मध्य पूर्व संकट के बीच भारत की बड़ी आर्थिक जीत: मूडीज ने भी माना भारतीय अर्थव्यवस्था का लोहा!

आज पूरी दुनिया में अनिश्चितता और तनाव का माहौल व्याप्त है। मिडिल ईस्ट यानी मध्य पूर्व में जारी संघर्ष किसी से छिपा नहीं है। वहां तेजी से बदलते घटनाक्रमों ने वैश्विक शेयर बाजारों, निवेशकों और अर्थशास्त्रियों की चिंता बढ़ा दी है। आसमान से बरसती मिसाइलों और युद्ध की आहट के बीच सबसे बड़ा डर ‘क्रूड ऑयल’ यानी कच्चे तेल की कीमतों को लेकर है। ऐतिहासिक रूप से, जब भी मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ता है, वैश्विक अर्थव्यवस्था डगमगाने लगती है और विकसित देशों तक की सांसें फूलने लगती हैं। लेकिन, इस वैश्विक तूफान और आर्थिक संकट के बीच भारत एक चट्टान की तरह मजबूती से खड़ा है। यह केवल हमारा विश्वास नहीं है, बल्कि दुनिया की प्रतिष्ठित रेटिंग एजेंसी ‘मूडीज’ ने भी भारत की इस अडिग आर्थिक शक्ति को स्वीकार किया है।

मूडीज रेटिंग्स की हालिया रिपोर्ट उन आलोचकों के लिए करारा जवाब है जो भारतीय अर्थव्यवस्था पर सवाल उठाते रहे हैं। मूडीज ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत की इन्वेस्टमेंट-ग्रेड सॉवरेन रेटिंग पर कोई खतरा नहीं है। ऐसे समय में जब दुनिया के बड़े देश महंगाई और भारी कर्ज के दबाव में हैं, मूडीज का यह भरोसा भारत की सुदृढ़ आर्थिक नीतियों और कुशल नेतृत्व का जीवंत प्रमाण है।

समझते हैं कि मिडिल ईस्ट के तनाव से भारत को क्या खतरा था और भारत ने इसे कैसे संभाला। दरअसल, भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ता है, जिससे परिवहन लागत और फिर महंगाई बढ़ती है। इससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ता है और राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़ने का डर रहता है। लेकिन भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को इस तरह लचीला बनाया है कि वह इन झटकों को सहने में सक्षम है।

राजकोषीय घाटे को सरल शब्दों में समझें तो यह सरकार की कुल कमाई और उसके खर्च के बीच का अंतर है। जब खर्च कमाई से ज्यादा हो, तो सरकार को कर्ज लेना पड़ता है, जिसे राजकोषीय घाटा कहते हैं।

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण ब्लूमबर्ग जैसी एजेंसियों ने भारत का घाटा बढ़ने की आशंका जताई थी। हालांकि, मूडीज के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट क्रिश्चियन डी गुजमैन ने स्पष्ट किया है कि भारत इस झटके के लिए पूरी तरह तैयार है। उनके अनुसार, तेल की कीमतों का दबाव अस्थायी है और भारत की विशाल अर्थव्यवस्था इस अतिरिक्त घाटे को आसानी से समाहित कर सकती है। मूडीज ने भारत की ‘Baa3’ रेटिंग और ‘स्थिर’ आउटलुक को बरकरार रखा है, जो यह दर्शाता है कि भारत में निवेश पूरी तरह सुरक्षित है।

भारत सरकार ने मार्च 2027 तक राजकोषीय घाटे को 4.3 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा है। गौर करने वाली बात यह है कि महामारी के दौरान 2020-21 में यह 9.2 प्रतिशत तक पहुंच गया था। वहां से इसे नीचे लाना भारतीय अर्थव्यवस्था की तीव्र रिकवरी को दर्शाता है।

अच्छी खबर यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई हैं। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति के सदस्य नागेश कुमार का कहना है कि यदि तेल की कीमतें इसी स्तर पर रहीं, तो भारत की विकास दर 7 प्रतिशत के पार जा सकती है। आज के वैश्विक माहौल में 7% की ग्रोथ रेट भारत को दुनिया का ‘ग्रोथ इंजन’ बनाती है।

हालांकि, एक जिम्मेदार विश्लेषण के लिए चुनौतियों को जानना भी जरूरी है। मूडीज ने भारत के ‘कर्ज के ब्याज भुगतान’ को एक बड़ी चुनौती बताया है।

आंकड़ों के अनुसार, भारत अपने कुल राजस्व का लगभग 23 प्रतिशत हिस्सा पुराने कर्जों का ब्याज चुकाने में खर्च करता है। इटली, मेक्सिको या ग्रीस जैसे देशों में यह औसत 10 प्रतिशत से भी कम है। इसका मतलब है कि विकास कार्यों पर खर्च होने वाला पैसा ब्याज में जा रहा है, जिसे मूडीज ने भारत की सबसे बड़ी ‘क्रेडिट चुनौती’ माना है।

इसके बावजूद, मूडीज ने 2027 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान 6% बनाए रखा है, भले ही तेल की कीमतें 95 डॉलर तक क्यों न पहुंच जाएं। इससे सिद्ध होता है कि भारत का आर्थिक तंत्र अब ‘शॉक-प्रूफ’ बन चुका है।

निष्कर्ष स्पष्ट है: भारत आज वैश्विक अर्थव्यवस्था का वह मजबूत स्तंभ है जिसे कोई भी आंधी हिला नहीं सकती। कर्ज का बोझ एक चुनौती जरूर है, लेकिन राजकोषीय सुधारों के साथ नया भारत अपनी शर्तों पर सुनहरे भविष्य की इबारत लिख रहा है।

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