गगनयान मिशन के लिए ISRO की बड़ी कामयाबी: SOLVE रॉकेट का सफल परीक्षण, दुनिया दंग

कल्पना कीजिए कि आप पृथ्वी से 400 किलोमीटर ऊपर एक स्पेस कैप्सूल में हैं। आपका मिशन पूरा हो चुका है और अब घर लौटने का समय है। आप उस छोटे से क्रू मॉड्यूल में बैठे हैं, जो 27,000 किलोमीटर प्रति घंटे की अविश्वसनीय गति से नीचे गिर रहा है। जैसे ही यह वायुमंडल में प्रवेश करता है, घर्षण के कारण बाहर का तापमान 2,000 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। कैप्सूल एक दहकते आग के गोले में बदल जाता है और प्लाज्मा के कारण धरती से संपर्क टूट जाता है। लेकिन असली चुनौती आग नहीं, बल्कि वह प्रचंड गति है। अगर यह भारी-भरकम कैप्सूल उसी रफ्तार से सीधे समुद्र या जमीन से टकराता है, तो यह अंतरिक्ष यात्रियों के लिए अत्यंत विनाशकारी होगा। ऐसी स्थिति की कल्पना ही डरावनी है।

अब दुनिया के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि इसरो इस आग के गोले जैसी स्थिति में भी मक्खन जैसी सुरक्षित लैंडिंग कैसे कराएगा। नासा और स्पेसएक्स जैसी विदेशी एजेंसियां आमतौर पर हेलीकॉप्टर या विमानों से डमी कैप्सूल गिराकर ऐसे टेस्ट करती हैं। लेकिन इसरो किसी की नकल नहीं करता; वह अपना रास्ता खुद बनाता है। यही कारण है कि इसरो ने एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला है जिसने ग्लोबल स्पेस रेस के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है।

3 जुलाई की सुबह ठीक 10 बजे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में एक जोरदार गर्जना हुई। यह कोई साधारण रॉकेट टेस्ट नहीं था। यह इसरो के आगामी मिशनों की सफलता की पुख्ता गारंटी थी। इसरो ने बिना किसी शोर-शराबे के एक नया ‘कस्टम मेड’ रॉकेट तैयार किया है, जिसका नाम SOLVE (सब ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल फॉर एक्सपेरिमेंट्स) है। यह भारत की अंतरिक्ष रणनीति का नया ब्रह्मास्त्र है, जो दुनिया को संदेश देता है कि भारत अब परीक्षणों के लिए विदेशी मंचों पर निर्भर नहीं है।

इस SOLVE रॉकेट की अचानक आवश्यकता क्यों पड़ी, इसे समझना जरूरी है। गगनयान मिशन में भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित वापस लाने वाले सिस्टम को ‘डिसेलरेशन सिस्टम’ कहा जाता है। इसका काम अत्यधिक गति को नियंत्रित करना है। इस सिस्टम के परीक्षण के लिए इसरो को एक ऐसे प्लेटफॉर्म की जरूरत थी जो कैप्सूल को 10 से 17 किलोमीटर की ऊंचाई तक ले जा सके, ठीक उसी गति और कोण पर जो वास्तविक मिशन में वापसी के समय होगा। विदेशी एजेंसियां इसके लिए विमानों का उपयोग करती हैं, लेकिन इसरो ने अपनी खुद की ‘फ्लाइंग लेबोरेटरी’ बनाने का फैसला किया, और यहीं से SOLVE का जन्म हुआ।

यह रॉकेट बेहद खास है। इसरो ने अपने भरोसेमंद पीएसएलवी (PSLV) के स्ट्रैप-ऑन मोटर को लेकर उसे पूरी तरह मॉडिफाई किया है। इसमें दो प्रमुख बदलाव किए गए हैं। पहला, इसमें धीमी गति से जलने वाला प्रोपेलेंट इस्तेमाल किया गया है ताकि रॉकेट झटके के बिना स्मूथली उस ऊंचाई तक पहुंचे जहां कैप्सूल रिलीज करना है। दूसरा, इसमें SITVC (सेकेंडरी इंजेक्शन थ्रस्ट वेक्टर कंट्रोल) के साथ एक स्ट्रेट नोजल है, जो हवा के तेज दबाव में भी रॉकेट को सुई की नोक जैसी सटीकता के साथ अपने पथ पर बनाए रखता है।

अब बात करते हैं गगनयान की सुरक्षा के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से—पैराशूट सिस्टम की। गगनयान में 10 पैराशूट्स का जाल बिछाया गया है। अंतरिक्ष विज्ञान में छोटी सी चूक भी भारी पड़ती है। जब 17 किमी की ऊंचाई से भारी कैप्सूल गिरता है, तो गुरुत्वाकर्षण और हवा का दबाव उसे अस्थिर करता है। यदि सीधे मुख्य पैराशूट खोल दिया जाए, तो वह दबाव के कारण फट जाएगा और कैप्सूल दुर्घटनाग्रस्त हो जाएगा।

इस जोखिम को टालने के लिए इसरो ने 10 पैराशूट्स का एक क्रमिक चक्रव्यूह बनाया है। यह पूरी तरह टाइमर आधारित सिस्टम है। सबसे पहले कैप्सूल का एपेक्स कवर हटेगा और दो ‘पायलट पैराशूट’ बाहर आएंगे जो कैप्सूल को स्थिर करेंगे। इसके बाद दो ‘ड्रोग पैराशूट’ खुलेंगे जो रफ्तार को नियंत्रित करेंगे। फिर तीन और छोटे पायलट पैराशूट खुलेंगे जिनका काम तीन सबसे बड़े ‘मेन पैराशूट’ को बाहर खींचना होगा।

अंत में तीन विशालकाय मुख्य पैराशूट खुलेंगे। ये इतने बड़े हैं कि इनमें एक फुटबॉल का मैदान समा सकता है। इसरो ने इसमें ‘रिडंडेंसी’ का भी ध्यान रखा है; यानी अगर तीन में से कोई एक मुख्य पैराशूट नहीं भी खुलता, तो बाकी दो पैराशूट अंतरिक्ष यात्रियों को बंगाल की खाड़ी या अरब सागर में सुरक्षित उतारने के लिए पर्याप्त होंगे। SOLVE रॉकेट इसी जटिल प्रक्रिया का परीक्षण विभिन्न गति और कोणों पर करेगा।

मगर SOLVE और गगनयान तो केवल शुरुआत हैं। इसरो अपनी गुप्त प्रयोगशालाओं में कुछ ऐसा बना रहा है जो भारत को अगले दशक में अंतरिक्ष की महाशक्ति बना देगा। चंद्रयान-3 ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर तिरंगा फहराया, लेकिन चंद्रयान-4 और भी रोमांचक होगा। इस मिशन में इसरो का लैंडर चांद से नमूने इकट्ठा करेगा, उन्हें एक रॉकेट में भरकर अंतरिक्ष में दूसरे मॉड्यूल से डॉक करेगा और वापस पृथ्वी पर लाएगा। यह उच्च स्तरीय इंजीनियरिंग दुनिया के गिने-चुने देशों के पास ही है।

इसके बाद बारी आती है भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) की। दुनिया का अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) जल्द ही रिटायर होने वाला है, लेकिन भारत 2035 तक अपना स्वतंत्र स्पेस स्टेशन स्थापित करने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। हमारे वैज्ञानिक वहां महीनों रहकर माइक्रोग्रैविटी में रिसर्च करेंगे, जो भारत की अंतरिक्ष कूटनीति का प्रमुख केंद्र बनेगा।

स्पेसएक्स के फाल्कन रॉकेट्स को टक्कर देने के लिए इसरो का ‘पुष्पक’ विमान तैयार हो रहा है। यह एक रियूजेबल स्पेस शटल है जो सैटेलाइट लॉन्च कर वापस रनवे पर लैंड करेगा। इसके हालिया ‘लेक्स’ (LEX) मिशनों ने साबित कर दिया है कि इसरो का ऑटोनॉमस लैंडिंग सिस्टम बेजोड़ है। इससे सैटेलाइट लॉन्चिंग का खर्च बहुत कम हो जाएगा और भारत वैश्विक बाजार पर कब्जा कर लेगा।

साथ ही, इसरो ‘नेक्स्ट जनरेशन लॉन्च व्हीकल’ (NGLV) यानी ‘सूर्या’ पर काम कर रहा है। यह मीथेन और लिक्विड ऑक्सीजन जैसे ग्रीन फ्यूल से चलने वाला दानवाकार रॉकेट होगा, जो 30 टन से ज्यादा वजन ले जाने में सक्षम होगा। यह भविष्य के अंतरग्रहीय मिशनों की रीढ़ बनेगा।

चांद और मंगल के बाद अब नजरें शुक्र (Venus) पर हैं। ‘शुक्रयान’ मिशन के जरिए वहां के बादलों के रहस्यों को उजागर किया जाएगा। इसके अलावा, नासा के साथ मिलकर ‘निसार’ (NISAR) सैटेलाइट बनाया जा रहा है, जो धरती के एक-एक सेंटीमीटर के बदलाव को ट्रैक करेगा। यह राष्ट्रीय सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के लिए गेम-चेंजर होगा।

3 जुलाई का SOLVE टेस्ट सिर्फ एक मशीन का परीक्षण नहीं था, बल्कि दुनिया को चेतावनी थी कि भारत अब अंतरिक्ष की दौड़ में किसी का अनुयायी नहीं है। हमने वह तकनीक विकसित कर ली है जो कल तक असंभव लगती थी। नई स्पेस पॉलिसी और निजी क्षेत्र की भागीदारी भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन का केंद्र बना रही है। वे 10 पैराशूट केवल नायलॉन नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के गौरव का प्रतीक होंगे।

आज अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी अपने सैटेलाइट लॉन्च के लिए इसरो की ओर देख रहे हैं। इसरो की कम लागत में बेहतरीन तकनीक देने की क्षमता (फ्रूगल इंजीनियरिंग) ने बाजार के नियम बदल दिए हैं। जब गगनयान सुरक्षित लौटेगा, तो वह केवल इसरो की नहीं, बल्कि भारत के उस साहस की जीत होगी जो अपनी राह खुद बनाना जानता है।

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