भारत की अर्थव्यवस्था की तकदीर बदलने वाला एक महा-ऑपरेशन शुरू हो चुका है, जिसने वैश्विक सर्राफा बाजार और शक्तिशाली देशों को हैरान कर दिया है। जिस जमीन को दशकों से बंजर समझा जाता था, आज उसी की गहराई में एक ऐसा खजाना मिला है जो देश की तिजोरी भरने की ताकत रखता है। हम बात कर रहे हैं आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले की, जहाँ एक नया ‘गोल्ड एम्पायर’ खड़ा हो रहा है। 20 सालों का लंबा इंतजार अब खत्म हो गया है। भारी मशीनें और आधुनिक तकनीक अब उस जमीन से पीला सोना निकालने के लिए तैयार हैं। जोन्नागिरी में मिले 10 मिलियन टन सोने के इस भंडार ने यह उम्मीद जगा दी है कि अब भारत को सोने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
इस खजाने की कहानी किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। जोन्नागिरी के ग्रामीण मॉनसून की पहली बारिश के बाद खेतों में हीरे तलाशते थे। कई बार लोगों के हाथ छोटे हीरे लगे भी, जिसने भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) का ध्यान खींचा। शुरुआत में वैज्ञानिकों को लगा कि यहाँ हीरों का भंडार है, लेकिन कुदरत ने भारत के लिए कुछ और ही सोच रखा था। हीरों की इसी खोज ने अनजाने में भारत के सबसे बड़े स्वर्ण भंडार का रास्ता खोल दिया।
जब वैज्ञानिकों ने अत्याधुनिक सेंसर और रडार सिस्टम के साथ जोन्नागिरी की मिट्टी का डीप स्कैन किया, तो उनके कंप्यूटर स्क्रीन्स पर चौकाने वाली फ्रीक्वेंसी दिखने लगी। ड्रिलिंग मशीनों ने जब गहराई नापी, तो पता चला कि मशीनें हीरे नहीं, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाले सोने की वेवलेंथ पकड़ रही थीं। यह भारत के खनन इतिहास का एक ऐतिहासिक पल था।
यह सफलता रातों-रात नहीं मिली। पूरे 30 सालों तक वैज्ञानिकों ने जोन्नागिरी, एरागुडी और पगिरिडायी जैसे गांवों में छानबीन की। लेजर और हैवी ड्रिलिंग मशीनों के जरिए जमीन के सैकड़ों फीट नीचे से चट्टानों के नमूने (कोर सैंपल्स) लिए गए, जिनकी लैब जांच ने विशेषज्ञों को हैरान कर दिया।
केमिकल प्रोसेस के बाद पता चला कि इन चट्टानों के भीतर सोने की बारीक नसें दौड़ रही हैं, जिसे माइनिंग की भाषा में ‘गोल्ड ओर’ (स्वर्ण अयस्क) कहा जाता है। इसे रिफाइन करके 24 कैरेट सोना प्राप्त किया जाता है। GSI की रिपोर्ट के मुताबिक, यहाँ लगभग 1 करोड़ टन (10 मिलियन टन) सोने का कच्चा अयस्क मौजूद है। अकेले ईस्ट ब्लॉक में ही 68 लाख टन भंडार है, जिसे प्रोसेस करने में कई साल लगेंगे।
इस बेशकीमती खजाने को बाहर निकालने के लिए विश्व-स्तरीय इंजीनियरिंग की आवश्यकता थी। साल 2006 में ‘जियोमायसोर सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ ने इस प्रोजेक्ट की कमान संभाली और 1477 एकड़ जमीन पर खनन अधिकार प्राप्त किए। करोड़ों रुपये खर्च कर सैंपल्स की दोबारा जांच की गई, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी उच्च वैल्यू की पुष्टि हुई।
हालांकि, इसके बाद यह प्रोजेक्ट सरकारी मंजूरियों और लालफीताशाही में फंस गया। पर्यावरण एनओसी और भूमि अधिग्रहण जैसे मुद्दों ने सालों तक मशीनों के पहियों को रोके रखा। जो सोना देश की अर्थव्यवस्था का हिस्सा होना चाहिए था, वह फाइलों के नीचे दबा रहा। लेकिन साल 2026 की नई प्रशासनिक गति ने इस पूरी स्थिति को बदल दिया है।
आंध्र प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के साथ ही मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने इस प्रोजेक्ट के राष्ट्रीय महत्व को समझा। उन्होंने पेंडिंग फाइलों को ‘फास्ट-ट्रैक’ मोड पर क्लियर करने के निर्देश दिए। सरकार की इस सक्रियता को देखकर निजी कंपनी ने भी तुरंत जमीन पर 320 करोड़ रुपये का भारी निवेश किया।
इस निवेश से जोन्नागिरी में एक हाई-टेक गोल्ड प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित किया गया है। जर्मनी और जापान की मशीनों से लैस यह प्लांट पूरी तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर आधारित है। बुधवार को इसके औपचारिक उद्घाटन के साथ ही भारत की धरती से एक बार फिर सोने की नदियां बहने का रास्ता साफ हो जाएगा।
खनन के गणित को समझें तो शुरुआती चरण में हर दिन 1 किलो शुद्ध सोना निकाला जाएगा। वर्तमान बाजार भाव के अनुसार 1 किलो 24 कैरेट सोने की कीमत लगभग 75 लाख रुपये है। यानी हर दिन देश के खजाने में 75 लाख रुपये की नई वेल्थ जुड़ेगी। भारत जैसी बढ़ती इकोनॉमी के लिए यह एक शानदार शुरुआत है।
कंपनी का मास्टर प्लान सालाना 4 लाख टन कच्चे अयस्क को प्रोसेस करने का है। उत्पादन के इस लक्ष्य को बढ़ाकर जल्द ही 600 किलो सालाना और अंततः 1500 किलो शुद्ध सोना प्रति वर्ष करने की योजना है। इसके लिए प्लांट में 24 घंटे शिफ्टों में काम चलेगा।
इस 1500 किलो सोने को निकालने के लिए जमीन के नीचे 1200 एकड़ में सुरंगों का जाल बिछाया जा रहा है। सोने की ये नसें जमीन के अंदर 2 किलोमीटर की गहराई तक फैली हुई हैं। यह गहराई बुर्ज खलीफा की ऊंचाई से भी कहीं ज्यादा है। इतनी गहराई पर अत्यधिक तापमान और कठिन परिस्थितियों में काम करने के लिए आधुनिक वेंटिलेशन और रोबोटिक मशीनों का सहारा लिया जा रहा है।
इस परियोजना का सबसे बड़ा लाभ भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को होगा। भारत दुनिया में सोने का सबसे बड़ा उपभोक्ता है और हम अपनी जरूरत का 90% सोना आयात करते हैं। शादियों और निवेश के लिए सोने की भारी मांग के कारण हर साल अरबों डॉलर देश से बाहर जाते हैं।
जब हम बाहर से सोना खरीदते हैं, तो रुपया कमजोर होता है। जोन्नागिरी प्रोजेक्ट इस आर्थिक निर्भरता को कम करेगा। स्वदेशी सोने के उत्पादन से जो पैसा बचेगा, उसका इस्तेमाल देश के बुनियादी ढांचे, रेलवे और रक्षा क्षेत्र को मजबूत करने में होगा। यह भारत के व्यापार घाटे (Trade Deficit) को कम करने का एक प्रभावी हथियार है।
रोमांच अभी बाकी है, क्योंकि जोन्नागिरी तो सिर्फ शुरुआत है। GSI ने आंध्र प्रदेश के दो और जिलों—अनंतपुर (रामगिरी क्षेत्र) और चित्तूर में भी सोने के बड़े भंडार होने के संकेत दिए हैं। सैटेलाइट मैपिंग और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल्स ने यहाँ भी अकूत स्वर्ण भंडार की पुष्टि की है।
सरकार का लक्ष्य आंध्र प्रदेश को एक विशाल ‘गोल्ड कॉरिडोर’ में बदलना है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के टेंडर जारी किए जा रहे हैं। विजन साफ है—एक तरफ से कच्चे पत्थर मशीनों में जाएं और दूसरी तरफ से 99.99% शुद्ध सोने के बिस्कुट बाहर निकलें।
भारत में स्वर्ण खदान का जिक्र आते ही ‘कोलार गोल्ड फील्ड्स’ (KGF) की याद आती है। केजीएफ के बंद होने के बाद भारत का घरेलू उत्पादन लगभग रुक गया था। लेकिन अब आंध्र प्रदेश कर्नाटक की उस ऐतिहासिक विरासत को आगे ले जाने के लिए तैयार है। कुरनूल और अनंतपुर के ये प्रोजेक्ट्स भारत को फिर से ‘सोने की चिड़िया’ बनाने की दिशा में बड़े कदम हैं।
इतने बड़े पैमाने पर निकल रहे सोने की सुरक्षा भी उतनी ही कड़ी होगी। इसके लिए एक अभेद्य सुरक्षा ग्रिड तैयार किया गया है। खदान से लेकर रिफाइनरी और फिर तिजोरियों तक सोने को पहुंचाने के लिए विशेष प्रोटोकॉल का पालन किया जाएगा।
सुरक्षा घेरे में बख्तरबंद ट्रक, बायोमेट्रिक स्कैनर्स, रियल-टाइम जीपीएस और आधुनिक हथियारों से लैस कमांडो तैनात रहेंगे। एआई-संचालित ड्रोन के जरिए पूरे क्षेत्र की थर्मल निगरानी होगी और ब्लॉकचेन तकनीक के माध्यम से सोने के हर कण का डिजिटल हिसाब रखा जाएगा ताकि किसी भी प्रकार की हेराफेरी संभव न हो।
जोन्नागिरी की सफलता भारत के लिए एक बड़ा सबक है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में भी ऐसे कई खनिज भंडार दबे हैं। यदि उन पर भी इसी आधुनिक तकनीक और राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ काम हो, तो भारत को तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता। जोन्नागिरी की गूंज आत्मनिर्भर भारत के नए स्वर्ण युग का शंखनाद है।

