शुरुआत करते हैं एक ऐसे सनसनीखेज खुलासे से, जिसने वॉशिंगटन से लेकर लंदन तक के राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। पश्चिमी मीडिया यह नैरेटिव सेट करने में पूरी तरह जुटा था कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत दौरा केवल हथियारों की बिक्री तक सीमित है। लेकिन पर्दे के पीछे जो हुआ, उसने दशकों पुराने खरीदार और विक्रेता के रिश्ते को हमेशा के लिए दफन कर दिया है। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि खेल पूरी तरह पलट चुका है। आज सिर्फ भारत रूस से हथियार नहीं ले रहा, बल्कि रूस अपनी पांचवीं पीढ़ी की सैन्य ताकत और सबसे खतरनाक फाइटर जेट्स के लिए भारत की मिसाइल टेक्नोलॉजी और एडवांस स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक्स पर निर्भर होने जा रहा है।
इस महा-रणनीति की असली पटकथा किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में एससीओ समिट के दौरान लिखी गई थी। प्रोटोकॉल को दरकिनार करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पुतिन एक ही बुलेटप्रूफ लिमोजिन में सवार हुए। उस चालीस मिनट की सीक्रेट बातचीत ने अगले ग्यारह दिनों का पूरा रोडमैप तय कर दिया। संदेश बिल्कुल साफ था कि भारत अपनी स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी से कभी कॉम्प्रोमाइज नहीं करेगा। जब ग्यारह सितंबर को पुतिन पालम एयरपोर्ट पर उतरे, तो फाइलों में दर्ज समझौते सिर्फ डिफेंस डील्स नहीं, बल्कि नए वर्ल्ड ऑर्डर का ब्लूप्रिंट थे।
ब्रह्मोस-एनजी और रूस की नई मजबूरी
इस दौरे का सबसे बड़ा सीक्रेट मिशन था ब्रह्मोस-एनजी। रक्षा विश्लेषक इस बात से हैरान हैं कि रूस को अचानक भारत की इस सुपरसोनिक मिसाइल की इतनी सख्त जरूरत क्यों पड़ गई? इतिहास गवाह है कि ब्रह्मोस भारत के डीआरडीओ और रूस का ज्वाइंट वेंचर रहा है। पहले इसका पैंसठ परसेंट हिस्सा रूस से आता था। लेकिन पिछले सात सालों में गेम पूरी तरह पलट चुका है। भारत ने मात्र सत्रह ग्राम की स्वदेशी जी3ओएम नेविगेशन चिप तैयार कर ली, जो जीपीएस, ग्लोनास और भारत के नाविक सिस्टम पर एक साथ काम करती है। आज ब्रह्मोस में अस्सी परसेंट से ज्यादा कलपुर्जे पूरी तरह मेड इन इंडिया हैं।
रूस की यह मजबूरी यूक्रेन के युद्धक्षेत्र से पैदा हुई है। वहां नाटो के एयर डिफेंस सिस्टम्स ने साबित कर दिया कि पुरानी मिसाइलें आसानी से इंटरसेप्ट हो सकती हैं। दूसरी तरफ रूस की भारी मिसाइलें इतनी विशालकाय हैं कि उन्हें तेजी से तैनात करना मुश्किल है। यहीं पर ब्रह्मोस-एनजी एक अचूक ब्रह्मास्त्र बनकर सामने आई है। इसका वजन मात्र एक दशमलव दो टन है, लेकिन स्पीड मैक साढ़े तीन यानी तैंतालीस सौ किलोमीटर प्रति घंटा है। इसका रडार क्रॉस सेक्शन इतना छोटा है कि यह रडार पर लगभग अदृश्य रहती है।
सबसे बड़ा ट्विस्ट यह है कि रूस के पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर सुखोई-57 फेलन के इंटरनल वेपन्स बे में फिट होने वाली कोई भी घातक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल रूस के पास खुद की नहीं थी। ब्रह्मोस-एनजी को इस तरह तराशा गया है कि यह इस स्टील्थ जेट के अंदर सीधे फिट हो जाती है। इसका मतलब साफ है कि रूसी फाइटर जेट अपनी अदृश्यता को खोए बिना चार सौ किलोमीटर दूर से दुश्मन के ठिकानों को पलक झपकते राख कर सकते हैं। इसके अलावा, लखनऊ में बना नया प्लांट हर साल नब्बे से सौ मिसाइलें तैयार करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
सुपर सुखोई और एयर डिफेंस का चक्रव्यूह
अब बात करते हैं भारतीय वायुसेना के भविष्य की। वायुसेना के घटते स्क्वाड्रंस की चिंता को दूर करने के लिए ग्यारह बिलियन डॉलर यानी लगभग बयानवे हजार करोड़ रुपये का सुपर सुखोई अपग्रेडेशन प्रोजेक्ट फाइनल हो चुका है। इसके तहत दो सौ साठ सुखोई विमानों में से चौरासी लड़ाकू विमानों का आधुनिकीकरण किया जाएगा। पुराने रूसी रडार की जगह भारत का अपना स्वदेशी विरुपाक्ष एईएसए रडार लगाया जाएगा। डिजिटल कॉकपिट से लेकर इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सुइट तक सब कुछ स्वदेशी तकनीक से लैस होगा। इसके साथ ही, रूस की आर-सैंतीस एम मिसाइल का इंटीग्रेशन इस डील का सबसे घातक पहलू है, जो तीन से चार सौ किलोमीटर दूर ही दुश्मन के विमानों को आसमान में ढेर कर देगी।
रूस ने सुखोई-57 के इंजन की कोर टेक्नोलॉजी का सौ प्रतिशत ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी देने की लिखित हामी भर दी है। यह वही इंजन है जो बिना आफ्टरबर्नर के सुपरक्रूज स्पीड देता है। इस तकनीक के मिलते ही भारत के अपने पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट एएमसीए प्रोजेक्ट के लिए सबसे बड़ी तकनीकी रुकावट हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। एयर डिफेंस के मोर्चे पर एस-फॉर हंड्रेड की पांचवीं स्क्वाड्रन की डिलीवरी इसी साल नवंबर तक पूरी हो जाएगी। इसके अलावा, रूस ने पचास हजार करोड़ रुपये में पांच और एस-फॉर हंड्रेड स्क्वाड्रन देने और भारत में ही कंप्लीट एमआरओ हब बनाने का नया प्रस्ताव दिया है।
पेट्रो-डॉलर को झटका और व्यापारिक क्रांति
पश्चिमी देशों के लिए सबसे बड़ा झटका रक्षा सौदों से ज्यादा पेट्रो-डॉलर के ताबूत में ठोकी गई कील है। भारत और रूस का द्विपक्षीय व्यापार पैंसठ बिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर चुका है और इसे बीस तीस तक सौ बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य है। पश्चिमी देशों के स्विफ्ट सिस्टम को बाईपास करने के लिए भारत के एसएफएमएस और रूस के एसपीएफएस मैसेजिंग सिस्टम को आपस में जोड़ दिया गया है।
भारतीय बैंकों में तीस से ज्यादा रूसी बैंकों के स्पेशल रुपी वोस्ट्रो अकाउंट्स खुल चुके हैं। ब्रिक्स पे और डिजिटल करेंसी के जरिए डायरेक्ट ट्रेड सेटलमेंट को हरी झंडी मिल चुकी है। जब दो महाशक्तियां अपनी करेंसी में अरबों डॉलर का कारोबार करेंगी, तो अमेरिकी डॉलर का ग्लोबल दबदबा अपने आप ढह जाएगा। चीन की चाल को मात देने के लिए क्रिटिकल मिनरल्स पर भी ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं। रूस ने अपने साइबेरिया और फार ईस्ट के अकूत लिथियम, टाइटेनियम और निकल के खजाने भारत की काबिल कंपनी के लिए खोल दिए हैं।
भू-राजनीतिक लाचारी और नया विश्व ऑर्डर
व्यापारिक रास्तों को सुगम बनाने के लिए बहत्तर सौ किलोमीटर लंबाINSTC कॉरिडोर पूरी क्षमता से चालू किया जा रहा है। मुंबई से चाबहार होते हुए सेंट पीटर्सबर्ग तक जाने वाला यह रूट स्वेज नहर के मुकाबले सफर का समय आधा कर देता है और लागत तीस परसेंट घटा देता है। अब सवाल यह उठता है कि वॉशिंगटन यह सब चुपचाप कैसे देख रहा है? क्या वह काट्सा कानून के तहत भारत पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता? इस सवाल का जवाब अमेरिका की भू-राजनीतिक लाचारी में छिपा है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के प्रभुत्व को रोकने के लिए अमेरिका को क्वाड में भारत की सख्त जरूरत है। अगर अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगाने की मूर्खता की, तो एशिया में उसकी पूरी सुरक्षा संरचना ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगी।
ग्यारह से तेरह सितंबर दो हजार छियासी के बीच नई दिल्ली में जो कुछ भी हुआ, वह केवल दो देशों की साधारण कूटनीतिक मुलाकात नहीं थी। यह उस बहुध्रुवीय विश्व की वास्तविक आधारशिला थी, जिसकी अब तक केवल कल्पना की जाती थी। वाशिंगटन की खोखली धमकियों के बीच, भारत और रूस का यह नया गठजोड़ अब क्रेता और विक्रेता का नहीं, बल्कि दो समान महाशक्तियों की ऐसी अजेय जुगलबंदी बन चुका है जो आने वाले दशकों तक विश्व की भू-राजनीति को अपनी शर्तों पर चलाएगी।





