आज जो बड़ी खबर सामने आई है, वह सीधे तौर पर हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के हुक्मरानों की रातों की नींद उड़ाने वाली है। पुरानी कहावत है कि जैसा बोओगे, वैसा काटोगे। आज की आधुनिक भू-राजनीति (Geopolitics) में इसका एक नया स्वरूप देखने को मिल रहा है—यदि आप अपने घर में आतंकवाद की फैक्ट्री खोलेंगे, तो आपके हिस्से का पानी सूखना निश्चित है। बात हो रही है सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) की, जिसके सहारे पाकिस्तान की 24 करोड़ आबादी अपनी प्यास बुझाती है। लेकिन अब भारत ने हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में ऐसा कूटनीतिक प्रहार किया है, जिससे इस्लामाबाद से रावलपिंडी तक पाकिस्तानी इस्टैब्लिशमेंट में खलबली मच गई है। भारत ने बिना गोली चलाए पाकिस्तान का आर्थिक और रणनीतिक घेराव करने का पूरा कानूनी खाका तैयार कर लिया है।
इस वैश्विक घटनाक्रम में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब पाकिस्तान के एक पुराने ‘साथी’ ने ही उसकी दुखती रग पर वार किया। अफगानिस्तान की जनता ने रावलपिंडी के जनरलों को 1971 के उन ऐतिहासिक पलों की याद दिला दी है, जब 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों का घमंड भारतीय सेना के सामने चूर-चूर हो गया था। आखिर अफगानियों ने ऐसा क्या किया जिससे पाकिस्तान तिलमिला उठा है? पीओके में पाकिस्तानी सेना के खिलाफ विद्रोह क्यों भड़का है? और सिंधु जल समझौते पर भारत का नया ‘मास्टरस्ट्रोक’ क्या है? आज हम पाकिस्तान के उस झूठे प्रोपेगेंडा की कलई खोलेंगे जो वह कश्मीर और जल विवाद के नाम पर फैलाता आया है।
इतिहास और वर्तमान के इस द्वंद्व को समझना जरूरी है। पाकिस्तान को लंबे समय से यह भ्रम था कि वह भारत के खिलाफ छद्म युद्ध (Proxy War) जारी रखेगा, घुसपैठ कराएगा और निर्दोषों को निशाना बनाएगा, जबकि भारत उदारता दिखाते हुए उसे सिंधु, झेलम और चिनाब का पानी पिलाता रहेगा। लेकिन इस्लामाबाद यह भूल गया कि यह 1960 का दौर नहीं, बल्कि आज का नया और कड़े फैसले लेने वाला भारत है। हाल ही में पाकिस्तान ने चालाकी करते हुए सिंधु जल समझौते को लेकर हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में एकतरफा केस दायर किया। उसे उम्मीद थी कि वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘विक्टिम कार्ड’ खेलकर भारत को बैकफुट पर ले आएगा।
हालांकि, भारत का जवाब मिलते ही पाकिस्तान के होश उड़ गए। नई दिल्ली ने दो टूक कह दिया कि हम इस अदालत की एकतरफा कार्यवाही को पूरी तरह खारिज करते हैं। भारत ने स्पष्ट किया कि इंडस वाटर ट्रीटी के तहत मिले अपने अधिकारों का हम शत-प्रतिशत उपयोग करेंगे। हम अपने बांध और हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स पूरे करेंगे, और पाकिस्तान की कोई भी धमकी हमारे विकास कार्यों को नहीं रोक पाएगी।
भारत के इस सख्त रुख के बाद पाकिस्तान में हाहाकार मचा हुआ है। वहां भीषण गर्मी के साथ-साथ पानी का संकट गहराने लगा है। आर्थिक रूप से बदहाल पाकिस्तान, जो पहले ही आटे के लिए ट्रकों के पीछे दौड़ रहा था, अब पानी की बूंद-बूंद के लिए मोहताज है। इस्लामाबाद अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में मिन्नतें कर रहा है कि यदि यह संधि टूटी तो वैश्विक संकट आ जाएगा। आईएमएफ के पैकेजों पर टिकी अर्थव्यवस्था वाला देश आज दुनिया को बचाने की दुहाई दे रहा है, जो बेहद हास्यास्पद है।
कहानी में नया मोड़ तब आया जब अफगानिस्तान से भारत के समर्थन में आवाजें उठीं। वही अफगानिस्तान, जिसे पाकिस्तान अपनी ‘रणनीतिक गहराई’ (Strategic Depth) समझता था, आज उसे आईना दिखा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर अफगान नागरिक खुलेआम लिख रहे हैं कि भारत को सिंधु का पानी रोक देना चाहिए। वे पाकिस्तान को याद दिला रहे हैं कि ‘टीम 93 हजार’ को अब रोने दिया जाए, क्योंकि आतंकवाद और जल प्रवाह एक साथ नहीं चल सकते।
‘आतंकवाद और पानी एक साथ नहीं बह सकते’—यह पंक्ति अपने आप में एक गहरा संदेश है। भारत का वैश्विक सिद्धांत ‘टेरर एंड टॉक्स’ अब अफगानिस्तान के अवाम के जरिए ‘टेरर एंड वाटर’ के नैरेटिव में बदल गया है। अफगानियों की पाकिस्तान से नफरत का कारण स्पष्ट है; पाकिस्तान ने ही उनके देश में अस्थिरता फैलाई। अब जब पाकिस्तान खुद संकट में है, तो उसे अपनी करनी का फल मिल रहा है।
इतना ही नहीं, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) से आ रहे विजुअल्स पाकिस्तानी सेना की साख को धूल में मिला रहे हैं। वहां की जनता अब जाग चुकी है और फौज के खिलाफ सड़कों पर है। स्थानीय लोगों के इस गुस्से और बगावत को देखकर सोशल मीडिया पर कहा जा रहा है कि पाकिस्तान के लिए 1971 का ऐतिहासिक सरेंडर अब एक स्थायी पहचान बन चुका है।
1971 का 93,000 का आंकड़ा पाकिस्तान के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है। 16 दिसंबर 1971 को ढाका के रेस कोर्स मैदान में सैन्य इतिहास का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण हुआ था। गजवा-ए-हिंद के खोखले सपने देखने वाली पाकिस्तानी सेना के हजारों सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने घुटने टेके थे। लेफ्टिनेंट जनरल ए.ए.के. नियाजी ने लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने हार के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे। आज उसी अपमान को अफगानी नागरिक दोहराकर पाकिस्तान का मजाक उड़ा रहे हैं।
सिंधु जल संधि के तकनीकी पहलुओं की बात करें तो 1960 में हुई इस संधि के तहत रावी, व्यास और सतलुज का पानी भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब पाकिस्तान को। लेकिन इस संधि में स्पष्ट प्रावधान है कि भारत पश्चिमी नदियों पर बिजली बनाने के लिए ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ प्रोजेक्ट्स का उपयोग कर सकता है। दशकों तक भारत ने जिम्मेदारी निभाई, लेकिन पाकिस्तान ने बदले में कारगिल, मुंबई हमले और पुलवामा जैसा दर्द दिया।
उरी हमले के बाद भारत ने स्पष्ट कर दिया था कि ‘खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते’ (Blood and water cannot flow together)। अब भारत संधि में संशोधन के लिए पाकिस्तान को नोटिस दे चुका है। भारत का स्टैंड साफ है—जिस संधि को पाकिस्तान आतंकवाद की ढाल बनाता है, अब उसे बदलना ही होगा।
पाकिस्तान भली-भांति जानता है कि जम्मू-कश्मीर में भारत के पनबिजली प्रोजेक्ट्स तेजी से पूरे हो रहे हैं। यदि भारत ने पश्चिमी नदियों के पानी का अधिकतम उपयोग शुरू कर दिया, तो पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत रेगिस्तान में बदल जाएंगे। परमाणु बम की धमकी देने वाला देश यह भूल गया है कि एटम बम से प्यास नहीं बुझती।
आज पाकिस्तान दुनिया के सामने गिड़गिड़ा रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी जानता है कि भारत अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में काम कर रहा है। वह समय बीत गया जब बाहरी दबाव में भारत झुक जाता था। आज का भारत अपनी शर्तों पर फैसले लेता है और दुनिया को नई दिशा दिखाता है।
निष्कर्ष यह है कि पाकिस्तान अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर में है। पश्चिम में अफगानिस्तान और पूर्व में शक्तिशाली भारत के बीच वह घिर चुका है। आंतरिक विद्रोह और बाहरी कूटनीति ने उसे लाचार बना दिया है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि कश्मीर और उसका पानी हमारी प्राथमिकता है। यदि कोई देश आतंकवाद को पालेगा, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
यदि आपको लगता है कि भारत की यह ‘नो नॉनसेंस पॉलिसी’ सही है, तो कमेंट बॉक्स में ‘जय हिंद’ जरूर लिखें। इस जानकारी को अधिक से अधिक साझा करें और देशहित के मुद्दों से जुड़े रहने के लिए चैनल को सब्सक्राइब करें। जय हिंद, वंदे मातरम।

