ग्लेशियर नहीं, ड्रैगन का वाटर-बॉम्ब? नेपाल की सुनामी के पीछे छिपा बीजिंग का सबसे काला सच!

ग्लेशियर नहीं, ड्रैगन का वाटर-बॉम्ब? नेपाल की सुनामी के पीछे छिपा बीजिंग का सबसे काला सच!

2013 का केदारनाथ, 2021 का चमोली और अब नेपाल की खौफनाक हिमालयी सुनामी। क्या ये सिर्फ इत्तेफाक से आने वाली प्राकृतिक आपदाएं हैं? या फिर भारत और नेपाल को घुटनों पर लाने के लिए चीन किसी महाविनाशक क्लाइमेट वेपन की लाइव टेस्टिंग कर रहा है? क्या अमेरिकी राजदूत के एक खुफिया ड्रोन ने एवरेस्ट की ऊंचाइयों से तिब्बत में चीन का कोई ऐसा खौफनाक राज पकड़ लिया था जिसे हमेशा के लिए दफन करने के लिए बीजिंग ने रातों-रात पूरा हिमालय ही डुबो दिया? आखिर उस कैमरे में ऐसा क्या रिकॉर्ड हो गया था जिससे घबराकर चीन को जल-प्रलय लानी पड़ी? सैटेलाइट इमेजरी और खुफिया रिपोर्ट्स चीख-चीख कर कह रही हैं कि जिस जगह से ये महाविनाशक बाढ़ आई, वहां कोई बड़ा ग्लेशियर था ही नहीं। तो फिर अचानक लाखों गैलन पानी आसमान से कैसे टपका? या फिर तिब्बत की अंधेरी घाटियों में चीन का कोई गुप्त वाटर-बॉम्ब एक्सपेरिमेंट आउट ऑफ कंट्रोल हो गया था? वो कौन सा खौफनाक और महाविनाशक प्रयोग था, जिसे छिपाने के लिए ड्रैगन ने अपने ही 51000 करोड़ रुपये के केरुंग-काठमांडू रेलवे प्रोजेक्ट की बेरहमी से बलि चढ़ा दी? क्या इस मलबे के नीचे चीन की कोई खुफिया वेदर-मॉडिफिकेशन लैब दफ्न हो गई है?

आज हम इन तमाम सवालों के जवाब डिकोड करेंगे और आपको बताएंगे कि कैसे हिमालय के शांत पहाड़ों के पीछे एक साइलेंट वॉर की बिसात बिछ चुकी है, जिसका सीधा असर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ने वाला है। दोस्तो हिमालय की शांत और रहस्यमयी वादियां इन दिनों किसी गहरी साजिश, कूटनीतिक बिसात और विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं का नया केंद्र बन चुकी हैं। नेपाल में अगस्त 2024 के आखिर में आई अचानक और भीषण बाढ़ ने न केवल हजारों जिंदगियों को निगल लिया, बल्कि हिमालय के इस बेहद संवेदनशील क्षेत्र में एक नए इकोलॉजिकल और जियो-पॉलिटिकल वॉरफेयर यानी पारिस्थितिक और भू-राजनीतिक युद्ध की सुगबुगाहट को भी जन्म दे दिया है। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि इस त्रासदी में 1127 से अधिक लोगों की दर्दनाक मौत हुई और लगभग 3900 से ज्यादा लोग लापता हो गए। रसुवा, भोटेकोशी और त्रिशूली नदी प्रणालियों में आई इस हिमालयी सुनामी ने चंद घंटों के भीतर सब कुछ मलबे में तब्दील कर दिया। लेकिन इस तबाही के मलबे के नीचे कुछ ऐसे अनसुलझे सवाल और खुफिया रहस्य दबे हैं, जिनके तार काठमांडू से लेकर बीजिंग और वाशिंगटन तक जुड़े हैं। क्या यह महज़ एक प्राकृतिक आपदा थी? या फिर यह चीन द्वारा रची गई एक खौफनाक भू-रणनीतिक साजिश का हिस्सा थी? आखिर अमेरिकी राजनयिक सर्गियो गोर के नेपाल दौरे के ठीक बाद ही हिमालय का सीना क्यों फट गया? और क्या खुद नेपाल ने चंद पैसों और चीनी प्रोजेक्ट्स के लालच में अपने ही पहाड़ों का सौदा कर लिया है?

अमेरिका का सीक्रेट दौरा और चीन की बेचैनी

इस पूरी त्रासदी की टाइमलाइन और इसके पीछे छिपे इंटरनेशनल पावर गेम को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। 30 अप्रैल से 4 मई 2024 के बीच अमेरिका के शीर्ष राजनयिक सर्गियो गोर ने नेपाल का एक बेहद हाई-प्रोफाइल दौरा किया था। यह कोई सामान्य कूटनीतिक दौरा नहीं था। सर्गियो गोर सीधे एवरेस्ट बेस कैंप तक गए और सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में, जो सीधे तिब्बत की सीमा से सटा है, वहां बाकायदा एक ड्रोन उड़ाया। ड्रोन तकनीक का यह प्रदर्शन और ब्रीफिंग सिर्फ एक रूटीन काम नहीं था। रक्षा विशेषज्ञों और खुफिया हलकों में इस बात की जोरदार चर्चा है कि इस ड्रोन ने कुछ ऐसा रिकॉर्ड किया है जिसने बीजिंग की नींद उड़ा दी। चीन की बेचैनी का असली कारण तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र यानी TAR है। तिब्बत हमेशा से चीन की सबसे दुखती रग रहा है। चीन ने इस पूरे सीमावर्ती इलाके में स्वतंत्र पत्रकारों, शोधकर्ताओं और यहां तक कि आम नागरिकों की पहुंच को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर रखा है। मुस्तंग और एवरेस्ट के आसपास का इलाका सीधे तिब्बत से जुड़ता है। अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो 1960 के दशक में सीआईए ने इसी मुस्तंग क्षेत्र से तिब्बती विद्रोहियों, जिन्हें खम्पा विद्रोही कहा जाता था, उनको चीन के खिलाफ ट्रेनिंग और खतरनाक हथियार दिए थे। चीन आज तक उस खौफ से उबर नहीं पाया है।

जब एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक उसी संवेदनशील क्षेत्र में जाकर लेटेस्ट ड्रोन तकनीक का प्रदर्शन करता है, तो बीजिंग के सत्ता के गलियारों में खतरे की घंटियां बजना लाजिमी है। कूटनीतिक मामलों के जानकारों का स्पष्ट मानना है कि सर्गियो गोर के इस दौरे ने चीन को एक कड़ा और सीधा संदेश दिया था कि अमेरिका की नजरें हिमालय और तिब्बत के अंदर चल रही चीनी पीएलए की गतिविधियों पर पूरी तरह से बनी हुई हैं। इस हाई-प्रोफाइल दौरे के कुछ ही समय बाद आई इस विनाशकारी बाढ़ को कई खुफिया सूत्र चीन के कूटनीतिक ब्लैकमेल और एक खौफनाक चेतावनी के रूप में देख रहे हैं। यह चीन का तरीका हो सकता है यह बताने का कि हिमालय के पानी, उसकी नदियों और उसके भूगोल पर असली नियंत्रण किसका है। नेपाल के सूत्रों को डर है कि भविष्य में चीन इस तरह की कृत्रिम आपदाओं का इस्तेमाल करके काठमांडू को बुरी तरह ब्लैकमेल कर सकता है।

आर्टिफिशियल बाढ़ और तिब्बत का काला सच

इस बाढ़ को कागजों पर ग्लेशियर रॉक एवलांच का नाम दिया गया है, लेकिन तिब्बत और नेपाल के खुफिया सूत्रों ने इस थ्योरी की पूरी तरह धज्जियां उड़ा दी हैं। तिब्बत से उठते खौफनाक दावों ने दुनिया भर की खुफिया एजेंसियों को अलर्ट कर दिया है। तिब्बत से जुड़े कार्यकर्ताओं और अमेरिका में रह रहे चीनी प्रवासियों ने एक बेहद गंभीर आरोप लगाया है। उनका स्पष्ट कहना है कि 26 अगस्त को जिस विशिष्ट क्षेत्र से यह महाविनाशक बाढ़ आई, वहां प्राकृतिक रूप से कोई ऐसा बड़ा ग्लेशियर मौजूद ही नहीं था, जिसके टूटने से इतनी विशाल जलप्रलय आ सके। तो फिर इतना पानी कहां से आया? इसके पीछे आर्टिफिशियल बाढ़ यानी कृत्रिम जलप्रलय की थ्योरी सामने आ रही है। शक जताया जा रहा है कि चीन ने तिब्बत की तरफ बहने वाले जल स्रोतों को अस्थाई रूप से रोका था। पहाड़ों की आड़ में बड़े-बड़े कृत्रिम जलाशय या डैम तैयार किए गए थे और फिर एक सोची-समझी सैन्य और रणनीतिक चाल के तहत पानी को एक साथ छोड़ दिया गया, या फिर उन कच्चे बांधों को जानबूझकर तोड़ा गया ताकि निचले इलाकों में भारी तबाही मचाई जा सके।

चीन ने अपनी तरफ से जमीनी सच्चाई को दुनिया से पूरी तरह छुपा लिया है। इंटरनेट ब्लॉक और टेक-सेंसरशिप के कारण वहां की कोई वास्तविक सैटेलाइट इमेजरी या ग्राउंड रिपोर्ट बाहर नहीं आ पाई है। जो वीडियो चीन की तरफ से जारी किए गए हैं, स्वतंत्र जांचकर्ताओं के अनुसार, वे या तो कम्युनिस्ट पार्टी के प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं या फिर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा जनरेट किए गए पूरी तरह से भ्रामक दृश्य हैं। चीन ने इस सीमावर्ती इलाके में किसी भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया की पहुंच को बैन कर रखा है, जिससे जमीनी सच्चाई का पता लगाना लगभग नामुमकिन सा हो गया है।

हाइड्रोलॉजिकल वॉरफेयर और भारत की चिंताएं

नेपाल की इस घटना ने भारत के सुरक्षा, रक्षा और पर्यावरण विशेषज्ञों की नींद भी उड़ा दी है, क्योंकि इसके पैटर्न भारत में आई पिछली कुछ रहस्यमयी आपदाओं से हूबहू मिलते हैं। 2013 की केदारनाथ त्रासदी और 2021 में उत्तराखंड के चमोली के रैणी गांव में आई अचानक बाढ़ के समय भी इसी तरह के सवाल उठे थे। चमोली में सर्दियों के मौसम में, जब ग्लेशियर पिघलने का कोई तार्किक या वैज्ञानिक कारण नहीं था, अचानक एक पहाड़ का हिस्सा टूट गया और भयंकर बाढ़ आ गई। उस वक्त भी कई रक्षा विशेषज्ञों ने चीन की तरफ उंगली उठाई थी। आज यह कोई रहस्य नहीं है कि चीन मौसम को नियंत्रित करने की तकनीक, जैसे क्लाउड सीडिंग और जियो-इंजीनियरिंग पर अरबों डॉलर खर्च कर रहा है। स्काई रिवर प्रोजेक्ट यानी तियानहे प्रोजेक्ट के तहत चीन तिब्बती पठार पर बारिश और बर्फबारी को अपने हिसाब से नियंत्रित करने का खतरनाक प्रयास कर रहा है।

इसे हाइड्रोलॉजिकल वॉरफेयर कहा जाता है। भारत और नेपाल की लगभग सभी प्रमुख नदियां, चाहे वो ब्रह्मपुत्र हो, कोसी हो, गंडक हो या सतलुज, सब तिब्बत से निकलती हैं। चीन ऊपरी बहाव वाला देश होने का फायदा उठाकर नदियों के डेटा को एक साइलेंट हथियार की तरह इस्तेमाल करता है। आपको याद होगा कि डोकलाम विवाद के समय चीन ने अपनी खुन्नस निकालने के लिए भारत के साथ ब्रह्मपुत्र नदी का हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करना अचानक बंद कर दिया था। कई बड़े रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन हिमालय में ऐसे कंट्रोल्ड एक्सपेरिमेंट्स कर रहा है ताकि जरूरत पड़ने पर वह बिना एक भी गोली चलाए, सिर्फ पानी के प्रहार से दुश्मन के सैन्य और नागरिक बुनियादी ढांचे को पूरी तरह तबाह कर सके। नेपाल में आई यह बाढ़ शायद ऐसे ही किसी अनियंत्रित या जानबूझकर किए गए प्रयोग का परिणाम थी। भारत के रणनीतिकारों को यह समझना होगा कि चीन अब सीमाओं पर पारंपरिक युद्ध लड़ने के बजाय पानी और मौसम को अपना नया ब्रह्मास्त्र बना रहा है।

ड्रैगन का अपना नुकसान और केरुंग-काठमांडू प्रोजेक्ट

लेकिन इस पूरी कहानी में एक बड़ा विरोधाभास भी सामने आता है। अगर यह चीन की सोची-समझी साजिश थी, तो इस बाढ़ में चीन का अपना ही ग्यिरोंग लैंड पोर्ट क्यों पूरी तरह तबाह हो गया? समुद्र तल से करीब 1800 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद यह ग्यिरोंग पोर्ट अब मलबे के ढेर में बदल चुका है। यह पोर्ट नेपाल और चीन के बीच व्यापार की सबसे बड़ी जीवन रेखा थी। चीन ने 2014 में अंतरराष्ट्रीय उपयोगकर्ताओं के लिए इस आधुनिक क्रॉसिंग को औपचारिक रूप से खोला था और 2015 के भूकंप के बाद इसका महत्व और भी बढ़ गया था। इसके साथ ही बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत प्रस्तावित 5.5 अरब डॉलर यानी करीब 51000 करोड़ रुपये का केरुंग-काठमांडू रेलवे प्रोजेक्ट भी पूरी तरह खटाई में पड़ गया है।

इस रेलवे प्रोजेक्ट की कुल अनुमानित लागत 5.5 अरब डॉलर थी। चीन ने 2016 में ग्यिरोंग के रास्ते काठमांडू तक रेलवे का बड़ा प्लान पेश किया था। 2018 में इसे बीआरआई के तहत ट्रांस-हिमालयन नेटवर्क में शामिल किया गया और 2019 में इसे लिस्ट किया गया। यह रेलवे तिब्बत में शिगात्से से चीन के मौजूदा रेल नेटवर्क को ग्यिरोंग तक करीब 550 किलोमीटर बढ़ाएगी। नेपाल की तरफ प्रस्तावित रेल लाइन की लंबाई करीब 72.25 किलोमीटर है। देखने में यह दूरी ज्यादा बड़ी नहीं लगती, लेकिन एक स्टडी के मुताबिक, नेपाल वाले हिस्से का करीब 98.5 फीसदी मार्ग सिर्फ सुरंगों या पुलों से होकर गुजरने की जरूरत पड़ेगी। यानी यहां सामान्य तरीके से रेलवे ट्रैक बिछाना लगभग असंभव है।

अगर चीन का इतना बड़ा नुकसान हुआ है, तो क्या यह बाढ़ चीन ने खुद लाई थी? इसके दो कूटनीतिक विश्लेषण हैं। पहला है कैलकुलेटेड रिस्क। बड़े रणनीतिक लक्ष्यों, जैसे अमेरिका को हिमालय से दूर रखना और नेपाल को अपनी सैन्य व आर्थिक मुट्ठी में कसने के लिए चीन अपने छोटे इन्फ्रास्ट्रक्चर के नुकसान को आसानी से बर्दाश्त कर सकता है। चीन के लिए 51000 करोड़ रुपये कोई बड़ी रकम नहीं है, खासकर तब जब उसे हिमालय पर अपना पूरा वर्चस्व कायम करना हो। दूसरी थ्योरी यह है कि चीन ने नेपाल पर दबाव बनाने के लिए जो कृत्रिम जलाशय या डैम तिब्बत में बनाए थे, वे हिमालय के कठोर भूगोल और प्रकृति की ताकत के आगे टिक नहीं पाए और अनियंत्रित होकर खुद चीन के ग्यिरोंग पोर्ट को भी ले डूबे। इस तबाही ने साबित कर दिया है कि हिमालय में चीन का यह महत्वाकांक्षी रेलवे का सपना व्यावहारिक रूप से एक दुःस्वप्न है। नेपाल के पूर्व मंत्री मिनेंद्र रिजाल ने भी बहुत पहले कहा था कि हम चीन को रेलमार्ग से क्या निर्यात करेंगे? बेहतर है कि हम सिर्फ सड़कें बनाएं। आपदा ने संकरी हिमालयी घाटियों में चीनी प्रोजेक्ट्स को केंद्रित करने के विनाशकारी नतीजों को उजागर कर दिया है।

नेपाल की आत्मघाती नीतियां और हाइड्रोपावर का जाल

इस पूरी त्रासदी में सिर्फ चीन को दोष देकर काठमांडू खुद को पाक-साफ साबित नहीं कर सकता। हकीकत यह है कि नेपाल ने चंद डॉलरों और रुपयों की लालच में अपने ही पर्यावरण का बेदर्दी से सौदा किया है। हिमालय के जिस अत्यंत संवेदनशील इको-सिस्टम को सहेज कर रखा जाना चाहिए था, उसे नेपाल ने कंक्रीट के जंगलों और अनगिनत बांधों में तब्दील कर दिया है। आज नेपाल पूरी तरह से जल-विद्युत यानी हाइड्रोपावर पर निर्भर है। नेपाल बिजली प्राधिकरण के अनुसार, इस समय नेपाल में 225 से ज्यादा छोटे-बड़े हाइड्रो पावर प्लांट चालू हैं, जिनकी कुल क्षमता 3900 मेगावाट से अधिक है। इसके अलावा 250 से अधिक हाइड्रो प्रोजेक्ट्स का जाल बिछाया जा रहा है और सैकड़ों अन्य निर्माण के अलग-अलग चरण में हैं।

सबसे खतरनाक बात यह है कि ये सभी प्रोजेक्ट्स उन इलाकों में बनाए गए हैं, जैसे त्रिशूली और भोटेकोशी नदी बेसिन, जो भूस्खलन, भूकंप यानी सीज्मिक जोन 5 और ग्लेशियर लेक आउटर्स्ट फ्लड के लिहाज से दुनिया के सबसे खतरनाक और अस्थिर क्षेत्र माने जाते हैं। विदेशी निवेश, विशेषकर चीन के एक्जिम बैंक और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के लालच में नेपाल की सरकारों ने पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के मानकों को पूरी तरह ताक पर रख दिया। पहाड़ों को बारूद से उड़ाया गया, नदियों का प्राकृतिक रास्ता मोड़ा गया और हरे-भरे जंगलों को बेरहमी से काटा गया। जब आप प्रकृति के सीने पर इतने गहरे घाव करेंगे, तो वह अपना भयंकर बदला जरूर लेगी। इस हालिया बाढ़ में त्रिशूली बेसिन की 12 बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं पूरी तरह तबाह हो गईं।

नेपाल आज अपनी इसी बिजली को भारत और बांग्लादेश को बेचकर विदेशी मुद्रा कमा रहा है, लेकिन इसकी असल कीमत वहां के आम नागरिक अपनी जान देकर चुका रहे हैं। ऊपरी त्रिशूली 1 परियोजना जिसकी लागत 64.7 करोड़ डॉलर थी और चीन समर्थित ऊपरी त्रिशूली 3ए परियोजना ने यह दिखा दिया है कि खतरों का आकलन होने के बावजूद डिजाइन में भारी लापरवाही बरती गई है। नेपाल का यह विकास मॉडल सस्टेनेबल नहीं, बल्कि पूरी तरह सुसाइडल है। चंद पैसों के लालच में नेपाल ने अपना जमीर बेच दिया है और अपने ही लोगों की मौत का वॉरंट साइन कर दिया है।

कूटनीतिक ड्रामा और मुआवजे का खेल

तबाही के बाद काठमांडू के सत्ता के गलियारों में जो राजनीतिक ड्रामा चल रहा है, वह किसी हाई-वोल्टेज पॉलिटिकल थ्रिलर से कम नहीं है। 1127 से ज्यादा लाशें गिरने के बाद नेपाल सरकार ने अपनी खुद की गलतियों से पर्दा हटाने के बजाय, इसके लिए क्लाइमेट चेंज के नाम पर बड़ी शक्तियों से भारी हर्जाना वसूलने की एक बेशर्म योजना बनाई। मंत्रियों के बीच की गुटबाजी खुलकर सामने आ गई। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह संयुक्त राष्ट्र महासभा और आगामी सीओपी31 समिट में दुनिया के सामने इस मुद्दे को उठाने की पूरी तैयारी में हैं।

शुरुआत में, नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि अमेरिका, चीन और भारत को कार्बन उत्सर्जन के लिए नेपाल को तुरंत मुआवजा देना चाहिए। उनका तर्क था कि 44 सबसे कम विकसित देशों के समूह के सदस्य के रूप में नेपाल कोई कार्बन नहीं फैलाता, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग की सजा उसे भुगतनी पड़ रही है। खनाल ने यहां तक कह दिया कि भारत जैसी शक्तियां जो सहायता दे रही हैं वो कोई उपकार नहीं कर रही हैं, बल्कि उनकी ऐतिहासिक जिम्मेदारी है। लेकिन इस बयान के बाद जो हुआ, वह नेपाल की कमजोर और गुलाम विदेश नीति की असली पोल खोलता है।

जल्द ही काठमांडू में स्थित चीनी दूतावास ने अपना हंटर चलाया। चीन के भारी दबाव में आते ही विदेश मंत्री शिशिर खनाल की बोलती बंद हो गई। उन्होंने रातों-रात यू-टर्न ले लिया और मीडिया के सामने आकर कांपते हुए स्पष्टीकरण दिया कि वे चीन या किसी अन्य देश से कोई सीधा जलवायु न्याय मुआवजा नहीं मांग रहे हैं। चीनी दूतावास ने भी दावा किया कि खनाल ने उनसे ऐसी कोई मांग नहीं की है। यह साफ दिखाता है कि नेपाल के नेता चीन के इशारों पर किस तरह कठपुतलियों की तरह नाचते हैं।

दूसरी ओर, नेपाल के वित्त मंत्री डॉ स्वर्णिम वाग्ले इस बात पर अड़े रहे कि नेपाल को उसका हक मिलना चाहिए। सरकार के अंदर इस भारी मतभेद के बाद, नेपाल सरकार ने अपना कूटनीतिक रास्ता बदलते हुए सीधे देशों को कटघरे में खड़ा करने के बजाय संयुक्त राष्ट्र के लॉस एंड डैमेज फंड से औपचारिक तौर पर वित्तीय सहायता की मांग कर दी है। वित्त मंत्री डॉ स्वर्णिम वाग्ले ने संयुक्त राष्ट्र को एक चिट्ठी लिखकर मदद मांगी है। तुर्की में इस साल होने वाले सीओपी31 समिट के लिए अपना एजेंडा तय करने के मकसद से मंत्रियों और अधिकारियों ने 1 से 3 सितंबर तक दिल्ली में एक अहम बैठक की है। यह समूह 44 देशों का है जो संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज के तहत बातचीत करता है। नेपाल अब इसी गुट का सहारा लेकर दुनिया से पैसे ऐंठने की कोशिश कर रहा है।

यह घटनाक्रम साफ दर्शाता है कि नेपाल भारत से मदद और राहत सामग्री भी लेता है, भारत को बिजली बेचकर पैसे भी कमाता है, लेकिन जब मुआवजे की बात आती है तो वह भारत को ही कटघरे में खड़ा करने की बेजा कोशिश करता है। अपनी ही जमीन पर हो रहे अंधाधुंध चीनी निर्माण पर वह पूरी तरह आंखें मूंदे हुए है। तिब्बती-हिमालयी इलाके में चीन के कम से कम 90 बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर एसेट्स की पहचान की गई है, जिनमें 27 एयर एसेट्स, 17 रेलवे एसेट्स, 33 पहाड़ी सुरंगें और 13 बांध, जलाशय और पनबिजली परियोजनाएं शामिल हैं। चीन ने पूरे हिमालय को एक बारूद के ढेर पर बैठा दिया है और काठमांडू के नेता चंद पैसों के लिए इस तबाही को मूक दर्शक बनकर देख रहे हैं।

निष्कर्ष: भारत के लिए सबक और भविष्य की चुनौती

भारत के नजरिए से देखें तो यह स्थिति बेहद अलार्मिंग है। मोदी सरकार और भारत के रणनीतिकारों को हिमालय में चल रहे इस ग्रेट गेम को बहुत बारीकी से समझना होगा। नेपाल की यह बाढ़ केवल पानी का सैलाब नहीं थी, बल्कि यह भविष्य के साइलेंट वॉर का एक डरावना ट्रेलर था। एक तरफ अमेरिकी राजनयिक की हिमालय में गश्त है, तो दूसरी तरफ चीन की भौगोलिक और हाइड्रोलॉजिकल आक्रामकता। इन दोनों के बीच फंसा नेपाल अब एक बफर स्टेट से हटकर पूरी तरह से एक बैटलग्राउंड स्टेट में बदलता जा रहा है।

चीन का स्काई रिवर प्रोजेक्ट और उसका वेदर मॉडिफिकेशन प्रोग्राम भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक सीधा और बहुत बड़ा खतरा है। अगर चीन बादलों और ग्लेशियरों को हथियार बनाने में कामयाब हो गया, तो अगली बार बिना एक भी गोली चले, नेपाल से लेकर पूरा उत्तर भारत जलसमाधि ले सकता है। भारत ने पिछले कुछ सालों में अपनी बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर, रणनीतिक स्वायत्तता और डिफेंस कैपेबिलिटी को काफी मजबूत किया है। भारतीय सेना और खुफिया एजेंसियां चीन की हर चाल पर पैनी नजर रखे हुए हैं। लेकिन अब वक्त आ गया है कि भारत कूटनीतिक स्तर पर नेपाल को उसकी हकीकत बताए और चीन के हाइड्रोलॉजिकल वॉरफेयर को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बेनकाब करे।

जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से भारत, हिमालय के जल स्रोतों और वहां चल रहे चीनी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग मजबूती से नहीं उठाता, तब तक हिमालय यूं ही चीखता रहेगा। केदारनाथ, चमोली से लेकर मुस्तंग और रसुवा तक, आम लोग इस भू-रणनीतिक और पारिस्थितिक खिलवाड़ की कीमत अपनी जान देकर चुकाते रहेंगे। चीन का यह वाटर वॉर अब कोई फिक्शन नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई बन चुका है। भारत को अपने डिफेंस और डिप्लोमेसी दोनों मोर्चों पर इस अदृश्य खतरे से निपटने के लिए एक बेहद आक्रामक और प्रो-एक्टिव पॉलिसी अपनानी होगी, क्योंकि हिमालय पर जिसका कंट्रोल होगा, एशिया का भविष्य उसी के हाथ में होगा।

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