राष्ट्र की ताकत पर ‘स्टोन’ का हमला! 20 साल के युवाओं को क्यों हो रही किडनी की बीमारी ?

राष्ट्र की ताकत पर 'स्टोन' का हमला! 20 साल के युवाओं को क्यों हो रही किडनी की बीमारी ?

भारत, जिसे दुनिया एक “युवा राष्ट्र” के रूप में देखती है, जहाँ की आधी से ज्यादा आबादी 35 साल से कम उम्र की है, आज एक अदृश्य लेकिन बेहद खतरनाक दुश्मन के निशाने पर है। यह दुश्मन कोई विदेशी ताकत नहीं, बल्कि हमारे अपने नौजवानों के शरीर के भीतर पनप रही एक गंभीर बीमारी है। हम बात कर रहे हैं युवाओं की “जवान किडनियों” में तेजी से बढ़ती पथरी यानी किडनी स्टोन की महामारी की। यह महज कोई मेडिकल बुलेटिन नहीं है, यह राष्ट्र की सेहत को लेकर एक गंभीर चेतावनी है। जो उम्र देश के निर्माण में पसीना बहाने की होनी चाहिए, उस उम्र में हमारा यूथ अस्पतालों के चक्कर काट रहा है, पेट दर्द से तड़प रहा है। आखिर ऐसा क्या हो गया कि हमारे नौजवानों के गुर्दे पत्थर दिल होते जा रहे हैं? यह कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी लापरवाही और पश्चिमी सभ्यता की अंधी नकल का खौफनाक नतीजा है।

जवानी में पथरी का ‘विस्फोट’

आंकड़े गवाह हैं और डॉक्टर्स की OPD चीख-चीख कर यह हकीकत बयां कर रही है। पहले माना जाता था कि किडनी स्टोन बुजुर्गों की बीमारी है, उम्र ढलने के साथ होने वाली समस्या है। लेकिन आज मंजर पूरी तरह बदल चुका है। अस्पतालों में किडनी स्टोन के मरीजों का इलाज करने वाले यूरोलॉजिस्ट्स और नेफ्रोलॉजिस्ट्स इस बात से हैरान और परेशान हैं कि उनके पास आने वाले मरीजों में सबसे बड़ी तादाद 20 साल से 40 साल के युवाओं की है। यह वो उम्र है जब इंसान अपने करियर के पीक पर होता है, सबसे ज्यादा एक्टिव होता है। लेकिन अफसोस, युवा भारत की किडनियाँ इस उम्र में बूढ़ी हो रही हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, अत्यधिक गर्मी वाले महीनों में, खासतौर पर दिल्ली-एनसीआर और उत्तर भारत के अन्य शहरों में, किडनी स्टोन के मरीजों की संख्या में अचानक 30 से 40 प्रतिशत का भारी उछाल देखा जाता है। और इस उछाल में सबसे ज्यादा शिकार नौजवान ही होते हैं। नौकरी करने वाले, कॉलेज जाने वाले, जिम जाकर बॉडी बनाने का शौक रखने वाले और यहाँ तक कि किशोर भी गुर्दे की पथरी के कारण होने वाले असहनीय पेट दर्द, पेशाब में भयंकर जलन और बार-बार होने वाले यूरीन इंफेक्शन (UTI) जैसी तकलीफों के साथ अस्पतालों में पहुँच रहे हैं। यह एक Alarming Situation है, जिसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते।

सूरज का टॉर्चर और डिहाइड्रेशन का जाल

आखिर इस तबाही की जड़ क्या है? सबसे पहला और बड़ा विलेन है—भारत में बढ़ता हुआ तापमान और भीषण हीटवेव । ग्लोबल वार्मिंग का सीधा असर हमारे युवाओं की किडनियों पर पड़ रहा है। गर्मी के महीनों में जब सूरज आग उगलता है, तब शरीर से पसीने के रूप में भारी मात्रा में Fluids बाहर निकल जाता है। ऐसे में, अगर पर्याप्त पानी न पिया जाए, तो शरीर गंभीर डिहाइड्रेशन का शिकार हो जाता है।

यह एक सीधा सा साइंस है। जब शरीर में पानी कम होता है, तो यूरिन (पेशाब) अत्यधिक कंसंट्रेटेड  हो जाता है। यूरिन के अंदर मौजूद कैल्शियम, ऑक्सालेट और यूरिक एसिड जैसे तत्व, जो सामान्यतः पानी में घुलकर बाहर निकल जाने चाहिए, वो पानी की कमी के कारण आपस में चिपकने लगते हैं और Crystal का रूप ले लेते हैं। यही क्रिस्टल धीरे-धीरे जमा होकर ठोस पथरी यानी स्टोन बन जाते हैं।

दुख की बात यह है कि युवा आबादी, जो काम, ट्रेवल और एक्सरसाइज के लिए सबसे ज्यादा घर से बाहर वक्त बिताती है, वो इस दौरान पानी पीना भूल जाती है। मेट्रो में सफर कर रहे हैं तो पानी नहीं है, मीटिंग में व्यस्त हैं तो पानी नहीं है, और तो और, आज का यूथ एयर कंडीशनर (AC) वाली जगहों पर काम करना पसंद करता है। एसी में रहने के कारण उन्हें प्यास का अहसास कम होता है, लेकिन शरीर को पानी की जरूरत तब भी होती है। यह Silent Dehydration उनकी किडनियों को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है। यूरिन का उत्पादन कम होने की वजह से पथरी बनाने वाले साल्ट का लेवल शरीर में बढ़ जाता है, और नतीजा होता है—अस्पताल का बेड।

Western Diet का धीमा जहर

लेकिन बात सिर्फ पानी की नहीं है। हमारी लाइफस्टाइल और खान-पान का तरीका इस आग में घी डालने का काम कर रहा है। पिछले एक दशक में, भारतीय युवाओं की खाने की आदतों में एक विनाशकारी बदलाव आया है। हमारा पारंपरिक, पौष्टिक, घर का बना खाना अब युवाओं के लिए “आउटडेटेड” हो गया है। उसकी जगह ले ली है वेस्टर्न कल्चर के प्रोसेस्ड और फास्ट फूड ने।

इंस्टेंट नूडल्स, पैकेज्ड फूड, क्विक सर्विस रेस्टोरेंट्स का खाना, शुगरी ड्रिंक्स, प्रोसेस्ड स्नैक्स और अत्यधिक नमक वाली मील्स लेना आज के यूथ के लिए स्टेटस सिंबल बन गया है या कहें कि उनकी मजबूरी। लेकिन क्या उन्हें पता है कि इन चमक-दमक वाले पैकेटों के अंदर क्या है? इनके अंदर भरा है अत्यधिक सोडियम, बैड फैट्स, खतरनाक प्रीजर्वेटिव और एडिटिव्स । यह सब कुछ हमारी किडनियों पर एक भयंकर एक्स्ट्रा लोड डालता है।

खासतौर पर, ज्यादा नमक यानी सोडियम का सेवन किडनियों के लिए सीधा प्रहार है। नमक शरीर को ज्यादा मात्रा में कैल्शियम को यूरिन में छोड़ने के लिए मजबूर करता है, और यही कैल्शियम जब ऑक्सालेट से मिलता है, तो कैल्शियम ऑक्सालेट स्टोन बनता है, जो भारत में सबसे कॉमन तरह की पथरी है। इसी तरह, ये फिज वाली ड्रिंक्स, कोला और शुगरी ड्रिंक्स शरीर को हाइड्रेट करने की जगह और ज्यादा डिहाइड्रेट करती हैं और शरीर के मिनरल बैलेंस को पूरी तरह बिगाड़ देती हैं।

नौजवानों ने फल, सब्जियां, फाइबर और नेचुरल फ्लूइड (जैसे नारियल पानी, नींबू पानी, लस्सी) को अपनी डाइट से लगभग बाहर कर दिया है। उनकी जगह पर “अल्ट्रा-प्रोसेस्ड डाइट” ने कब्ज़ा कर लिया है। एक्सपर्ट्स की यह साफ चेतावनी है कि जवान लोगों में किडनी से जुड़ी गंभीर बीमारियों के बढ़ने का एक प्रमुख कारण यही घटिया और Nutrition-less डाइट है।

Gym Supplements : नकली फिटनेस का काला सच

अब आते हैं उस ट्रेंड पर, जो आज के युवाओं में सिर चढ़कर बोल रहा है—मसल्स बिल्डिंग और बॉडी मेकिंग। हर नौजवान को 6-पैक एब्स और चौड़ी छाती चाहिए। यह अच्छी बात है, लेकिन जिस रास्ते पर चलकर वो यह हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, वो विनाशकारी है। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और बिना डिग्री वाले जिम ट्रेनर्स की बातों में आकर आज के युवा डॉक्टर की सलाह के बिना धड़ल्ले से रेड मीट, सिंथेटिक प्रोटीन पाउडर और तरह-तरह के Supplements लेने लगे हैं।

शरीर को प्रोटीन की जरूरत होती है, इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन इसकी अत्यधिक और अनकंट्रोल मात्रा किडनियों के लिए एक दुःस्वप्न जैसी है। हाई प्रोटीन डाइट किडनियों पर अत्यधिक दबाव डालती है और शरीर में यूरिक एसिड का उत्पादन बढ़ाती है, जिससे यूरिक एसिड स्टोन बनने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसके साथ अगर अधूरा हाइड्रेशन (पानी की कमी) हो, तो यह सीधा-सीधा किडनी फेलियर को दावत देना है।

बाज़ार में बिकने वाले कई सप्लीमेंट्स कैल्शियम, विटामिन डी और क्रिएटिन से भरे होते हैं। जब आप बिना किसी मेडिकल सुपरविजन के ये सब कुछ अपने शरीर में उड़ेलते हैं, तो यह सीधे तौर पर पथरी का कारण बनते हैं। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि जवानी में पथरी के मामले बढ़ने के पीछे यह बिना सलाह के सप्लीमेंट लेने और ऐसी “फेक फिटनेस हैबिट्स” अपनाने का बहुत बड़ा हाथ है। बॉडी तो शायद बन जाए, लेकिन अगर किडनियाँ ही पत्थर हो गईं, तो उस बॉडी का क्या फायदा?

Sitting Disease और लापरवाही

राष्ट्र की ताकत का इस तरह बर्बाद होना सिर्फ़ धूप या डाइट का मुद्दा नहीं है, यह एक गतिहीन जीवनशैली का भी नतीजा है। आज का युवा घंटों बैठकर काम करता है, चाहे वो ऑफिस हो या घर पर वर्क फ्रॉम होम (WFH)। फिजिकल एक्टिविटी नाम मात्र की रह गई है। अपर्याप्त नींद और अत्यधिक मानसिक तनाव  भी इस समस्या को बढ़ाते हैं।

ऐसी सुस्त लाइफस्टाइल मेटाबॉलिज्म को पूरी तरह बिगाड़ देती है, जिससे मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस जैसी समस्याएं पैदा होती हैं, जो अंततः किडनी स्टोन के खतरे को बढ़ाती हैं। कई जवान लोग हेल्दी खाना नहीं खाते, एनर्जी के लिए पानी की जगह कॉफी या एनर्जी ड्रिंक्स पर निर्भर हैं। अगर आप पर्याप्त पानी पिए बिना चाय, कॉफी, या कैफीन युक्त एनर्जी ड्रिंक्स का अत्यधिक सेवन करते हैं, तो यह शरीर को और ज्यादा डिहाइड्रेट करती हैं, जिससे पथरी बनने का प्रोसेस तेज हो जाता है।

सबसे खतरनाक बात यह है कि युवा भारत अपनी सेहत को लेकर बेहद लापरवाह है। वो शरीर से मिलने वाले चेतावनी भरे संकेतों को गंभीरता से नहीं लेते। शुरुआत में जब हल्का दर्द होता है या पेशाब में जलन होती है, तो वो इसे गैस की समस्या या यूरीनरी इंफेक्शन समझकर नजरअंदाज कर देते हैं या खुद ही कोई पेनकिलर खा लेते हैं। यह लापरवाही उन्हें सही इलाज से दूर रखती है और समस्या को बढ़ा देती है।

जब इलाज नहीं मिलता, तो पथरी का साइज बढ़ जाता है या वो यूरीनरी ट्रैक्ट  में किसी ऐसी जगह फँस जाती है, जहाँ से वो पेशाब के रास्ते को ब्लॉक कर देती है। तब शुरू होता है असली तांडव—भयंकर, असहनीय दर्द, उल्टी, पेशाब में खून आना। यह सिर्फ दर्द की बात नहीं है, अगर पथरी के कारण यूरिन ब्लॉक हो जाए, तो यूरिन किडनियों की तरफ वापस जाने लगता है, जिससे किडनियों में सूजन आती है, इंफेक्शन होता है और अंततः किडनी पूरी तरह डैमेज हो सकती है। बार-बार किडनी स्टोन होना किडनियों की लॉन्ग-टर्म हेल्थ के लिए एक बड़ा खतरा है।

अब जागने का वक्त है!

हम एक महान राष्ट्र हैं और हमारी युवा आबादी हमारी सबसे बड़ी ताकत है। हम इस ताकत को इस तरह खराब लाइफस्टाइल और अंधी नकल के कारण बर्बाद होने नहीं दे सकते। अच्छी बात यह है कि इस पूरी भयावह स्थिति को बदला जा सकता है। किडनी स्टोन से बचाव करना पूरी तरह मुमकिन है, बशर्ते हम अपने रोजमर्रा के रुटीन को हेल्दी और अनुशासित बनाएं।

इसका बचाव करने के लिए पर्याप्त मात्रा में हाइड्रेशन लेना सबसे बढ़िया और सबसे आसान तरीका है। यह एक राष्ट्रीय संकल्प होना चाहिए। डॉक्टर्स और एक्सपर्ट्स की यह साफ सलाह है कि दिन भर में इतना पानी पिएं कि आपका पेशाब पूरी तरह साफ या हल्का पीला रहे। खासतौर से गर्मी के मौसम में, जब आप बाहर हों या जिम में पसीना बहा रहे हों, तो पानी पीने में कोई कंजूसी न करें।

अपनी डाइट को फिर से भारतीय रंग में रंगने की जरूरत है। इस वेस्टर्न जंक फूड, प्रोसेस्ड मीट, अत्यधिक नमक और शुगरी ड्रिंक्स को अपनी जिंदगी से “आउट” करें। इनकी जगह पर ताजे फल, हरी सब्जियां, फाइबर युक्त आहार और नेचुरल फ्लूइड्स को अपनी डाइट में शामिल करें। फिटनेस का मतलब सिर्फ़ मसल्स नहीं है, फिटनेस का मतलब है एक हेल्दी शरीर, जिसमें हेल्दी किडनियाँ भी शामिल हैं। जिम जाएं, एक्सरसाइज करें, लेकिन सप्लीमेंट्स और हाई प्रोटीन डाइट के जाल में फँसने से पहले एक योग्य डॉक्टर या डाइटीशियन  की सलाह जरूर लें।

राष्ट्र को आपकी जरूरत है, एक स्वस्थ और मजबूत युवा भारत की जरूरत है। अपनी किडनियों को पत्थर मत बनने दीजिए, अपनी सेहत का ख्याल रखिए और एक सशक्त भारत के निर्माण में अपना योगदान दीजिए। यह जंग हमें जीतनी ही होगी, अपने शरीर के भीतर भी और दुनिया के मंच पर भी।

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