मिडिल ईस्ट एक बार फिर बारूद के खतरनाक ढेर पर बैठा है। इस बार चिंगारी किसी छोटे गुट से नहीं, बल्कि सीधे वाइट हाउस से सुलग रही है। ओवल ऑफिस के बंद दरवाजों के पीछे चल रही हलचल ने पूरी दुनिया की सांसें रोक दी हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का धैर्य अब जवाब दे चुका है और कूटनीति के रास्ते बंद होते दिख रहे हैं। अमेरिका एक ऐसे भीषण मिलिट्री एक्शन की ओर बढ़ रहा है, जिसका असर वैश्विक होगा। लेकिन इसी बीच एक चौंकाने वाला सच सामने आया है—क्या दुनिया की सबसे शक्तिशाली खुफिया एजेंसी CIA ने अपने ही राष्ट्रपति को अंधेरे में रखा? क्या CIA और मोसाद ईरान की जमीनी हकीकत समझने में नाकाम रहे? ये सवाल आज वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं।
शुक्रवार को वाइट हाउस में एक अत्यंत गोपनीय और उच्च स्तरीय बैठक हुई, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप के साथ CIA डायरेक्टर, रक्षा सचिव और उपराष्ट्रपति शामिल थे। बैठक का एकमात्र एजेंडा ईरान के खिलाफ ‘आर-पार की जंग’ था। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन अब ईरान की कूटनीतिक देरी से थक चुका है। बातचीत के रास्ते बंद होने के बाद अब एक निर्णायक सैन्य अभियान (Final Military Operation) का ब्लूप्रिंट तैयार किया जा रहा है।
इस संकट को टालने के लिए कतर और पाकिस्तान ने बैकडोर से काफी कोशिशें कीं ताकि स्थिति को बिगड़ने से रोका जा सके, लेकिन ये कूटनीतिक प्रयास विफल रहे हैं। अब फैसला बातचीत की मेज पर नहीं, बल्कि फाइटर जेट्स और मिसाइलों के जरिए होने वाला है। लेकिन कहानी का ट्विस्ट यह है कि अमेरिका का हमला खुफिया रिपोर्टों पर आधारित होता है, और ईरान के मामले में CIA और मोसाद की रिपोर्टिंग पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।
यरुशलम पोस्ट और अन्य विश्लेषकों के अनुसार, CIA ने ट्रंप प्रशासन को ईरान की असली ताकत के बारे में सही जानकारी नहीं दी। अमेरिका आज भी ईरान के औपचारिक पदों—जैसे राष्ट्रपति और विदेश मंत्री—से निपटने की कोशिश कर रहा है, जबकि हकीकत में ईरान की सत्ता का पूरा कंट्रोल अब IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) के हाथों में जा चुका है। यह एक बहुत बड़ी रणनीतिक चूक साबित हो सकती है।
इतिहास गवाह है कि CIA पहले भी ईरान को समझने में विफल रही है। 1979 की इस्लामिक क्रांति के समय भी CIA को अयातुल्ला खोमैनी के प्रभाव का अंदाजा नहीं था। वे कभी समझ ही नहीं पाए कि शिया धर्मगुरुओं का वैचारिक तंत्र तेहरान में किस तरह की धार्मिक सत्ता स्थापित कर देगा। CIA उस वक्त भी यह भांपने में नाकाम रही थी कि अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी, शाह मोहम्मद रजा पहलवी, रातों-रात सत्ता से बाहर कर दिया जाएगा।
विफलताओं का यह सिलसिला 1983 के बेरूत धमाकों तक जारी रहा, जहाँ CIA इस्लामी आतंकवाद के उभरते नेटवर्क को डिकोड नहीं कर सकी। आज 2026 में इतिहास खुद को दोहरा रहा है। ट्रंप एक नया मिडिल ईस्ट चाहते हैं, लेकिन उनका मुकाबला अब एक अधिक संगठित और खतरनाक ईरान से है, जिसका सही असेसमेंट करने में खुफिया एजेंसियां फिर से चूक गई हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अली खामेनेई की हत्या की खबरों के बाद भी ईरान का सिस्टम क्यों नहीं गिरा? अमेरिका और इजरायल को गृहयुद्ध की उम्मीद थी, लेकिन IRGC ने पर्दे के पीछे से निकलकर पूरे देश को अपने लोहे के शिकंजे में ले लिया। IRGC सिर्फ एक सेना नहीं, बल्कि एक ‘डीप स्टेट’ है, जिसका ईरान की अर्थव्यवस्था और तेल संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण है।
CIA अब धर्मसंकट में है। ईरान की औपचारिक सरकार अब सिर्फ दिखावा रह गई है, असली फैसले IRGC के कमांडर कर रहे हैं। IRGC वह ताकत है जो समझौते के बजाय सीधे टकराव में यकीन रखती है। उनका माइंडसेट अमेरिका के सामने झुकने का नहीं है, और यही बात इस पूरे संकट को और अधिक विस्फोटक बना रही है।
ट्रंप को अब एहसास हो रहा है कि वे गलत दरवाजों पर दस्तक दे रहे थे। जब दुश्मन कूटनीति नहीं समझता, तो सैन्य कार्रवाई ही एकमात्र विकल्प बचती है। वाइट हाउस में अब सीधे हमले की तैयारी है क्योंकि ट्रंप प्रशासन को अब समझ आ गया है कि ईरान में ‘रेजीम चेंज’ कोई आसान खेल नहीं है।
मिडिल ईस्ट का यह भू-राजनीतिक खेल अब ‘पॉइंट ऑफ नो रिटर्न’ पर है। यदि अमेरिका सैन्य कार्रवाई करता है, तो इसका जवाब इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में फैले IRGC के प्रॉक्सी ग्रुप्स के जरिए आएगा। क्या अमेरिकी सेना एक साथ कई मोर्चों पर जंग के लिए तैयार है? क्या CIA इस बार सही आकलन कर रही है, या फिर से राष्ट्रपति को धोखे में रखा जा रहा है?
आने वाले कुछ दिनों में स्थिति साफ हो जाएगी। ईरान अपनी जिद पर अड़ा है और अमेरिका अपनी सुपरपावर की छवि बचाने के लिए आक्रामक है। कतर और पाकिस्तान जैसे मध्यस्थ अब पीछे हट चुके हैं। ट्रंप का कड़ा रुख और IRGC की कट्टरता मिडिल ईस्ट के नक्शे को हमेशा के लिए बदल सकती है। CIA की यह नाकामी अमेरिका को कितनी महंगी पड़ेगी, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इतना तय है कि दुनिया के लिए आने वाले दिन अत्यंत चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं।

