ब्रह्मोस का दबदबा: भारत की इस मिसाइल ने चीन, पाकिस्तान और सऊदी अरब में मचाया हड़कंप

9 मार्च 2022 का दिन वैश्विक सैन्य इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज हो गया है। इसी दिन दुनिया का सामरिक ढांचा तब हिल गया जब पाकिस्तान के मियां चन्नू में अचानक आसमान से एक आग का गोला गिरा। रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालयों में सन्नाटा छा गया क्योंकि अरबों डॉलर के चीनी एयर डिफेंस सिस्टम इस खतरे को भांपने में पूरी तरह नाकाम रहे। यह कोई सुनियोजित हमला नहीं, बल्कि भारत की ब्रह्मोस मिसाइल थी जो तकनीकी खराबी से फायर हो गई थी। लेकिन इस एक चूक ने बीजिंग से रावलपिंडी तक के इस दावे की पोल खोल दी कि उनके पास भारत के इस ‘ब्रह्मास्त्र’ का कोई तोड़ है। आज इस मिसाइल ने पेंटागन से लेकर चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के मुख्यालयों तक खलबली मचा दी है।

वर्तमान में खाड़ी देशों के रणनीतिक गलियारों में एक बड़ी खबर चर्चा का विषय बनी हुई है। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच ब्रह्मोस मिसाइल और ‘आकाशतीर’ एयर डिफेंस सिस्टम की खरीद को लेकर बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है। इस खबर ने सऊदी अरब की नींद उड़ा दी है। दरअसल, सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ एक सुरक्षा समझौता कर रखा था, जिसमें पाकिस्तान की सेना को सऊदी की रक्षा का जिम्मा दिया गया था। लेकिन ब्रह्मोस के बढ़ते प्रभाव ने इस पूरे समीकरण को चुनौती दे दी है।

सैन्य विशेषज्ञों और वॉर-गेम सिमुलेशन की रिपोर्टों ने स्पष्ट कर दिया है कि ब्रह्मोस मिसाइल पाकिस्तान के एयरबेस को पंगु बनाने में सक्षम है। पाकिस्तान में तैनात चीनी HQ-9 जैसे सिस्टम ब्रह्मोस की गति और प्रक्षेपवक्र (trajectory) को ट्रैक करने में अक्षम हैं। यूएई अपनी रक्षा नीति को अब केवल रक्षात्मक (Defensive) न रखकर आक्रामक (Offensive) बनाना चाहता है, और उसे पता है कि ब्रह्मोस जैसी मारक क्षमता वाला हथियार पूरी दुनिया में दूसरा नहीं है।

एक और चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ है कि रूस, जिसने कभी ब्रह्मोस को विकसित करने में भारत की मदद की थी, आज खुद भारत से इस मिसाइल सिस्टम को लेने के लिए बातचीत कर रहा है। नागपुर में स्वदेशी सॉलिड प्रोपेलेंट बूस्टर के सफल परीक्षण के दौरान ब्रह्मोस एयरोस्पेस ने इसके संकेत दिए। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की मिसाइल उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है, जबकि भारत ने ब्रह्मोस को 80% तक स्वदेशी बना लिया है। आज भारत केवल हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली निर्यातक बनकर उभरा है।

अगर हम तकनीकी तुलना करें, तो अमेरिका की टोमाहॉक मिसाइल की रफ्तार मात्र 980 किमी/घंटा (मैक 0.8) है, जबकि भारत की ब्रह्मोस मैक 3.0 की सुपरसोनिक गति से चलती है। ब्रह्मोस की गति टोमाहॉक से लगभग चार गुना अधिक है। जब यह मिसाइल अपने लक्ष्य से टकराती है, तो इसकी गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) इतनी भयानक होती है कि यह बिना विस्फोटक के भी किसी आधुनिक युद्धपोत के दो टुकड़े कर सकती है। अमेरिकी विशेषज्ञ भी मानते हैं कि उनके विमानवाहक पोतों के रक्षा तंत्र के लिए ब्रह्मोस को रोकना लगभग असंभव है।

चीन अपनी YJ-12 और YJ-18 मिसाइलों का कितना भी प्रचार करे, लेकिन वे ब्रह्मोस की ‘सी-स्किमिंग’ तकनीक का मुकाबला नहीं कर सकतीं। ब्रह्मोस समुद्र की सतह से मात्र 3-4 मीटर ऊपर उड़ती है, जिससे रडार इसे नहीं पकड़ पाते। इसके अलावा, इसमें लगा स्वदेशी AESA रडार सीकर इसे जैमिंग-प्रूफ बनाता है। पाकिस्तान की बाबर जैसी मिसाइलें पुरानी चीनी तकनीक की प्रतियां हैं, जिन्हें भारत के S-400 और आकाश सिस्टम आसानी से मार गिरा सकते हैं।

भविष्य की तैयारियों के लिए DRDO ब्रह्मोस-NG (नेक्स्ट जनरेशन) पर काम कर रहा है। इसका वजन केवल 1.2 टन होगा, जिससे इसे तेजस और राफेल जैसे हल्के फाइटर जेट्स पर भी लगाया जा सकेगा। इसके अलावा, ‘ब्रह्मोस-2’ हाइपरसोनिक वेरिएंट पर भी काम जारी है जिसकी रफ्तार मैक 7-8 होगी। इतनी गति वाली मिसाइल को दुनिया का कोई भी मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम नहीं रोक पाएगा।

रणनीतिक रूप से, भारत ने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पर ब्रह्मोस का एक अभेद्य जाल बिछा दिया है। इससे मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने वाला चीन का अधिकांश व्यापारिक और सैन्य मार्ग अब सीधे भारत की जद में है। भारतीय नौसेना अपनी पनडुब्बियों के लिए भी वर्टिकल लॉन्च सिस्टम तैयार कर चुकी है, जिससे समुद्र की गहराइयों से भी दुश्मन के ठिकानों को तबाह किया जा सकेगा।

ब्रह्मोस अब केवल एक हथियार नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक शक्ति का प्रतीक बन गया है। फिलीपींस को दी गई मिसाइलों की खेप ने दक्षिण चीन सागर में चीन के आक्रामक रवैये पर लगाम लगा दी है। वियतनाम, इंडोनेशिया, आर्मेनिया और ग्रीस जैसे देश भी इस तकनीक को अपनाने के लिए कतार में हैं।

ब्रह्मोस की एक और खूबी इसका ‘सेल्फ-डिस्ट्रक्ट और टारगेट री-असाइनमेंट’ सॉफ्टवेयर है। यदि लक्ष्य बदल जाए या कोई नागरिक जहाज सामने आ जाए, तो मिसाइल खुद फैसला लेकर नया लक्ष्य चुन सकती है। इसका रडार क्रॉस सेक्शन इतना कम है कि यह एक स्टेल्थ मिसाइल की तरह काम करती है, जिसका प्रमाण पाकिस्तानी रडारों पर इसकी अनुपस्थिति से मिल चुका है।

अंततः, ब्रह्मोस भारत के बढ़ते सैन्य आत्मविश्वास और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की सफलता की कहानी है। फिलीपींस से लेकर यूएई तक, दुनिया आज भारत के रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा बनना चाहती है। भारत की यह नई और आक्रामक रक्षा नीति वैश्विक पटल पर गेम चेंजर साबित हो रही है।

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