क्या वाशिंगटन से लेकर लंदन तक की ताकतवर नौसेनाएं आज समंदर के अदृश्य खतरों से पीछे हट रही हैं? लाल सागर की उफनती लहरों के बीच जहां सुपरपावर्स के युद्धपोत भी संघर्ष कर रहे हैं, वहां अचानक भारतीय नौसेना के सबसे घातक डिस्ट्रॉयर्स ने मौत को खुली चुनौती क्यों दे दी है? क्या दिल्ली के साउथ ब्लॉक से कोई ऐसा टॉप सीक्रेट ‘शूट एट साइट’ ऑर्डर पास हो चुका है, जिसने मिडिल ईस्ट के विद्रोही गुटों की नींद उड़ा दी है? और सबसे बड़ा सवाल, आखिर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बंद दरवाजों के पीछे ईरान और यूक्रेन के विदेश मंत्रियों को फोन पर ऐसा क्या अल्टीमेटम दिया, जिसे सुनकर कीव से लेकर तेहरान तक हड़कंप मच गया है? क्या सच में तीसरे विश्व युद्ध की आहट के बीच, भारत ने अपनी पुरानी ‘सॉफ्ट स्टेट’ वाली छवि को हमेशा के लिए बदल दिया है? आज हम ग्लोबल डिप्लोमेसी और मिलिट्री डोमिनेंस के उस चक्रव्यूह को डिकोड करेंगे जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा कि नया भारत किस स्तर की आक्रामक रणनीति पर काम कर रहा है।
आज का वैश्विक परिदृश्य बारूद के ऐसे ढेर पर बैठा है जहां एक छोटी सी चिंगारी पूरी दुनिया की शांति को भस्म कर सकती है। पश्चिम एशिया धधक रहा है, लाल सागर से लेकर काला सागर तक मिसाइलों और ड्रोन्स की बारिश हो रही है। दुनिया की बड़ी महाशक्तियां सहमी हुई हैं, लेकिन कूटनीति की बिसात पर भारत ने स्पष्ट और कड़ा संदेश दे दिया है कि हमारे हितों पर आंच आई, तो हम कूटनीति की मेज से लेकर समंदर की गहराई तक मुंहतोड़ जवाब देंगे। डॉ. एस जयशंकर ने जिस आक्रामक अंदाज में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा से बात की है, वह कोई सामान्य कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं था। यह एक उभरती महाशक्ति की वो दहाड़ थी जिसने बता दिया कि भारत अब किसी भी सैन्य गठबंधन या सुपरपावर के दबाव में नहीं है। व्यापारिक जहाजों और भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर भारत का ‘जीरो टॉलरेंस’ स्टैंड हमारी नई विदेश नीति का सबसे बड़ा परिचायक है।
ईरान को दो-टूक चेतावनी
जब हुती विद्रोहियों और अन्य चरमपंथी गुटों द्वारा लाल सागर में कमर्शियल शिप्स को निशाना बनाया जा रहा है, तब अमेरिका का ‘ऑपरेशन प्रोस्पेरिटी गार्जियन’ भी नाकाम साबित होने लगा। ऐसे में भारत ने मूकदर्शक बने रहने से इनकार कर दिया। विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर ने सीधे ईरान को फोन घुमाया। यह बातचीत किसी अनुरोध की तरह नहीं, बल्कि एक सख्त चेतावनी की तरह थी। भारत ने साफ कर दिया कि किसी भी परिस्थिति में भारतीय नाविकों पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ईरान को यह स्पष्ट कर दिया गया कि ऐतिहासिक संबंध और चाबहार पोर्ट का निवेश अपनी जगह है, लेकिन अगर भारत के समुद्री हितों पर खरोंच आई, तो भारत जवाबी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। भारत ने साफ किया कि वह कूटनीति का समर्थक है, लेकिन अपने रणनीतिक हितों से समझौता नहीं करेगा।
यूक्रेन के मोर्चे पर कड़ा रुख
यही बेबाकी यूक्रेन के मोर्चे पर भी दिखी। कल तक भारत को कूटनीति का ज्ञान देने वाला यूक्रेन आज भारत के रुख पर गंभीर है। जब ब्लैक सी में भारतीय सीफेयरर्स पर खतरे के बादल मंडराए, तो डॉ. जयशंकर ने यूक्रेन के विदेश मंत्री को कड़े शब्दों में चेताया कि भारत ऐसे किसी भी हमले की निंदा करता है। जयशंकर ने यूक्रेन को याद दिलाया कि इन संघर्षों का खामियाजा ‘ग्लोबल साउथ’ के देश उठा रहे हैं। पश्चिमी देशों के जियोपॉलिटिकल ईगो के कारण आज दुनिया में फ्यूल और फूड सिक्योरिटी का संकट है। जयशंकर की इस दो-टूक बात के बाद, यूक्रेन ने खुद रूस के साथ संघर्ष खत्म करने में भारत से मध्यस्थता की गुहार लगाई। यह आज के भारत की हैसियत है कि जो देश हमें उपदेश देते थे, आज वे अपनी रक्षा के लिए भारत की ओर देख रहे हैं।
अरब सागर में नौसेना का दबदबा
भारत सिर्फ फोन पर चेतावनी नहीं दे रहा, बल्कि धरातल पर ऐसा मिलिट्री एक्शन ले रहा है जिससे दुनिया हैरान है। भारत का 95% व्यापार समुद्री रास्तों से होता है और दुनिया के 10% नाविक भारतीय हैं। ऐसे में समंदर पर खतरा भारत की इकॉनमी पर सीधा हमला है। लाल सागर और अदन की खाड़ी में भारतीय नौसेना ने जो ऑपरेशनल मुस्तैदी दिखाई है, वह कोई और नौसेना नहीं कर पा रही है। भारतीय नेवी ने वहां आतंकवादियों के लिए खौफ पैदा कर दिया है।
भारतीय नौसेना ने अरब सागर में आईएनएस कोलकाता, कोच्चि, चेन्नई और विशाखापत्तनम जैसे 10 से अधिक घातक गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर्स तैनात कर दिए हैं। ये ब्रह्मोस और बराक मिसाइलों से लैस हैं जो किसी भी दुश्मन को पलक झपकते राख कर सकते हैं। साथ ही, पी-8आई टोही विमान और सी गार्जियन ड्रोन लगातार निगरानी कर रहे हैं। पश्चिमी देशों के जहाजों ने जब गश्त कम की, तब भारतीय नौसेना ने ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ की भूमिका निभाकर दिखा दिया कि इंडियन ओशन का असली बॉस कौन है।
मार्कोस कमांडोज का पराक्रम
नेवल डोमिनेंस का सबसे बड़ा उदाहरण 5 जनवरी 2024 को दिखा, जब एमवी लीला नोरफोक को समुद्री लुटेरों ने हाईजैक कर लिया। भारतीय नौसेना का डिस्ट्रॉयर आईएनएस चेन्नई तुरंत मौके पर पहुंचा। लुटेरों के हौसले तब पस्त हुए जब मार्कोस मरीन कमांडोज को जहाज पर एयरड्रॉप किया गया। मार्कोस का खौफ इतना था कि लुटेरे हथियार छोड़कर भाग गए। हमारे कमांडोज ने 15 भारतीयों को सुरक्षित निकाला। यह नए भारत का रियल-टाइम मिलिट्री ऑपरेशन था जिसने वैश्विक खुफिया एजेंसियों को दंग कर दिया।
इसी तरह, जब हूतियों ने ब्रिटिश तेल टैंकर एमवी मार्लिन लुआंडा पर हमला किया और भीषण आग लग गई, तब भारतीय नौसेना का आईएनएस विशाखापत्तनम सबसे पहले मदद को पहुंचा। हमारे जांबाज फायरफाइटर्स ने आग बुझाई और पूरे क्रू को सुरक्षित बचाया। जहां अमेरिका और ब्रिटेन रक्षात्मक मुद्रा में हैं, वहां भारतीय नौसेना डंके की चोट पर रेस्क्यू ऑपरेशन्स कर रही है और व्यापारिक जहाजों को सुरक्षा की गारंटी दे रही है।
नागरिक सुरक्षा: ऑपरेशन गंगा से वंदे भारत तक
भारत की यह आक्रामक नीति रातों-रात नहीं बनी, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। पिछले एक दशक में भारत ने अपने नागरिकों को जिस साहस के साथ वॉर जोन से निकाला है, वह बेमिसाल है। आज का भारत कहता है कि हम किसी को छेड़ते नहीं, लेकिन हमारे नागरिकों को कोई छेड़ेगा तो हम उसे छोड़ेंगे नहीं। नागरिकों की सुरक्षा का सबसे बड़ा उदाहरण 2022 का ‘ऑपरेशन गंगा’ है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच जब कीव और खार्किव में बम बरस रहे थे, तब 22,000 भारतीय छात्र वहां फंसे थे। पूरी दुनिया ने इसे असंभव माना था, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन और जेलेंस्की से बात की और भारतीय छात्रों के लिए 6 घंटे तक युद्ध रुकवा दिया गया। आधुनिक सैन्य इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।
भारतीय वायुसेना के ग्लोबमास्टर और विशेष उड़ानों के जरिए 22,500 भारतीयों को लाया गया। यह ऑपरेशन इतना प्रभावशाली था कि विदेशी छात्रों ने भी तिरंगा हाथ में ले लिया, क्योंकि तिरंगा ही वो सुरक्षित पासपोर्ट था जिस पर कोई गोली नहीं चला रहा था। यह तिरंगे की वो ताकत है जो भारत की बढ़ती ग्लोबल पावर से आती है।
वैश्विक संकटों में मसीहा बना भारत
2023 के सूडान संकट में भारत ने ‘ऑपरेशन कावेरी’ चलाया। वायुसेना के पायलटों ने नाइट विजन गॉगल्स पहनकर जर्जर एयरबेस पर टैक्टिकल लैंडिंग की और हजारों लोगों को सुरक्षित निकाला। वहीं, 2015 के यमन युद्ध में भारत ने ‘ऑपरेशन राहत’ के जरिए न केवल अपने लोगों को बचाया, बल्कि अमेरिका और रूस समेत 41 देशों के नागरिकों की भी जान बचाई। यह क्राइसिस मैनेजमेंट में भारत की सर्वोच्चता का प्रमाण है।
2021 में अफगानिस्तान से ‘ऑपरेशन देवी शक्ति’ और 2023 में इजरायल से ‘ऑपरेशन अजय’ के तहत भारतीयों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की गई। कोविड-19 के दौरान ‘वंदे भारत मिशन’ के तहत 1.83 करोड़ से ज्यादा भारतीयों को स्वदेश लाना एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। यह राष्ट्र का अपने नागरिकों के प्रति अटूट कमिटमेंट दर्शाता है।
रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के स्तंभ
भारत की बढ़ती विदेश नीति का आधार ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ है। डॉ. जयशंकर का ईरान और यूक्रेन को संदेश इसी का उदाहरण है। भारत अब यह नहीं देखता कि पश्चिम हमारे बारे में क्या सोचता है। जयशंकर ने पश्चिमी मीडिया को स्पष्ट कर दिया था कि यूरोप की समस्या दुनिया की समस्या है, लेकिन दुनिया की समस्या यूरोप की समस्या नहीं है—यह मानसिकता अब नहीं चलेगी।
भारत की नीति तीन स्तंभों पर टिकी है: पहला, टेररिज्म और पाइरेसी पर ‘जीरो टॉलरेंस’। अगर हमारी सप्लाई चेन को खतरा है, तो भारत अपनी नेवी भेजेगा और किसी अंतरराष्ट्रीय अनुमति का इंतजार किए बिना दुश्मनों को खत्म करेगा। यह भारत का अपना ‘प्री-एम्पशन डॉक्ट्रिन’ है।
दूसरा स्तंभ ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ है। हम रूस से सस्ता तेल भी खरीदते हैं और अमेरिका के साथ क्वाड में भी बैठते हैं। हम ईरान के साथ चाबहार भी चलाते हैं और इजरायल के साथ रक्षा सौदे भी करते हैं। यह कन्फ्यूजन नहीं, बल्कि शुद्ध ‘इंडिया फर्स्ट’ नीति है। भारत अपने फायदे के हिसाब से दोस्त चुनता है, दबाव में नहीं।
तीसरा स्तंभ ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज बनना है। जयशंकर ने यूक्रेन से कहा कि उनके युद्ध का असर गरीब देशों पर पड़ रहा है। जी20 में अफ्रीकन यूनियन को स्थायी सदस्य बनवाकर भारत ने साबित कर दिया कि वह अब आधी दुनिया की आवाज बन चुका है।
आर्थिक ताकत और नेवल डिप्लोमेसी
भारत की इस आक्रामकता के पीछे उसकी बेतहाशा बढ़ती आर्थिक ताकत है। 3.7 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी और 39,000 करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात भारत को एक नई ऊंचाई पर ले गया है। जब देश की अर्थव्यवस्था इतनी विशाल हो, तो वह अपने जहाजों को समंदर में असुरक्षित नहीं छोड़ सकता।
हुती हमलों के कारण स्वेज नहर का रूट असुरक्षित होने से मालभाड़ा 400% तक बढ़ गया है। भारत अपनी सप्लाई चेन में ऐसा व्यवधान बर्दाश्त नहीं कर सकता क्योंकि इसका असर आम आदमी की जेब पर पड़ता है। डॉ. जयशंकर की ईरान को चेतावनी के पीछे यही आर्थिक गणित है। भारत ने साफ कह दिया है कि हमारे जहाजों पर हमला हुआ, तो हम सीधा ‘सोर्स’ को तबाह कर देंगे।
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत के बढ़ते उदय को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय साजिशें रची जा रही हैं। चीन के ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ को भारतीय नौसेना ने बैकफुट पर धकेल दिया है। जब भारत के 10 युद्धपोत अरब सागर में पेट्रोलिंग करते हैं, तो बीजिंग से इस्लामाबाद तक खतरे की घंटी बजती है। भारत ने लाल सागर संकट को एक अवसर में बदलकर दुनिया को दिखा दिया है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने का दम केवल हमारे पास है।

