जिस रूस के कच्चे तेल पर आधी दुनिया निर्भर है, आखिर आज उसी देश के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को भारत से पेट्रोल और डीजल की गुहार क्यों लगानी पड़ रही है? यह सवाल वर्तमान में वैश्विक महाशक्तियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। क्या यूक्रेन के सटीक ड्रोन हमलों ने रूस के उस कमजोर हिस्से को चोट पहुंचाई है जिसे पुतिन दुनिया से छिपा रहे थे? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रूस ने अपने सबसे करीबी कहे जाने वाले दोस्त चीन के बजाय सिर्फ भारत से ही यह गुप्त सहायता क्यों मांगी है?
गुजरात के जामनगर और वाडिनार बंदरगाहों से निकलने वाले उन गुप्त जहाजों की हकीकत क्या है, जो पश्चिमी देशों की पाबंदियों के बावजूद रूसी सेना तक ईंधन पहुंचा रहे हैं? क्या भारत ने अमेरिका और यूरोप की रणनीति को मात देते हुए 30 बिलियन डॉलर का ऐसा खेल खेला है, जिसने वैश्विक भू-राजनीति की दिशा बदल दी? आज हम इस अंतरराष्ट्रीय पावर गेम की उन परतों को खोलेंगे जो अक्सर मीडिया की सुर्खियों से ओझल रहती हैं।
यह कोई सामान्य घटना नहीं है, बल्कि ग्लोबल सप्लाई चेन का एक ऐसा मोड़ है जिसने भारत को एक ‘अपरिहार्य शक्ति’ के रूप में स्थापित कर दिया है। युद्ध से पहले जो रूस यूरोप को ऊर्जा निर्यात करता था, आज वह अपनी ही सेना के लिए ईंधन जुटाने में संघर्ष कर रहा है। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि रूस के पास कच्चे तेल की कोई कमी नहीं है, लेकिन कच्चे तेल को सीधे टैंक या लड़ाकू विमान में नहीं डाला जा सकता। उसे रिफाइनरियों में प्रोसेस करना पड़ता है, और यहीं पर रूस का सिस्टम फेल हो गया है। रूस का वर्तमान संकट कच्चे तेल का नहीं, बल्कि उसे रिफाइन करने की क्षमता का है।
आखिर रूस की रिफाइनरियां अचानक ठप कैसे हो गईं? इसका राज 2024 में यूक्रेन की नई युद्ध रणनीति में छिपा है। यूक्रेन ने सीधी जंग के बजाय रूस के आर्थिक इंजन यानी तेल रिफाइनरियों को निशाना बनाना शुरू किया। यूक्रेन के कामिकाजी ड्रोन्स ने रूस के एयर डिफेंस को चकमा देकर निज़नी नोवगोरोड और रियाज़ान जैसी प्रमुख रिफाइनरियों को भारी नुकसान पहुँचाया। ये वही केंद्र हैं जो रूसी सेना और बड़े शहरों को ईंधन की आपूर्ति करते हैं।
इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स की मानें तो इन हमलों से रूस की 15 से 20 प्रतिशत रिफाइनिंग क्षमता प्रभावित हुई है। पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों के कारण रूस इन रिफाइनरियों की मरम्मत के लिए जरूरी हाई-टेक स्पेयर पार्ट्स और टर्बाइन्स का आयात नहीं कर पा रहा है। जो काम हफ़्तों में हो सकता था, उसमें अब महीनों लग रहे हैं। इसी लाचारी ने पुतिन को भारत की ओर रुख करने पर मजबूर किया है।
अब सवाल यह है कि रूस ने चीन के बजाय भारत को क्यों चुना? इसके पीछे रणनीतिक और भौगोलिक कारण हैं।
पहला कारण दूरी और लॉजिस्टिक्स है। रूस का पश्चिमी हिस्सा, जहाँ ईंधन की सबसे ज्यादा कमी है, यूरोप के करीब है। चीन से वहाँ तक ईंधन पहुंचाना बहुत महंगा और समय लेने वाला काम है। इसके मुकाबले, भारत से समुद्री रास्तों के जरिए रूसी बंदरगाहों तक पेट्रोल पहुँचाना कहीं अधिक व्यावहारिक और किफायती है।
दूसरा बड़ा कारण बुनियादी ढांचा है। रूस और चीन के बीच जो पाइपलाइन है, वह केवल कच्चा तेल लाने-ले जाने के लिए है, रिफाइंड पेट्रोल के लिए नहीं।
सबसे अहम बात है पुतिन का रणनीतिक डर। रूस कभी नहीं चाहेगा कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए पूरी तरह चीन पर निर्भर होकर उसका ‘जूनियर पार्टनर’ बन जाए। रूस को एक ऐसे विश्वसनीय और तटस्थ साथी की जरूरत थी जो चीन की तरह ब्लैकमेल न करे और अमेरिका के दबाव में भी न आए। वह साथी केवल भारत है।
भारत ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए 30 बिलियन डॉलर का अद्भुत गेम खेला। जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने स्पष्ट कर दिया कि उसकी नीतियां राष्ट्रीय हित से प्रेरित होंगी। भारत ने रूस से भारी डिस्काउंट पर कच्चा तेल खरीदना शुरू किया, जिससे उसकी रूसी तेल पर निर्भरता 2 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 40 प्रतिशत तक पहुँच गई।
एसबीआई रिसर्च के अनुसार, इस कूटनीति से भारत ने पिछले दो वर्षों में लगभग 25 से 30 बिलियन डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार की बचत की है। भारत ने इस धन का उपयोग अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने और बुनियादी ढांचे के विकास में किया। भारत आज दुनिया का ऐसा रिफाइनिंग हब बन चुका है जो आयात तो कच्चा तेल करता है, लेकिन निर्यात पेट्रोलियम उत्पाद करता है।
गुजरात के जामनगर और वाडिनार की रिफाइनरियां दुनिया की सबसे आधुनिक रिफाइनरियों में से हैं। इनकी उच्च ‘नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स’ क्षमता के कारण ये रूस के भारी कच्चे तेल को भी उच्च गुणवत्ता वाले पेट्रोल-डीजल में बदल सकती हैं। युद्ध के दौरान भारतीय कंपनियों का रिफाइनिंग मार्जिन रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया, जिससे देश का पेट्रोलियम एक्सपोर्ट रेवेन्यू 2023-24 में 86 बिलियन डॉलर के पार चला गया।
यहाँ यूरोप का दोहरा मापदंड भी सामने आता है। जो यूरोप सार्वजनिक रूप से रूस पर प्रतिबंध लगा रहा है, वही अपनी जरूरतों के लिए भारत के रास्ते रूसी तेल ही खरीद रहा है। नीदरलैंड्स, फ्रांस और यूके जैसे देश भारत से रिफाइंड तेल लेकर अपनी अर्थव्यवस्था चला रहे हैं। यहाँ तक कि अमेरिका भी अपनी जरूरतों के लिए भारतीय रिफाइनरियों पर निर्भर है।
अब भारत-रूस के बीच ‘रिवर्स फ्लो’ का खेल शुरू हुआ है। रूस की सरकारी कंपनी रोसनेफ्ट की भारत की नायरा एनर्जी में बड़ी हिस्सेदारी है। रूस अब यूएई और सिंगापुर के अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के माध्यम से भारत से रिफाइंड पेट्रोल वापस खरीद रहा है। यह पूरी प्रक्रिया भारत को ग्लोबल एनर्जी मार्केट का एक शक्तिशाली केंद्र और ‘किंगमेकर’ बना चुकी है।

