पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीति में एक ऐसा प्रचंड सियासी तूफान आया है, जिसने कोलकाता के ‘नबन्ना’ से लेकर दिल्ली के लुटियंस तक खलबली पैदा कर दी है। जिस ‘खेला होबे’ के नारे के दम पर ममता बनर्जी ने अपनी सत्ता का किला तैयार किया था, आज उसी किले में बड़ी सेंध लगती दिख रही है। बंगाल की सियासत का पूरा घटनाक्रम अब एक नई दिशा की ओर मुड़ चुका है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर असंतोष की ऐसी ज्वाला भड़की है, जिसकी उम्मीद पार्टी आलाकमान को भी नहीं थी। पार्टी के अंदर हो रहे ये धमाके इस बात का साफ संकेत हैं कि बंगाल में एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत हो रही है और वर्तमान सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं।
सांसदों का विद्रोह और दिल्ली में मची हलचल
अब बात करते हैं उस सबसे बड़ी खबर की, जिसने बंगाल के राजनीतिक गणित को हिला कर रख दिया है। विधानसभा के बाद अब ममता बनर्जी को सबसे बड़ा झटका दिल्ली से लगने जा रहा है। उच्च स्तरीय सूत्रों के हवाले से यह खबर आ रही है कि टीएमसी के कम से कम 20 सांसद इस समय भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के संपर्क में हैं। यह मात्र एक अफवाह नहीं है, बल्कि इसके पीछे पुख्ता जमीनी आधार बताया जा रहा है। ये वे सांसद हैं जो पार्टी की मौजूदा स्थिति से असंतुष्ट हैं और अपना भविष्य अब दूसरी तरफ देख रहे हैं।
संसदीय आंकड़ों पर नजर डालें तो संसद के दोनों सदनों में टीएमसी के कुल 41 सांसद हैं, जिनमें लोकसभा से 28 और राज्यसभा से 13 शामिल हैं। यदि इनमें से 20 सांसद बगावत का रुख अपनाते हैं, तो टीएमसी का संसदीय दल दो हिस्सों में बंट जाएगा। आज टीएमसी दिल्ली में विपक्षी खेमे का एक प्रमुख हिस्सा है। अगर ये सांसद पाला बदलते हैं, तो न केवल टीएमसी का प्रभाव कम होगा बल्कि दिल्ली के राजनीतिक समीकरण भी बदल जाएंगे। यह बगावत दर्शाती है कि नेतृत्व पर अब पार्टी के अपनों का ही भरोसा कम होने लगा है।
विधानसभा में ‘असली टीएमसी’ को लेकर छिड़ा घमासान
दिल्ली की हलचल के साथ-साथ बंगाल विधानसभा के भीतर भी असली ‘खेला’ शुरू हो चुका है। तृणमूल कांग्रेस का विधायक दल आधिकारिक रूप से दो धड़ों में विभाजित होता दिख रहा है। विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 60 बागी विधायकों के गुट ने खुद को ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ होने का दावा किया है। इन विधायकों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अब पार्टी नेतृत्व के फैसलों के साथ नहीं हैं।
हैरान करने वाली बात यह है कि इस बागी गुट ने संवैधानिक प्रक्रिया अपनाते हुए ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना और उन्हें विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता मिलने की बात भी सामने आई है। विधानसभा अध्यक्ष द्वारा इस स्थिति को संवैधानिक मंजूरी मिलना सरकार के लिए एक बड़ा कानूनी और राजनीतिक झटका है। एक समय जिस पार्टी में अनुशासन सर्वोपरि था, आज वहां खुलेआम विद्रोह की स्थिति बनी हुई है और आलाकमान डैमेज कंट्रोल में जुटा है।
भ्रष्टाचार और आरजी कर कांड: जनता के गुस्से का विस्फोट
इस बड़े विद्रोह के पीछे कई गहरे कारण छिपे हैं। बंगाल की जनता और पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता काफी समय से सरकार की कार्यप्रणाली से नाराज चल रहे थे। भ्रष्टाचार के कई बड़े मामलों ने पहले ही पार्टी की छवि को नुकसान पहुँचाया था, लेकिन आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना ने आग में घी का काम किया। इस मामले में सरकार और प्रशासन की भूमिका से पूरे बंगाल में आक्रोश की लहर दौड़ गई।
जनता के इस गुस्से का असर टीएमसी के विधायकों और सांसदों पर भी पड़ा। जब जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र में जा रहे थे, तो उन्हें जनता के कड़े सवालों का सामना करना पड़ रहा था। उन्हें लगने लगा कि यदि वे अब भी इसी व्यवस्था का हिस्सा रहे, तो उनका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ सकता है। इसी जनदबाव और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए इस बगावत का जन्म हुआ।
शुभेंदु अधिकारी की रणनीति और भाजपा का रुख
इस पूरे घटनाक्रम में भारतीय जनता पार्टी की भूमिका अत्यंत रणनीतिक रही है। भाजपा के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी इस पूरी स्थिति पर बारीक नजर रखे हुए हैं। सूत्रों की मानें तो हाल ही में हुई कुछ गुप्त बैठकों में टीएमसी के कई असंतुष्ट नेताओं ने भाग लिया था। शुभेंदु अधिकारी ने बहुत ही सधे हुए तरीके से उन नेताओं को एक मंच पर लाने का प्रयास किया है जो वर्तमान नेतृत्व से खफा हैं।
टीएमसी के लिए अब दोहरा संकट पैदा हो गया है—एक तरफ विधानसभा में फूट और दूसरी तरफ संसद में टूट की आशंका। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में दिल्ली में भी बड़ा विभाजन देखने को मिल सकता है, जिससे यह मामला चुनाव आयोग तक पहुंच सकता है।
क्या बंगाल में दोहराया जाएगा महाराष्ट्र का सियासी मॉडल?
बंगाल की मौजूदा स्थिति महाराष्ट्र के उस घटनाक्रम की याद दिलाती है जहाँ शिवसेना दो भागों में बंट गई थी। ममता बनर्जी आज उसी स्थिति का सामना कर रही हैं जो उद्धव ठाकरे के सामने थी। उनके सामने अब केवल सरकार बचाना ही नहीं, बल्कि पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न बचाना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है। कानून के अनुसार, जिस गुट के पास अधिक विधायक और सांसद होते हैं, असली पार्टी पर उनका दावा मजबूत हो जाता है।
पार्टी के संगठनात्मक ढांचे का इस तरह कमजोर होना कोई सामान्य बात नहीं है। फिरहाद हकीम जैसे पुराने नेताओं के इस्तीफे और ऋतब्रत बनर्जी का विद्रोही तेवर सरकार के मनोबल को चोट पहुंचा रहा है। बंगाल की युवा पीढ़ी अब पारदर्शिता और बदलाव की मांग कर रही है। भ्रष्टाचार और पुरानी नीतियों के खिलाफ जनता का मोहभंग अब खुलकर सामने आ रहा है।
आने वाले 48 से 72 घंटे बंगाल की राजनीति के भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाले हैं। सबकी नजरें उन 20 सांसदों पर हैं, जिनका अगला कदम बंगाल में नई सत्ता की नींव रख सकता है।

