भारत-जापान का महा-प्लान: पूर्वोत्तर में निवेश और चीन की बढ़ती बेचैनी का पूरा सच

वैश्विक कूटनीति में कभी-कभी वे संकेत सबसे शक्तिशाली होते हैं, जो सीधे शब्दों में नहीं कहे जाते। जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची की भारत यात्रा इसी का एक उदाहरण है। शुरुआत में उनका कार्यक्रम असम के गुवाहाटी से शुरू होना तय हुआ था, हालांकि कूटनीतिक और लॉजिस्टिक वजहों से वे सीधे दिल्ली पहुंचीं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ‘सिग्नलिंग’ का बड़ा महत्व होता है। बाहर से यह केवल एक प्रोटोकॉल बदलाव लग सकता है, लेकिन इस रणनीतिक कदम ने बीजिंग में हलचल पैदा कर दी है। भारत और जापान ने मिलकर एक ऐसा गेम प्लान तैयार किया है, जो न केवल एशिया बल्कि वैश्विक सुरक्षा और सप्लाई चैन की दिशा बदलने वाला है।

गुवाहाटी से दौरा शुरू करने की प्रारंभिक योजना एक स्पष्ट संदेश थी। यह दुनिया को, और विशेषकर चीन को बताने का तरीका था कि जापान अब भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को केवल एक सीमावर्ती क्षेत्र नहीं, बल्कि अपने ‘फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक’ विजन का मुख्य केंद्र मानता है। यह साबित करता है कि भारत अब वैश्विक समीकरणों में केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं, बल्कि उन्हें निर्धारित करने वाला पावरहाउस बन गया है।

दशकों तक पूर्वोत्तर भारत को केवल ‘चिकन नेक’ (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) के नजरिए से देखा गया, जो सामरिक रूप से एक कमजोर कड़ी मानी जाती थी। चीन हमेशा इस क्षेत्र पर दबाव बनाने की ताक में रहता था। लेकिन पिछले दस वर्षों में भारत की सोच बदल गई है। आज का भारत समझता है कि असली सुरक्षा केवल हथियारों से नहीं, बल्कि मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक साझेदारी से आती है। यहीं पर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, जापान की एंट्री होती है।

जापान का पूर्वोत्तर में अरबों डॉलर निवेश करना एक गहरी भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। जापान जानता है कि चीन के आक्रामक विस्तारवाद को रोकने के लिए भारत ही एकमात्र सक्षम साझेदार है। पूर्वोत्तर भारत, दक्षिण पूर्व एशिया (म्यांमार, थाईलैंड, वियतनाम) के लिए एक रणनीतिक प्रवेश द्वार है। यदि यह क्षेत्र आर्थिक रूप से मजबूत होता है, तो चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति पूरी तरह विफल हो जाएगी।

यह साझेदारी केवल कागजों तक सीमित नहीं है। भारत-जापान ‘एक्ट ईस्ट फोरम’ अब पूरी तरह सक्रिय है। हाल के महीनों में मेघालय, असम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने जापान का दौरा कर निवेश समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। यह आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर एक बड़ी बढ़त है।

इस खेल का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा कौशल विकास है। मेघालय और असम के हजारों युवाओं को जापानी कंपनियों में रोजगार और प्रशिक्षण देने के समझौते हुए हैं। जापान को वर्कफोर्स की जरूरत है और भारत के पास टैलेंटेड युवाओं की फौज। यह ‘ह्यूमन ब्रिज’ दोनों देशों के रिश्तों को किसी भी बाहरी खतरे से सुरक्षित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

तकनीकी मोर्चे पर, असम के जगीरोड में बन रही भारत की पहली सेमीकंडक्टर फैब यूनिट एक गेम चेंजर है। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और जापान की टोक्यो इलेक्ट्रॉन का यह 27,000 करोड़ का प्रोजेक्ट चीन के तकनीकी दबदबे को सीधी चुनौती है। यह पूर्वोत्तर को ग्लोबल सप्लाई चैन का नया हब बना देगा।

असम में प्रस्तावित जापानी इंडस्ट्रियल टाउनशिप का मतलब है कि जापानी कंपनियों का अब इस क्षेत्र में सीधा हित होगा। जब कोई विदेशी शक्ति किसी क्षेत्र में इतना बड़ा निवेश करती है, तो उस क्षेत्र की स्थिरता उसका राष्ट्रीय हित बन जाती है। यह भारत की वह साइलेंट डिप्लोमेसी है जिसने चीन के सामने एक अभेद्य सुरक्षा कवच तैयार कर दिया है।

इस पूरे ढांचे को खड़ा करने में जाइका (JICA) की भूमिका अहम है। धुबरी-फुलबाड़ी ब्रिज, जो भारत का सबसे लंबा नदी पुल होगा, ब्रह्मपुत्र पर बनकर तैयार हो रहा है। यह केवल कनेक्टिविटी नहीं, बल्कि मिलिट्री लॉजिस्टिक्स के लिए भी एक वैकल्पिक मार्ग है, जो ‘चिकन नेक’ पर निर्भरता कम करेगा और भारत को सीधे दक्षिण पूर्व एशिया के बंदरगाहों से जोड़ेगा।

बांग्लादेश के वर्तमान राजनीतिक संकट के बीच, भारत और जापान की यह जुगलबंदी और भी महत्वपूर्ण हो गई है। चीन ने हमेशा बांग्लादेश और म्यांमार के जरिए भारत को घेरने की कोशिश की है, लेकिन भारत ने जापान को अपना पार्टनर बनाकर इस घेरेबंदी को तोड़ने का रास्ता निकाल लिया है।

जापान के निवेश से तैयार हो रहा यह इकोनॉमिक कॉरिडोर म्यांमार के सितवे और बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह तक अपनी पहुंच बनाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्वोत्तर में जापान की यह मौजूदगी चीन के ‘डेट-ट्रैप’ और उसके संभावित क्षेत्रीय गठबंधनों को बेअसर करने के लिए काफी है।

कोविड के बाद की दुनिया अब ‘चीन प्लस वन’ रणनीति पर चल रही है। दुनिया की दिग्गज कंपनियां अपना आधार चीन से हटा रही हैं। आईआईटी गुवाहाटी और जापानी संस्थानों के बीच एआई और ग्रीन एनर्जी पर हो रही रिसर्च इस बात का संकेत है कि भविष्य की तकनीक यहीं से आकार लेगी।

यह नए भारत का आत्मविश्वास है। बिना किसी सैन्य गुटबाजी में फंसे, भारत अपनी शर्तों पर जापान जैसी महाशक्ति के साथ अपने सबसे संवेदनशील क्षेत्र का विकास कर रहा है। क्वाड का असली प्रभाव अब जमीन पर दिखाई दे रहा है। भारत अब अवसरों का निर्माण कर रहा है और दुनिया को अपनी रणनीतिक शक्ति का लोहा मनवा रहा है।

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