का जवाब पत्थर से देने के लिए तैयार है। एक तरफ भारत की प्रचंड सैन्य शक्ति और दूसरी तरफ अभेद्य रूसी हथियारों से लैस अफगानिस्तान के बीच पाकिस्तान बुरी तरह फंस गया है। पाकिस्तान की ‘प्रॉक्सी वॉर’ की नीति अब खुद उसी के लिए गले की फांस बनती जा रही है। मॉस्को की डील ने पाकिस्तान के क्षेत्रीय प्रभाव को जड़ से खत्म करने की नींव रख दी है।

इस कूटनीतिक हलचल की गूँज आने वाले वर्षों तक दक्षिण एशिया में सुनाई देगी। पाकिस्तान जो कल तक हमलावर था, आज अपनी ही सुरक्षा को लेकर मंथन कर रहा है। भारत की ‘साइलेंट डिप्लोमेसी’ ने पाकिस्तान के रक्षा तंत्र को बिना युद्ध किए ही बैकफुट पर धकेल दिया है। रावलपिंडी के जनरल अब इस बात से डरे हुए हैं कि मॉस्को के उस बंद कमरे में और क्या गुप्त फैसले हुए हैं। यह अफगानिस्तान का नया अवतार है, जो पाकिस्तान को बहुत महंगा पड़ने वाला है।

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