ग्लोबल पावर का नक्शा अब हमेशा के लिए बदल चुका है। वाशिंगटन और लंदन के पुराने हुक्मरान आज बेबस होकर देख रहे हैं। दुनिया का नया आर्थिक गुरुत्वाकर्षण अब नई दिल्ली की तरफ तेजी से झुक रहा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की सबसे बड़ी टेबल पर बैठने के लिए तीन देश अचानक इतने लाचार क्यों हो गए हैं। एक मुल्क पाकिस्तान तो अपने खजाने से 580 मिलियन डॉलर्स झोंककर पिछले दरवाजे से घुसने की फिराक में है। दूसरा मुल्क तुर्किये नाटो की वर्दी पहनकर भी गैर-पश्चिमी दुनिया का सुल्तान बनने का ढोंग कर रहा है। और क्यों तीसरा पड़ोसी बांग्लादेश भारत के 101 समझौतों को फाड़ने की धमकी देकर अगले ही पल दिल्ली के दरवाजे पर न्योते के लिए गिड़गिड़ा रहा है। इन तीनों के पीछे सिर्फ एक सच छिपा है और उस सच का नाम है 2026 का नया, आक्रामक और रणनीतिक रूप से आत्मनिर्भर भारत।
ब्रिक्स 2026 का बिगुल बज चुका है और पूरी दुनिया में इस संगठन की ताकत का डंका बज रहा है। भारत की मजबूत अगुवाई में ब्रिक्स अब दुनिया का सबसे बड़ा पावर सेंटर बन चुका है। पश्चिमी देशों का जी7 अब इस नई ताकत के सामने फीका पड़ता दिख रहा है। तस्वीर एकदम साफ है। ब्रिक्स के मूल पांच स्तंभ ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका रहे हैं। पिछले विस्तार में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और यूएई जैसे ताकतवर खिलाड़ी इसमें शामिल हुए। आज ब्रिक्स दुनिया की करीब 49 प्रतिशत आबादी को समेटे हुए है। अगर बात परचेजिंग पावर पैरिटी की करें, तो यह संगठन दुनिया की 40 प्रतिशत से ज्यादा जीडीपी को कंट्रोल करता है। इस आर्थिक महाशक्ति के साथ भारत का कारोबार भी रिकॉर्ड तोड़ रहा है। ब्रिक्स सदस्यों को भारत का एक्सपोर्ट 49 प्रतिशत बढ़कर 65 बिलियन डॉलर से सीधे 96 बिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका है ।
जब ताकत इतनी बड़ी हो तो दुनिया का हर देश इस कतार में खड़ा होना चाहेगा। ताजा रिपोर्ट्स बताती हैं कि कम से कम 29 मुल्कों ने ब्रिक्स में एंट्री के लिए अपनी अर्जियां लगा रखी हैं। लेकिन इस कतार में सबसे ज्यादा छटपटाहट, बेचैनी और हताशा तीन चेहरों पर दिख रही है। ये तीन चेहरे हैं पाकिस्तान, तुर्किये और बांग्लादेश। इन तीनों को लगता था कि वे चीन का पल्लू पकड़कर या मजहबी नारों की आड़ लेकर इस ग्लोबल क्लब में दाखिल हो जाएंगे। लेकिन इनके रास्ते में हिमालय जैसी अडिग दीवार खड़ी है और वह दीवार है भारत की दो-टूक ना। ब्रिक्स का सबसे कड़ा नियम यही है कि नए सदस्य के लिए सभी मौजूदा देशों की पूर्ण सहमति अनिवार्य है। यानी भारत का एक अकेला वीटो किसी की भी एंट्री पर ताला लगा सकता है। भारत ने अपने इसी रणनीतिक वीटो का ऐसा प्रहार किया है कि इन तीनों देशों के मंसूबे धूल में मिल चुके हैं।
सबसे पहले बात करते हैं उस मुल्क की जो पिछले तीन साल से ब्रिक्स की चौखट पर नाक रगड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं पाकिस्तान की। पाकिस्तान ने साल 2023 में ब्रिक्स में शामिल होने के लिए हाथ-पैर मारने शुरू किए थे। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने बड़ी मासूमियत से दावा किया था कि पाकिस्तान ग्लोबल साउथ का अहम हिस्सा है। रूस में पाकिस्तान के राजदूत ने तो रूसी न्यूज एजेंसी को इंटरव्यू देकर खुलेआम मदद की गुहार लगाई थी। चीन ने पर्दे के पीछे से अपने इस सदाबहार मोहरे को अंदर खींचने की हर चाल चली। चीन चाहता था कि पाकिस्तान ब्रिक्स में आकर बैठे ताकि वह मंच को भारत के खिलाफ विवादों का अखाड़ा बना सके।
लेकिन साउथ ब्लॉक में बैठी भारतीय लीडरशिप ने चीन और पाकिस्तान के इस खेल को पहले ही भांप लिया था। भारत ने ब्रिक्स की बैठकों में ऐसा ठोस रुख रखा कि रूस और चीन भी बगलें झांकने लगे। भारत ने दो-टूक शब्दों में नए सदस्यों के चयन के नियम तय करवा दिए। नियम साफ था कि मेंबर वही बनेगा जिसकी अपनी मजबूत आर्थिक साख हो, जो ग्लोबल सप्लाई चेन को मजबूती दे और सबसे जरूरी जो आतंकवाद की फैक्ट्री न चलाता हो। पाकिस्तान की असलियत यह है कि वहां की जीडीपी ग्रोथ रेट 3.70 प्रतिशत के आसपास रेंग रही है। देश पर 130 बिलियन डॉलर से ज्यादा का विदेशी कर्ज लदा हुआ है और वह 24 बार आईएमएफ के सामने झोली फैला चुका है। जहां अवाम को आटा और बिजली नसीब नहीं हो रहा वह मुल्क ब्रिक्स जैसी हाई-टेबल पर बैठने का ख्वाब देख रहा था।
पाकिस्तान की असली नीयत तब बेनकाब हुई जब एक रिपोर्ट सामने आई कि उसने न्यू डेवलपमेंट बैंक में 580 मिलियन डॉलर की हिस्सेदारी खरीदने की चाल चली। पाकिस्तान का मकसद साफ था। वह आईएमएफ की कड़ी शर्तों से बचना चाहता था और पिछले दरवाजे से सस्ता कर्ज निकालना चाहता था। लेकिन भारत ने साफ कर दिया कि जो देश एफएटीएफ की ग्रे-लिस्ट में रहकर दुनिया भर में बेइज्जत हो चुका हो उसे ब्रिक्स में घुसने नहीं दिया जाएगा। भारत के कड़े विरोध ने पाकिस्तान के दांव पर पानी फेर दिया।
अब आइए तुर्किये और उसके राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन पर। तुर्किये दुनिया के सबसे बड़े पश्चिमी सैन्य संगठन नाटो का पक्का सदस्य है। तुर्किये की जमीन पर अमेरिका के न्यूक्लियर हथियार तैनात हैं। इसके बावजूद 2024 में एर्दोगन ने ब्रिक्स की पूर्ण सदस्यता के लिए अर्जी लगा दी। एर्दोगन नाटो में रहकर यूरोप को ब्लैकमेल करना चाहते थे और ब्रिक्स में घुसकर विकासशील मुल्कों का मसीहा बनना चाहते थे। लेकिन एर्दोगन यह भूल गए कि भारत के खिलाफ साजिशें रचने का अंजाम क्या होता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा हो या ओआईसी की बैठकें एर्दोगन ने बार-बार कश्मीर के खिलाफ जहर उगला। तुर्किये ने पाकिस्तान की नौसेना के लिए जंगी जहाज बनाए और घातक ड्रोन तकनीक सौंपी।
2026 का भारत कूटनीति में जवाब उसी भाषा में देता है जो सामने वाले को समझ आए। भारत ने तुर्किये के अहंकार को चकनाचूर करने के लिए एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला जिसने अंकारा के होश उड़ा दिए। भारत ने तुर्किये के सबसे बड़े दुश्मनों ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया के साथ एक अभूतपूर्व रणनीतिक गठजोड़ बना लिया। तुर्किये की हेकड़ी निकालने के लिए भारत ने आर्मेनिया को अपने स्वदेशी हथियारों से लैस करना शुरू कर दिया। भारत ने आर्मेनिया को 250 मिलियन डॉलर से ज्यादा के रक्षा सौदों के तहत स्वदेशी पिनाका रॉकेट सिस्टम, स्वाति वेपन लोकेटिंग रडार, 155 एमएम की अटाग्स तोपें और आकाश एयर डिफेंस मिसाइलें सप्लाई कर दीं। जब एर्दोगन ब्रिक्स के दरवाजे पर पहुंचे तो भारत ने पूछा कि जो देश खुद नाटो का सदस्य है वह उस संगठन का सदस्य कैसे बन सकता है जो पश्चिमी एकाधिकार को चुनौती देने के लिए बना है। नतीजा यह हुआ कि तुर्किये बाहर खड़ा तमाशा देख रहा है।
अब बात उस ड्रामे की जो हमारे पड़ोस बांग्लादेश में खेला जा रहा है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और तारिक रहमान को लगा कि वे भारत को ब्लैकमेल कर सकते हैं। बीएनपी के नेताओं ने सरेआम धमकी दी कि बांग्लादेश की नई सरकार भारत के साथ हुए सभी 101 समझौतों की समीक्षा कर रही है। उनका इशारा चट्टोग्राम और मोंगला बंदरगाहों के इस्तेमाल को रोकने की तरफ था। लेकिन इसी के साथ उन्होंने रोना रोया कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में उन्हें आमंत्रित क्यों नहीं किया गया। यह पाखंड की इंतेहा है। एक तरफ आप भारत के 101 समझौतों को रद्दी में फेंकने की धौंस देते हैं और दूसरी तरफ उम्मीद करते हैं कि भारत आपके लिए रेड कार्पेट बिछाएगा।
बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का रिमोट कंट्रोल भारत के हाथ में है। बांग्लादेश के शहरों को रोशन रखने के लिए झारखंड के गोड्डा से 1600 मेगावाट बिजली और त्रिपुरा से 1160 मेगावाट बिजली सप्लाई होती है। फ्रेंडशिप पाइपलाइन से हर साल एक मिलियन मीट्रिक टन डीजल जाता है। कपड़ा उद्योग के लिए कच्चा कपास और आम जनता की रसोई का राशन भारत से जाता है। भारत ने बंदरगाहों का विकल्प भी तैयार कर लिया है। म्यांमार के रास्ते कलादान प्रोजेक्ट और सिलीगुड़ी कॉरिडोर का अपग्रेडेशन हो चुका है।
खुफिया सूत्रों के मुताबिक रावलपिंडी, अंकारा और ढाका का एक खतरनाक त्रिकोण उभरने की कोशिश कर रहा था जो भारत की घेराबंदी का सपना देख रहा था। कराची से चटगांव डायरेक्ट शिपिंग शुरू हुई। लेकिन भारत के कड़े रुख ने इस खेल को तहस नहस कर दिया। भारत ने ढाका को चेतावनी दे दी कि अगर 1971 के गुनहगारों को फिर से पैर पसारने दिए गए तो भारत इसे अपनी रेड लाइन मानेगा। भारत ने स्पष्ट कर दिया कि 1996 की गंगा जल संधि और बॉर्डर ट्रेड पर भारत सख्त कदम उठा सकता है।





