पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है, स्वेज नहर से लेकर लाल सागर तक युद्ध की सुगबुगाहट है और वैश्विक व्यापार मार्गों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देश डरे हुए हैं कि यदि सप्लाई चेन बाधित हुई, तो महंगाई का ऐसा सैलाब आएगा जिसे संभालना मुश्किल होगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में घबराहट का माहौल है और कच्चे तेल की कीमतें अस्थिर हैं, लेकिन इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच नई दिल्ली का रुख बेहद संतुलित और आश्वस्त है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की बिसात पर ऐसी चाल चली है जिसने वाशिंगटन से लंदन तक के विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। जब दुनिया के प्रमुख खरीदार ‘रुको और देखो’ की नीति अपनाए हुए हैं, तब भारतीय रिफाइनरियों ने आक्रामक रुख अपनाते हुए रिकॉर्ड एडवांस बुकिंग की है। यह केवल व्यापारिक निर्णय नहीं है, बल्कि नए भारत की वह रणनीतिक ताकत है जो दर्शाती है कि भारत अब किसी के दबाव में नहीं आता, बल्कि वैश्विक समीकरणों को अपने अनुकूल बनाना जानता है।
- केपलर के आंकड़ों ने वैश्विक बाजार में मचाई हलचल
- प्रतिबंधों की विफलता: रूस बना भारत का सबसे बड़ा तेल भागीदार
- 140 करोड़ भारतीयों का हित और स्वतंत्र नीति
- भारतीय रिफाइनरियों का फ्यूचरिस्टिक मास्टरप्लान
- रिफाइनिंग क्षमता में उछाल: CREA की चौंकाने वाली रिपोर्ट
- यूरोप की मजबूरी और भारत का ग्लोबल रिफाइनिंग हब बनना
- चीन बनाम भारत: रूस के लिए अधिक भरोसेमंद कौन?
- 2030 का मिशन: 100 अरब डॉलर का महा-व्यापार लक्ष्य
- नया भारत: वैश्विक व्यवस्था को बदलने वाली ताकत
केपलर के आंकड़ों ने वैश्विक बाजार में मचाई हलचल
इस पूरे घटनाक्रम की गहराई समझने के लिए आपको इन आंकड़ों पर गौर करना होगा। ऊर्जा प्रवाह पर नजर रखने वाली अंतरराष्ट्रीय फर्म ‘केपलर’ ने जून महीने के सनसनीखेज आंकड़े जारी किए हैं। इन आंकड़ों के अनुसार, मध्य पूर्व में जारी भारी तनाव के बावजूद भारत का कच्चा तेल आयात अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है। जून में भारत ने प्रतिदिन 49.30 लाख बैरल कच्चे तेल का आयात किया। यह ऐतिहासिक आंकड़ा है, क्योंकि आज तक किसी भी वर्ष के जून महीने में भारत ने इतनी बड़ी मात्रा में तेल नहीं खरीदा था। लेकिन सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इस तेल का मुख्य स्रोत कौन सा देश है?
प्रतिबंधों की विफलता: रूस बना भारत का सबसे बड़ा तेल भागीदार
जिस रूस पर अमेरिका और यूरोप ने दुनिया के सबसे सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए और जिसे वैश्विक अर्थव्यवस्था से काटने की पूरी कोशिश की, उसी रूस ने भारत के तेल बाजार में अपना दबदबा कायम कर लिया है। केपलर की रिपोर्ट के अनुसार, जून में भारत द्वारा खरीदे गए कुल कच्चे तेल का आधे से अधिक हिस्सा अकेले रूस से आया है। रूस से भारत का तेल आयात बढ़कर 26 लाख बैरल प्रतिदिन के पार निकल गया है। एक तरफ पश्चिमी मीडिया और सरकारें भारत पर दबाव बना रही थीं, वहीं दूसरी तरफ भारत ने बिना किसी शोर-शराबे के अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए रूस के साथ रिकॉर्ड व्यापार किया। भारत की यह ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ पश्चिमी देशों की नीतियों पर एक बड़ा सवालिया निशान है।
140 करोड़ भारतीयों का हित और स्वतंत्र नीति
इस स्थिति को समझने के लिए 2022 के घटनाक्रम को देखना होगा। यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के साथ ही पश्चिम ने रूसी तेल पर प्राइस कैप और कई प्रतिबंध लगा दिए थे, जिसका उद्देश्य रूस की आर्थिक ताकत को खत्म करना था। भारत पर भी कूटनीतिक दबाव डाला गया, लेकिन भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का परिचय देते हुए गुटनिरपेक्षता को नए आयाम दिए। भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से मिलने वाले रियायती तेल का भरपूर लाभ उठाया। भारत सरकार का पक्ष दुनिया के सामने स्पष्ट था—हमारा देश 140 करोड़ की आबादी वाला है और हम अपनी ऊर्जा जरूरतों का 88 प्रतिशत आयात करते हैं। हम अपने नागरिकों को वैश्विक महंगाई की बलि नहीं चढ़ा सकते और भारत वहीं से तेल खरीदेगा जहां से हमें सबसे अच्छी डील मिलेगी।
भारतीय रिफाइनरियों का फ्यूचरिस्टिक मास्टरप्लान
पिछले कुछ महीनों में भारत ने कच्चे तेल के आयात में जो सूझबूझ दिखाई है, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। आज भारत दुनिया के सबसे सुरक्षित तेल आयातक देशों में से एक है। भारतीय रिफाइनरियां केवल वर्तमान की जरूरतें ही पूरी नहीं कर रही हैं, बल्कि भविष्य की अनिश्चितताओं के लिए भी तैयार हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव को देखते हुए रिफाइनरियों ने दो महीने पहले ही बुकिंग शुरू कर दी थी। अगस्त के मध्य तक का तेल भारत पहले ही सुरक्षित कर चुका है। इसका अर्थ यह है कि यदि मध्य पूर्व का संकट और गहराता है, तब भी भारतीय घरेलू बाजार पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा और हमारी अर्थव्यवस्था की गति बनी रहेगी।
रिफाइनिंग क्षमता में उछाल: CREA की चौंकाने वाली रिपोर्ट
‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर’ (CREA) की हालिया रिपोर्ट भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत की पुष्टि करती है। मई महीने में भारत रूसी जीवाश्म ईंधन का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बना रहा। भारत ने केवल एक महीने में करीब 6.7 अरब डॉलर मूल्य के रूसी हाइड्रोकार्बन का आयात किया। रिफाइनरी स्तर पर देखें तो गुजरात की वाडिनार रिफाइनरी में रूसी तेल की आवक में 36 प्रतिशत और जामनगर रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स में 14 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा, सरकारी रिफाइनरियों जैसे न्यू मैंगलोर (13% वृद्धि), विशाखापत्तनम (42% वृद्धि) और पारादीप रिफाइनरी ने भी तेल आयात के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
यूरोप की मजबूरी और भारत का ग्लोबल रिफाइनिंग हब बनना
खेल केवल तेल खरीदने तक सीमित नहीं है। सस्ते रूसी क्रूड को रिफाइन करके भारतीय कंपनियां पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन (ATF) तैयार कर रही हैं। मजेदार बात यह है कि भारत इस रिफाइंड ईंधन को उन्हीं यूरोपीय देशों को ऊंचे दामों पर बेच रहा है जिन्होंने रूस पर प्रतिबंध लगाए हैं। इसे कूटनीति का बड़ा उलटफेर माना जा रहा है। जिस यूरोप ने रूस से सीधा तेल लेना बंद किया, वही आज भारत के माध्यम से रूसी तेल का उपयोग करने को मजबूर है। भारत अब दुनिया का प्रमुख रिफाइनिंग हब बन चुका है और पश्चिमी देश इसे रोकने में पूरी तरह असमर्थ रहे हैं।
चीन बनाम भारत: रूस के लिए अधिक भरोसेमंद कौन?
CREA के अनुसार, मई में रूस के तेल निर्यात में चीन की हिस्सेदारी 50% थी, जबकि भारत 36% के साथ दूसरे स्थान पर रहा। हालांकि, भारत और चीन की रणनीतियां अलग हैं। अमेरिका के भारी दबाव और आलोचना के बावजूद भारत ने स्पष्ट कर दिया कि उसकी विदेश नीति नई दिल्ली के हितों से संचालित होती है, वाशिंगटन से नहीं। यही कारण है कि रूस भी चीन की तुलना में भारत पर अधिक भरोसा करता है। रूस को पता है कि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है जो किसी महाशक्ति के आगे नहीं झुकता, जिससे वह एक विश्वसनीय दीर्घकालिक भागीदार बन जाता है।
2030 का मिशन: 100 अरब डॉलर का महा-व्यापार लक्ष्य
रूस के क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने हाल ही में घोषणा की है कि भारत और रूस के संबंध नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं। दोनों देशों ने साल 2030 तक आपसी व्यापार को 100 अरब डॉलर के ऐतिहासिक लक्ष्य तक ले जाने का संकल्प लिया है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी इस लक्ष्य पर अपनी मुहर लगा दी है। वर्तमान में दोनों देशों का व्यापार 60 अरब डॉलर के करीब है, जिसे जल्द ही विस्तार दिया जाएगा। यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब पश्चिमी देश भारत को रूस से दूर करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं।
नया भारत: वैश्विक व्यवस्था को बदलने वाली ताकत
अफ्रीका से लेकर रूस और वेनेजुएला तक, भारत ने अपने तेल आपूर्ति स्रोतों को इतना विविधतापूर्ण बना लिया है कि कोई भी देश भारत को ब्लैकमेल नहीं कर सकता। भारत अब केवल वैश्विक घटनाओं का दर्शक नहीं है, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीय राजनीति और अर्थव्यवस्था के समीकरणों को अपने दम पर बदलने वाली एक महाशक्ति के रूप में उभर चुका है।

