पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति और संघर्षों के बीच एक ऐसी खबर आई है जिसने रक्षा विशेषज्ञों को चौंका दिया है। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने रियाद में एक त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे रणनीतिक हलकों में ‘इस्लामिक NATO’ के रूप में देखा जा रहा है। इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इन तीन देशों में से किसी एक पर भी हमला होने पर उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। इस सैन्य समझौते को तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ की उपस्थिति में अंतिम रूप दिया गया। भारत इस घटनाक्रम पर बेहद बारीकी से नजर रख रहा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया है कि भारत इस गठबंधन के हर पहलू और इसके संभावित प्रभावों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण कर रहा है।
सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान ने इसी समय यह समझौता क्यों किया? जब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है और वह दिवालिया होने के कगार पर है, तब ऐसा कदम उठाना उसकी हताशा को दर्शाता है। आज पाकिस्तान एक विफल राष्ट्र (Failed State) की स्थिति में है। बलूचिस्तान से लेकर खैबर पख्तूनख्वा तक अशांति है और गिलगित-बाल्टिस्तान में जनता महंगाई और प्रशासन के खिलाफ सड़कों पर है। विदेशी कर्ज पर टिकी पाकिस्तान की सेना को अपनी जनता का ध्यान भटकाने के लिए एक नए नैरेटिव की जरूरत थी ताकि वह खुद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ताकतवर दिखा सके। यह समझौता उसकी शक्ति नहीं, बल्कि उसके आंतरिक अस्तित्व के संकट को छुपाने की एक कोशिश है।
पाकिस्तान में असली सत्ता की डोर इस्लामाबाद की सरकार के पास नहीं, बल्कि रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय में है। शहबाज शरीफ की सरकार केवल एक मुखौटा है, जबकि महत्वपूर्ण रणनीतिक फैसले पाकिस्तानी सेना द्वारा लिए जाते हैं। वर्तमान में पाकिस्तान एक ‘हाइब्रिड मॉडल’ पर चल रहा है, जहाँ सेना सीधे तौर पर जिम्मेदारी लेने से बचती है ताकि आर्थिक विफलता का दोष राजनीतिक चेहरों पर मढ़ा जा सके। रियाद में हुए इस समझौते की रूपरेखा और शर्तें पूरी तरह से पाकिस्तानी सेना प्रमुख के निर्देशों पर तैयार की गई थीं।
सऊदी अरब जैसे संपन्न देश को आखिर पाकिस्तान जैसे आर्थिक रूप से कमजोर देश के साथ रक्षा संधि की क्या आवश्यकता पड़ी? इसका मुख्य कारण लाल सागर (Red Sea) की सुरक्षा से जुड़ा है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और तेल की आपूर्ति के रास्तों पर बढ़ते खतरों के कारण सऊदी अरब अपनी समुद्री सीमाओं को लेकर चिंतित है। सऊदी के पास धन और आधुनिक हथियार तो हैं, लेकिन उसे कठिन मोर्चों पर तैनाती के लिए एक अनुभवी और बड़ी पैदल सेना की आवश्यकता है। यह सहयोग पूरी तरह से रणनीतिक और व्यावहारिक जरूरतों पर आधारित एक सौदे जैसा है, जहाँ सऊदी अरब पाकिस्तान के सैन्य संसाधनों का उपयोग करना चाहता है।
क्या युद्ध की स्थिति में सऊदी अरब और तुर्की भारत के खिलाफ पाकिस्तान का साथ देंगे? इसका उत्तर व्यावहारिक रूप से ‘ना’ है। भारत आज विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है। किसी भी देश के लिए भारत जैसे विशाल बाजार और वैश्विक शक्ति से सीधा सैन्य टकराव मोल लेना आत्मघाती साबित होगा। भारत की आर्थिक और सामरिक हैसियत किसी भी बाहरी देश को पाकिस्तान के पक्ष में सीधे युद्ध में शामिल होने से रोकने के लिए पर्याप्त है।
भारत और सऊदी अरब के बीच संबंध वर्तमान में अपने स्वर्णिम युग में हैं। दोनों देशों के बीच वार्षिक व्यापार 50 अरब डॉलर से अधिक है। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस के विजन-2030 के लिए भारत एक अनिवार्य साझीदार है। रियाद कभी भी कर्ज में डूबे पाकिस्तान के लिए भारत जैसे विश्वसनीय और मजबूत आर्थिक पार्टनर को नाराज नहीं करना चाहेगा। सऊदी अरब की विदेश नीति हमेशा से ही संतुलित और अपने हितों को प्राथमिकता देने वाली रही है।
हालांकि, सीधे युद्ध की संभावना कम होने के बावजूद भारत के लिए तकनीकी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। तुर्की के आधुनिक ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को मजबूत कर सकती हैं। यदि इस समझौते के तहत पाकिस्तान को अत्याधुनिक हथियार मिलते हैं, तो भारत को अपनी सीमाओं पर एंटी-ड्रोन तकनीक और रक्षा प्रणालियों को और अधिक उन्नत करना होगा। साथ ही, तुर्की का भारत-विरोधी रुख कूटनीतिक मोर्चे पर कुछ चुनौतियां खड़ी कर सकता है, जिसका जवाब देने के लिए भारत पूरी तरह तैयार है।
भारत इस गठबंधन के जवाब में चुप नहीं बैठा है। भारतीय कूटनीति ने पश्चिम एशिया में अपने पैर काफी मजबूती से जमाए हैं। इजरायल और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ भारत के संबंध अब रणनीतिक साझेदारी में बदल चुके हैं। भारत और इजरायल के बीच रक्षा और खुफिया सूचनाओं का गहरा तालमेल है। इजरायल की उन्नत मिसाइल रक्षा प्रणाली भारत की सुरक्षा को किसी भी हवाई हमले से बचाने के लिए अभूतपूर्व कवच प्रदान करती है।
यूएई और ओमान जैसे देश भी भारत के महत्वपूर्ण सहयोगी बन चुके हैं। यूएई ने कई मौकों पर भारत के हितों का समर्थन किया है। भारत अब केवल एक दर्शक नहीं है, बल्कि अपनी स्वतंत्र और प्रभावी विदेश नीति के माध्यम से खुद ग्लोबल एजेंडा सेट कर रहा है। पश्चिम एशिया में भारत का बढ़ता प्रभाव पाकिस्तान की कूटनीतिक चालों को विफल करने के लिए पर्याप्त है।
भारत ने तुर्की और अन्य विरोधी शक्तियों को उन्हीं के क्षेत्र में घेरने की रणनीति अपनाई है। भारत ने आर्मेनिया और ग्रीस जैसे देशों के साथ अपने रक्षा संबंधों को नया विस्तार दिया है। आर्मेनिया को भारतीय पिनाका रॉकेट सिस्टम और अन्य रक्षा उपकरणों का निर्यात करना इस बात का सबूत है कि भारत अब रक्षा निर्यात में भी आक्रामक रुख अपना रहा है। भूमध्य सागर में भारतीय नौसेना की सक्रियता तुर्की को कड़ा संदेश देती है कि भारत अपनी सुरक्षा के लिए कहीं भी पहुंचने में सक्षम है।
सऊदी अरब के साथ आर्थिक जुड़ाव को और गहरा करने के लिए भारत ‘इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर’ (IMEC) जैसी परियोजनाओं पर तेजी से काम कर रहा है। एक बार यह कॉरिडोर शुरू हो जाने के बाद सऊदी अरब का आर्थिक भविष्य पूरी तरह से भारत से जुड़ जाएगा। वहीं पाकिस्तान के मामले में भारत ने उसे पूरी तरह नजरअंदाज करने की नीति अपनाई है। सिंधु जल संधि और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की घेराबंदी करके भारत ने उस पर निरंतर दबाव बनाए रखा है।
निष्कर्षतः, पाकिस्तान, सऊदी और तुर्की का यह रक्षा समझौता भारत की बढ़ती शक्ति के सामने बहुत प्रभावी नहीं होगा। इतिहास बताता है कि पाकिस्तान ऐसी संधियाँ अक्सर वित्तीय सहायता पाने के लिए करता रहा है। जहाँ पाकिस्तान अपनी सैन्य स्वायत्तता को गिरवी रख रहा है, वहीं भारत अपनी शर्तों पर वैश्विक शक्तियों के साथ संबंध बना रहा है। भारत का रक्षा तंत्र और कूटनीतिक ढांचा इतना सशक्त है कि वह इस प्रकार के किसी भी ‘इस्लामिक NATO’ के प्रभाव को विफल करने में सक्षम है। देश की सुरक्षा और सामरिक हित पूरी तरह सुरक्षित हैं और भारत हर चुनौती का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार है।

