ब्रिक्स समिट में भारत की इस चाल से चित हुए चीन और अमेरिका, जानिए पूरी कहानी

ब्रिक्स समिट में भारत की इस चाल से चित हुए चीन और अमेरिका, जानिए पूरी कहानी

वाशिंगटन के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के बंद कमरों में इन दिनों एक अजीब सी खामोशी और खौफ का माहौल है। अमेरिका के सबसे बड़े वित्तीय अधिकारियों और फेडरल रिजर्व के नीति निर्माताओं की नींद उड़ चुकी है। दुनिया पर सालों तक राज करने वाले अमेरिकी डॉलर साम्राज्य की नींव अचानक हिलने लगी है। और यह सब किसी मिसाइल हमले या युद्ध की धमकी से नहीं हुआ है, बल्कि भारत के एक बेहद खामोश लेकिन घातक वित्तीय मास्टरस्ट्रोक से हुआ है। आखिर भारत का डिजिटल रुपया और डॉलर ब्रिज ऐसा कौन सा साइलेंट किलर बन चुका है, जिससे बिना एक भी गोली चलाए पूरा पश्चिमी बैंकिंग सिस्टम धाराशायी होने की कगार पर आ खड़ा हुआ है। क्या ब्रिक्स में अपनी कोई नई करेंसी आने वाली है या फिर दुनिया की आंखों में बहुत बड़ा धूल झोंका जा रहा है। रूस और ईरान ब्रिक्स समिट में ऐसा कौन सा आर्थिक परमाणु बम फोड़ने वाले थे जिससे पूरा सिस्टम तबाह हो जाता और प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने ऐन मौके पर ऐसी कौन सी चाल चली कि अमेरिका भी हैरान रह गया और रूस तथा ईरान का दांव भी पलट गया। आज हम उस सच से पर्दा उठाएंगे जो दुनिया का कोई भी सेंट्रल बैंक आपको खुलकर कभी नहीं बताएगा। क्या आपने कभी सोचा है कि अगर कल सुबह डॉलर का प्रभुत्व गिर गया तो आपकी जेब, आपके बैंक बैलेंस और भारत में पेट्रोल डीजल की कीमतों पर इसका क्या सीधा असर होगा।

दुनिया पिछले कुछ सालों में इतनी तेजी से बदली है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था अब एक बड़े ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी हो चुकी है। इस साल भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। इस महासम्मेलन में दुनिया के बड़े राष्ट्राध्यक्षों के आने की प्रबल संभावना है। लेकिन यह कोई आम कूटनीतिक बैठक नहीं है। जब से ब्रिक्स का महाविस्तार हुआ है और इसमें नए देश आधिकारिक तौर पर शामिल हुए हैं, तब से यह समूह विश्व आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से और वैश्विक जीडीपी के एक बड़े भाग का प्रतिनिधित्व कर रहा है। सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों के आने से पेट्रोडॉलर की मौत का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। एक समय था जब अरब देश केवल डॉलर में ही तेल बेचते थे, लेकिन अब समीकरण बदल रहे हैं। इस शिखर सम्मेलन से ठीक पहले कई बड़े और खतरनाक सवाल उठ खड़े हुए हैं। क्या ब्रिक्स अमेरिकी डॉलर के दबदबे को पूरी तरह खत्म कर पाएगा। क्या चीन इस शक्तिशाली संगठन का इस्तेमाल अपनी खतरनाक वैश्विक महत्वाकांक्षाओं के लिए कर रहा है। और सबसे बड़ा सवाल यह कि ईरान की एक नई पेमेंट सिस्टम की आक्रामक मांग के बीच भारत इस पूरी भू राजनीतिक बिसात पर अपना संतुलन कैसे साधेगा।

डॉलर के आधिपत्य और उसे मिलने वाली चुनौती को समझने के लिए हमें गहराई में जाना होगा। जानकारों के मुताबिक अमेरिकी डॉलर पिछले कई दशकों से वैश्विक व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणालियों यानी स्विफ्ट की रीढ़ रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में अमेरिका ने डॉलर को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से अब दुनिया भर में डी डॉलराइजेशन यानी डॉलर पर निर्भरता कम करने की बहस बहुत तेज हो गई है। लेकिन यह भी साफ है कि डॉलर को रातों रात चुनौती देना इतना आसान नहीं है। अमेरिका के राजनीतिक चेहरों और रणनीतिकारों ने पहले ही ब्रिक्स देशों को सीधे तौर पर टैरिफ और भयानक आर्थिक प्रतिबंधों की चेतावनी दी है। दुनिया के कुल फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व का एक बड़ा हिस्सा आज भी अमेरिकी डॉलर में सुरक्षित है और वैश्विक व्यापारिक चालान का भारी हिस्सा पूरी तरह डॉलर पर निर्भर है। ऐसे में ब्रिक्स डॉलर के आधिपत्य को तुरंत खत्म तो नहीं कर सकता लेकिन एक मल्टी करेंसी वर्ल्ड की शुरुआत जरूर कर सकता है और यह प्रक्रिया आने वाले वर्षों में दुनिया का पूरा नक्शा बदल कर रख देगी।

लेकिन इसी बीच पर्दे के पीछे एक बहुत बड़ा खेल चल रहा था। ब्रिक्स के नाम पर चीन पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपना आर्थिक गुलाम बनाने की साजिश रच रहा था। चीन की असली रणनीति ब्रिक्स को डॉलर मुक्त करने की कम और युआन निर्भर बनाने की ज्यादा थी। इसे कूटनीतिक भाषा में चीन का युआन ट्रैप कहा जाता है। चीन बहुत चालाकी से यह चाहता था कि रूस, ब्राजील और भारत जैसे देश स्विफ्ट सिस्टम का विकल्प खोजने के नाम पर चीन के अपने पेमेंट नेटवर्क का उपयोग करें और सारा अंतरराष्ट्रीय व्यापार चीनी मुद्रा युआन में होने लगे। चीन ब्रिक्स को अमेरिका और पश्चिमी देशों के खिलाफ एक रणनीतिक हथियार के रूप में विकसित करना चाहता है ताकि वह अपने ट्रेड वॉर और अन्य भू राजनीतिक मुद्दों पर अमेरिका को घेर सके। इतना ही नहीं, चीन अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को ब्रिक्स के जरिए नए वित्तीय तंत्र से जोड़कर छोटे देशों को हमेशा के लिए कर्ज के जाल में फंसाना चाहता है।

लेकिन चीन की इस खतरनाक साजिश की रातों रात धज्जियां उड़ गईं। और यह किया भारत के एक सीक्रेट प्रपोजल ने। भारत चीन के इस मंसूबे को बहुत अच्छी तरह से समझता था। भारत ने मल्टी सीबीडीसी काउंटर अटैक से चीन के पूरे गेम प्लान को ही पलट कर रख दिया। भारत ने कॉमन ब्रिक्स करेंसी या युआन आधारित सिस्टम के विचार को पूरी तरह से सिरे से खारिज कर दिया। भारत ने दुनिया के सामने एक ऐसा मल्टी सीबीडीसी डिजिटल रुपया ब्रिज का प्रपोजल रखा जो एक बिल्कुल न्यूट्रल सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर है। भारत का संदेश बिल्कुल साफ था, इस नए पेमेंट नेटवर्क में किसी एक देश की करेंसी का दबदबा नहीं होगा, न डॉलर का और न ही युआन का। सभी देश अपनी अपनी लोकल करेंसी में व्यापार करेंगे। इसी कदम से चीन का वह सपना टूट गया जिसमें वह युआन को दुनिया की नई रिजर्व करेंसी बनाना चाहते थे।

अब जरा सोचिए कि वाशिंगटन में अमेरिकी फेडरल रिजर्व और ट्रेजरी की असली घबराहट क्या है। अमेरिका को डॉलर की वैल्यू गिरने से उतना डर नहीं लगता जितना इस बात से लगता है कि अगर ब्रिक्स देश स्विफ्ट से बाहर निकलकर अपनी अपनी करेंसी में सेटलमेंट करने लगे तो अमेरिका दुनिया भर के वित्तीय लेनदेन पर अपनी निगरानी की ताकत हमेशा के लिए खो देगा। अभी अगर कोई भी दो देश डॉलर में व्यापार करते हैं तो वह पैसा किसी न किसी अमेरिकी बैंक के सर्वर से होकर गुजरता है। इसी निगरानी के दम पर अमेरिका अपनी प्रतिबंध लगाने की ताकत का इस्तेमाल करता है और किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को ब्लॉक कर देता है। लेकिन भारत का जो नया डिजिटल ब्रिज प्लान है वह ब्लॉकचेन तकनीक पर आधारित है। इसमें अमेरिका को भनक तक नहीं लगेगी कि कब भारत ने रूस को पैसा भेजा और कब वहां से तेल का जहाज निकल गया। अमेरिका का यह सबसे बड़ा डर है कि उसका वित्तीय रडार सिस्टम अब कमजोर होने वाला है।

इस पूरे खेल में ईरान और रूस का अपना एक अलग एजेंडा चल रहा है। ब्रिक्स के नए सदस्य ईरान का रुख नए पेमेंट सिस्टम को लेकर सबसे ज्यादा आक्रामक है। अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से ईरान की अर्थव्यवस्था प्रभावित है। इसलिए ईरान चाहता है कि ब्रिक्स तुरंत एक ऐसा सर्वसमावेशी, गैर डॉलर और गैर पश्चिम पेमेंट नेटवर्क बनाए जो अमेरिकी ट्रेजरी के किसी भी प्रतिबंध से पूरी तरह बाहर हो। ईरान ने पेमेंट सिस्टम को जल्द से जल्द लागू करने और डिजिटल करेंसी को भारी बढ़ावा देने की वकालत की है। रूस और ईरान ब्रिक्स को अमेरिका के खिलाफ एक खुले आर्थिक मोर्चे की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं। रूस और ईरान इसे पूरी तरह एंटी वेस्ट कैंपेन बनाना चाहते हैं।

यहीं पर भारत की विदेश नीति और प्रधानमंत्री मोदी सरकार का कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक सामने आता है। भारत किसी भी एंटी वेस्ट कैंपेन का हिस्सा नहीं बनना चाहता। भारत ने इस पूरे फोरम को पश्चिम विरोधी बनने से रोककर इसे केवल गैर पश्चिमी बनाए रखा है। भारत के लिए यह संतुलन साधना बहुत जरूरी है क्योंकि भारत को अमेरिका और यूरोप के साथ अपनी मजबूत आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को भी सुरक्षित रखना है। साथ ही भारत को अपनी शर्तों पर व्यापार भी करना है। लेकिन भारत के लिए ईरान भी रणनीतिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान से भारत की ऊर्जा सुरक्षा और पूरे मध्य एशिया तक कनेक्टिविटी के अहम मुद्दे जुड़े हुए हैं। ऐसे में भारत ने एक ऐसा रास्ता निकाला जिससे रूस और ईरान का काम भी हो जाए, अमेरिका नाराज भी न हो और चीन का युआन भी कंट्रोल में रहे। यह रास्ता है भारत का डॉलर ब्रिज प्लान।

आइए आसान भाषा में समझते हैं कि यह डॉलर ब्रिज प्लान या मल्टी सीबीडीसी ब्रिज आखिर काम कैसे करेगा। भारत चाहता है कि ब्रिक्स देशों के अपने अपने डिजिटल पेमेंट सिस्टम तकनीकी रूप से आपस में सीधे जुड़ जाएं। इससे भारत, चीन, रूस, ब्राजील और अन्य देश एक दूसरे के साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार में सीधे अपनी स्थानीय करेंसी में भुगतान कर सकेंगे। मान लीजिए भारत की एक कंपनी रूस से कच्चा तेल खरीदती है। पुरानी व्यवस्था में इस भुगतान को पहले डॉलर में बदलने और फिर अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग चैनल के जरिए भेजने की जरूरत पड़ती है। इसमें एक्सचेंज फीस लगती है, समय लगता है और अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा हमेशा सिर पर मंडराता रहता है। लेकिन भारत के नए सिस्टम में भारतीय कंपनी अपना भुगतान सिर्फ रुपये में करेगी। यह डिजिटल रुपया उस मल्टी सीबीडीसी ब्रिज नेटवर्क में जाएगा और ब्लॉकचेन तकनीक के जरिए वह रकम तुरंत दूसरी करेंसी में बदलकर सीधी संबंधित कंपनी के खाते में पहुंच जाएगी। यानी रुपया डिजिटल पेमेंट नेटवर्क में जाएगा और वहां से स्थानीय मुद्रा बनकर बाहर निकलेगा।

इस प्रक्रिया में डॉलर बीच में कहीं आएगा ही नहीं। जब चीन भारत से कुछ इंपोर्ट करेगा तो वह अपनी करेंसी में पेमेंट करेगा लेकिन वह डिजिटल ब्रिज से गुजरकर भारत के निर्यातक को सीधे भारतीय रुपये में मिलेगा। इसका मतलब है कि न तो हमें डॉलर खरीदने की जरूरत पड़ेगी और न ही हमें किसी अन्य मुद्रा का स्टॉक रखना पड़ेगा। अलग अलग देशों की करेंसी और बैंकिंग प्रणालियां अभी सीधे आपस में जुड़ी नहीं हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कारोबार में डॉलर एक तरह की कॉमन भाषा बन जाता है। इस कॉमन भाषा की वजह से बैंक शुल्क, मुद्रा बदलने की भारी लागत और भुगतान में लगने वाला लंबा समय व्यापार को मुश्किल बनाता है।

लेकिन भारत डॉलर से दूरी क्यों बनाना चाहता है, यह समझना हर भारतीय के लिए बहुत जरूरी है। भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा दुनिया के अलग अलग देशों से इंपोर्ट करता है। जब भी पश्चिम एशिया में युद्ध या तनाव बढ़ता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो भारत को तेल खरीदने के लिए अपने खजाने से ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। जब बाजार में डॉलर की डिमांड बढ़ती है तो भारतीय रुपये पर भारी दबाव पड़ता है और रुपया कमजोर होने लगता है। रुपये के कमजोर होने से भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने लगती हैं और आम आदमी की जेब पर महंगाई की सीधी मार पड़ती है। लेकिन अगर ब्रिक्स देशों के साथ हमारा ज्यादातर व्यापार स्थानीय करेंसी में होने लगे तो हर लेनदेन के लिए हमें बाजार से डॉलर जुटाने की जरूरत बहुत कम हो जाएगी। हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर सुरक्षित रहेगा और हमारा रुपया अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत होगा। यही भारत के इस ऐतिहासिक प्रस्ताव की सबसे बड़ी आर्थिक वजह है।

रूस और चीन जैसे देशों के लिए भी इस नए सिस्टम में बहुत बड़ा फायदा छिपा है। रूस पर पश्चिमी देशों ने कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं, जिसके कारण उसके लिए पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था का इस्तेमाल करना लगभग असंभव हो गया है। दूसरी तरफ चीन भी अमेरिका के साथ चल रहे ट्रेड वॉर के कारण डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था पर अपनी निर्भरता तेजी से कम करना चाहता है। अगर ब्रिक्स देशों के डिजिटल भुगतान नेटवर्क आपस में जुड़ते हैं तो बड़े देशों के बीच कारोबार के लिए एक सुरक्षित और वैकल्पिक भुगतान का रास्ता तैयार हो जाएगा जिसे दुनिया की कोई भी पश्चिमी ताकत ब्लॉक नहीं कर पाएगी।

तो क्या ब्रिक्स अपनी कोई नई करेंसी बनाने जा रहा है। इसका सीधा जवाब है नहीं। भारत के प्रस्ताव का मतलब कोई नई ब्रिक्स करेंसी लॉन्च करना बिल्कुल नहीं है। इसे ऐसे समझिए कि आपके पास भारतीय रुपये हैं और दूसरे व्यक्ति के पास कोई दूसरी करेंसी है। आप दोनों को अपनी करेंसी बदलकर किसी तीसरी नई करेंसी में जाने की कोई जरूरत नहीं है। बल्कि एक ऐसा मजबूत डिजिटल सिस्टम हो जो आपके रुपये के भुगतान को सुरक्षित तरीके से सामने वाले तक पहुंचा दे। यानी करेंसी वही रहेगी बस पेमेंट का सिस्टम बदल जाएगा। यही भारत के इस प्रस्ताव की सबसे बड़ी और अनोखी बात है। इस प्रस्ताव में मल्टी सीबीडीसी ब्रिज यानी अलग अलग देशों की सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी सिस्टम को आपस में जोड़ने का स्पष्ट जिक्र है।

जिस डिजिटल रुपये या यूपीआई को आप अपने मोबाइल फोन में एक साधारण ऐप समझते हैं, क्या वह असल में अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम को उखाड़ फेंकने का भारत का सबसे बड़ा और गुप्त हथियार है। बिल्कुल। इसे ऐसे समझिए जैसे भारत का यूपीआई और किसी दूसरे देश का फास्ट पेमेंट सिस्टम तकनीकी रूप से आपस में जुड़ जाए। भुगतान बिना किसी देरी के लगभग तुरंत हो सकेगा और दोनों पक्षों को एक ही समय पर रकम मिल जाएगी। इससे अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में बिचौलियों की संख्या खत्म होगी, भुगतान का समय बचेगा और लेनदेन की भारी लागत कम होगी। अगर यह सिस्टम पूरी तरह से सफल होता है तो ब्रिक्स देशों के साथ कारोबार करने वाले भारतीय एक्सपोर्टर, इंपोर्टर, तेल कंपनियां और एमएसएमई सेक्टर को सबसे बड़ा लाभ होगा। यह भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक बहुत मजबूत स्थिति में ला खड़ा करेगा।

भारत का यह डॉलर ब्रिज या मल्टी करेंसी पेमेंट सिस्टम का प्रपोजल वास्तव में एक ऐसा कूटनीतिक और आर्थिक मास्टरस्ट्रोक है जिसकी गूंज आने वाले दशकों तक पूरी दुनिया में सुनाई देगी। इसके जरिए भारत न सिर्फ अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से सुरक्षित कर रहा है, बल्कि जियोपॉलिटिकल बिसात पर दुनिया की बड़ी शक्तियों को अपनी उंगलियों पर संतुलित भी कर रहा है। गहरी रिसर्च और रणनीतिक विश्लेषण के अनुसार, भारत ने इस एक अकेले कदम से जो कई बड़े निशाने साधे हैं, वे भारत की बढ़ती ताकत का सबसे बड़ा प्रमाण हैं।

पहला बड़ा निशाना है चीन की मुद्रा को दुनिया पर थोपने की चालाक चाल को पूरी तरह नाकाम करना। चीन की लंबे समय से यह कोशिश थी कि ब्रिक्स देश सारा व्यापार चीनी मुद्रा में करें। लेकिन भारत ने इस विचार को मंच पर ही ध्वस्त कर दिया। भारत ने डंके की चोट पर कहा कि हम सब अपनी अपनी लोकल करेंसी में व्यापार करेंगे। इस तकनीकी ब्रिज से चीन का यह घमंड टूट गया कि उसकी मुद्रा ग्लोबल साउथ में डॉलर की जगह ले लेगी।

दूसरा निशाना है देश के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की भारी बचत और भारतीय रुपये की ऐतिहासिक मजबूती। भारत को तेल आयात के लिए हर साल अरबों का भुगतान करना पड़ता है। अगर बड़े तेल उत्पादक देशों के साथ ऊर्जा का व्यापार सीधे रुपये और उनकी लोकल करेंसी में होने लगे, तो भारत को अपना बेशकीमती डॉलर खर्च नहीं करना पड़ेगा। इससे विदेशी मुद्रा भंडार का खजाना सुरक्षित रहेगा और रुपया ग्लोबल मार्केट में अपनी धाक जमाएगा।

तीसरा निशाना है ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए अमेरिकी प्रतिबंधों को बड़ी ही चतुराई से चकमा देना। अमेरिका ने कुछ देशों पर भयानक आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं और पश्चिमी देशों का सिस्टम इनके लिए पूरी तरह बंद है। लेकिन भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को सस्ता तेल हर हाल में चाहिए। ब्रिक्स के इस नए मल्टी सीबीडीसी पेमेंट नेटवर्क का इस्तेमाल करने से अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के बीच में कोई अमेरिकी बैंक या डॉलर आएगा ही नहीं। इस तरह भारत बिना किसी प्रतिबंध का सीधा उल्लंघन किए, बेरोकटोक व्यापार कर सकेगा और अमेरिका चाहकर भी कोई उंगली नहीं उठा पाएगा।

चौथा सबसे बड़ा निशाना है भारत के यूपीआई और डिजिटल रुपये का पूरी दुनिया में डंका बजाना। भारत आज डिजिटल पेमेंट और फिनटेक के मामले में पूरी दुनिया का निर्विवाद अगुआ बन चुका है। भारत इस प्रस्ताव के जरिए अपने सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी ई रुपये और यूपीआई जैसे शानदार ढांचे को दुनिया के क्रॉस बॉर्डर पेमेंट का ग्लोबल स्टैंडर्ड बनाना चाहता है। अगर यह प्रयोग ब्रिक्स में पूरी तरह सफल रहा, तो पूरा का पूरा ग्लोबल साउथ, जिसमें अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के दर्जनों देश शामिल हैं, वे पश्चिमी सिस्टम को छोड़कर भारत के इस फिनटेक ढांचे को खुशी खुशी अपना लेंगे। यह भारत की सॉफ्ट पावर और टेक्नोलॉजिकल पावर की सबसे बड़ी जीत होगी।

और पांचवा, सबसे अहम रणनीतिक निशाना है पश्चिमी देशों से बिना कोई दुश्मनी मोल लिए दुनिया में अपनी एक ताकतवर और न्यूट्रल छवि बनाए रखना। कई देश मिलकर ब्रिक्स को एक एंटी वेस्ट और एंटी डॉलर गठबंधन बनाकर सीधा युद्ध लड़ना चाहते हैं। लेकिन भारत की कूटनीति बहुत साफ है। भारत ने अमेरिका और यूरोप के साथ अपने मजबूत व्यापारिक रिश्ते दांव पर नहीं लगाए। सरकार ने इस पूरे सिस्टम को किसी देश के खिलाफ एक घातक हथियार के रूप में पेश करने के बजाय, इसे सिर्फ एक तकनीकी और आर्थिक सहूलियत के रूप में दुनिया के सामने रखा है। इससे भारत का कूटनीतिक काम भी निकल रहा है, देश को आर्थिक फायदा भी हो रहा है और अमेरिका को भारत से कोई सीधी शिकायत करने का मौका भी नहीं मिल रहा है। भारत यह सुनिश्चित कर रहा है कि ब्रिक्स पर किसी भी सूरत में किसी एक देश का वर्चस्व न हो और इस संगठन के सभी अहम फैसले केवल सर्वसम्मति से ही लिए जाएं।

ब्रिक्स समिट में भारत के सामने यह एक सदी का सबसे बड़ा अवसर है। भारत के लिए अध्यक्षता का यह मौका सिर्फ बैठकों तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली का सीधा और स्पष्ट लक्ष्य यह होना चाहिए कि ब्रिक्स को अमेरिका विरोधी अखाड़ा बनाने के बजाय एक ऐसा मजबूत आर्थिक मंच बनाया जाए जो विकासशील देशों को सही मायनों में एक सुरक्षित विकल्प दे। अगर आने वाले समय में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार तेजी से बढ़ता है, डिजिटल पेमेंट सिस्टम आपस में जुड़ जाते हैं, और सदस्य देशों के बीच सप्लाई चेन बेहतर होती है, तो डॉलर की वैश्विक भूमिका पर धीरे धीरे लेकिन बेहद भारी दबाव पड़ना तय है। ऐसे में नई दिल्ली में होने वाले इस ऐतिहासिक ब्रिक्स महासम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।

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