अमेरिका की टैरिफ वाली गीदड़भभकी पर भारत का पलटवार, मोदी सरकार के एक फैसले से चित हुआ वाशिंगटन का पूरा सिस्टम

अमेरिका की टैरिफ वाली गीदड़भभकी पर भारत का पलटवार, मोदी सरकार के एक फैसले से चित हुआ वाशिंगटन का पूरा सिस्टम

ग्लोबल ट्रेड और इंटरनेशनल मार्केट्स की दुनिया में आज का दौर किसी महायुद्ध से कम नहीं है। इस युद्ध में हथियारों का नहीं, बल्कि नीतियों, टैरिफ और ट्रेड बैरियर्स का इस्तेमाल होता है। दुनिया के जो खुद को सुपरपावर कहते हैं, वो अक्सर विकासशील देशों की इकॉनमी को कंट्रोल करने के लिए नए-नए हथियाकंडे अपनाते हैं। अमेरिका भी पिछले कुछ समय से भारत के खिलाफ एक ऐसा ही चक्रव्यूह रचने की कोशिश कर रहा था। अमेरिका की कोशिश थी कि कैसे भी करके भारतीय एक्सपोर्ट्स पर भारी-भरकम टैक्स थोप दिया जाए, ताकि ग्लोबल मार्केट में भारत की बढ़ती रफ्तार को ब्रेक लगाया जा सके। लेकिन, अमेरिका यह भूल गया कि यह आज का नया भारत है, जो दबाव में झुकता नहीं, बल्कि सामने वाले की हर चाल को उसी के पाले में धकेल देता है। भारत ने अब एक ऐसा कूटनीतिक और आर्थिक मास्टरस्ट्रोक चला है, जिसने वाशिंगटन से लेकर दुनिया के तमाम बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब्स की नींद उड़ा दी है।

भारत सरकार ने अपनी फॉरेन ट्रेड पॉलिसी यानी विदेश व्यापार नीति में एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक बदलाव किया है। इस नए बदलाव के तहत, अब दुनिया के किसी भी कोने से वह सामान भारत में नहीं बिक सकेगा, जिसे बनाने में ‘जबरन मजदूरी’ या फोर्स्ड लेबर का इस्तेमाल किया गया हो। यह कोई मामूली फैसला नहीं है। यह भारत का वो ब्रह्मास्त्र है, जिसने अमेरिका के उस जांच अभियान की हवा निकाल दी है, जिसके दम पर वह भारत पर 12.5 प्रतिशत तक का एक्स्ट्रा टैरिफ लगाने की धमकी दे रहा था।

इस पूरे गेम प्लान को बहुत ही आसान भाषा में समझते हैं। दरअसल, अमेरिका इन दिनों अपने ट्रेड पार्टनर्स की एक इन्वेस्टिगेशन कर रहा है। वाशिंगटन में बैठे पॉलिसी मेकर्स इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या दुनिया के दूसरे देशों के पास फोर्स्ड लेबर से बने सामान को रोकने के लिए कोई पुख्ता कानून है या नहीं। अमेरिका की नजर इस वक्त भारत के बढ़ते एक्सपोर्ट पर है। आपको बता दें कि अभी अमेरिका को होने वाले हमारे ज्यादातर एक्सपोर्ट पर लगभग 10 प्रतिशत का टैरिफ लगता है। लेकिन अमेरिका इस ताक में था कि वह फोर्स्ड लेबर और अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का बहाना बनाकर भारत पर 12.5 फीसदी का एक और अतिरिक्त टैरिफ थोप दे। अगर ऐसा होता, तो अमेरिका के बाजार में भारतीय सामान बहुत महंगा हो जाता और हमारे एक्सपोर्टर्स को भारी नुकसान उठाना पड़ता। अमेरिका इस तरह के हथकंडे इसलिए अपनाता है ताकि वह दुनिया को यह दिखा सके कि वह लेबर राइट्स का सबसे बड़ा चैंपियन है और बाकी देश नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं।

लेकिन भारत ने अमेरिका के इस ट्रैप को बहुत पहले ही डिकोड कर लिया था। बिना कोई शोर शराबा किए, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत काम करने वाले विदेश व्यापार महानिदेशालय यानी डीजीएफटी (DGFT) ने अपनी फॉरेन ट्रेड पॉलिसी 2023 में एक नया और बेहद सख्त प्रावधान जोड़ दिया। डीजीएफटी ने एक नोटिफिकेशन जारी किया और पॉलिसी में पैराग्राफ 2.20B को शामिल कर लिया। इस एक पैराग्राफ ने पूरे ग्लोबल ट्रेड सिनेरियो को बदलकर रख दिया है। इस नए नियम के तहत, केंद्र सरकार के पास अब यह असीमित अधिकार आ गया है कि वह किसी भी ऐसे प्रोडक्ट के इंपोर्ट को पूरी तरह से बैन कर सकती है, जिसके बारे में यह साबित हो जाए कि उसे बनाने में पूरी तरह से या आंशिक रूप से जबरन मजदूरी कराई गई है।

यह नया कानून ऑफिशियल गजट में छपने के ठीक 30 दिन बाद पूरे देश में सख्ती से लागू हो जाएगा। अब जरा सोचिए, जब अमेरिका भारत से यह सवाल करेगा कि आप फोर्स्ड लेबर को रोकने के लिए क्या कर रहे हैं, तो भारत सीना चौड़ा करके अपनी यह नई ट्रेड पॉलिसी उनके सामने रख देगा। भारत का यह कदम पूरी तरह से इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) के मानकों के अलाइनमेंट में है। भारत ने इस कदम से अमेरिका के हाथ से वह मौका ही छीन लिया, जिसके आधार पर वह हम पर एक्स्ट्रा टैरिफ लगाने की साजिश रच रहा था।

अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह जबरन मजदूरी या फोर्स्ड लेबर है क्या, जिसे लेकर इतना बड़ा फैसला लिया गया है? डीजीएफटी ने अपने नोटिफिकेशन में फॉरेन ट्रेड पॉलिसी के चैप्टर 11 के तहत इसकी एक बहुत ही स्पष्ट और इंटरनेशनल लेवल की डेफिनेशन भी जोड़ दी है। भारत ने इस परिभाषा को इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन के ‘फोर्स्ड लेबर कन्वेंशन, 1930’ से ज्यों का त्यों अपनाया है। आसान शब्दों में कहें तो जबरन मजदूरी का मतलब है कोई भी ऐसा काम या सर्विस, जो किसी व्यक्ति से किसी सजा या खौफ के डर से जबरदस्ती कराई जाए, और जिसके लिए उस व्यक्ति ने अपनी मर्जी से कोई सहमति न दी हो। दुनिया के कई देश अपनी मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट को सस्ता रखने के लिए फैक्ट्रियों में मजदूरों से जानवरों की तरह काम करवाते हैं। उनसे उनके हक छीन लिए जाते हैं। भारत ने साफ कर दिया है कि ऐसे देशों का पाप से सना हुआ सस्ता सामान अब भारतीय बाजार में अपनी जगह नहीं बना पाएगा।

इस पॉलिसी को लागू करने का जो मैकेनिज्म तैयार किया गया है, वह भी बेहद अचूक है। डीजीएफटी कोई हवा में काम नहीं करेगा। अगर किसी विदेशी सामान को लेकर यह इनपुट मिलता है कि इसे जबरन मजदूरी से बनाया गया है, तो डीजीएफटी इसकी बहुत ही डीप इन्वेस्टिगेशन करेगा। यह पूरी जांच प्रक्रिया ‘हैंडबुक ऑफ प्रोसीजर्स, 2023’ के सख्त नियमों के तहत की जाएगी। अगर जांच के दौरान जरा भी सबूत मिलते हैं, तो डीजीएफटी सीधे केंद्र सरकार से सिफारिश करेगा और उस प्रोडक्ट को भारत के बॉर्डर पर ही ब्लॉक कर दिया जाएगा।

भारत का यह फैसला सिर्फ अमेरिका को जवाब देने तक सीमित नहीं है। यह दुनिया को भारत का एक नया रूप दिखा रहा है। एक ऐसा भारत, जो अब ग्लोबल रूल्स को सिर्फ फॉलो नहीं करता, बल्कि उन्हें अपने हिसाब से शेप भी करता है। यह एक स्पष्ट संदेश है कि भारत अब किसी भी देश का डंपिंग ग्राउंड नहीं बनेगा। हम दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक हैं, और अगर किसी को हमारे बाजार में अपना सामान बेचना है, तो उसे हमारे बनाए हुए एथिकल स्टैंडर्ड्स को मानना ही पड़ेगा।

यह कदम भारत के व्यापार नीति ढांचे को एक ऐसी मजबूती दे रहा है, जो आने वाले दशकों तक देश की इकॉनमी को किसी भी विदेशी झटके से बचाएगा। अमेरिका जो अतिरिक्त इंडस्ट्रियल कैपेसिटी और ट्रेड डेफिसिट के नाम पर दुनिया भर के देशों को ब्लैकमेल करने की रणनीति अपनाता है, उसे भारत ने एक ही झटके में न्यूट्रलाइज कर दिया है। ‘विदेशी व्यापार अधिनियम, 1992’ के तहत उठाया गया यह कदम यह साबित करता है कि आज का भारत प्रो-एक्टिव है। हम समस्याओं के आने का इंतजार नहीं करते, बल्कि हम समस्याओं को उनके जन्म लेने से पहले ही खत्म कर देते हैं।

जब भी ग्लोबल मंचों पर ह्यूमन राइट्स या लेबर राइट्स की बात आती है, तो पश्चिमी देश अक्सर खुद को जज की कुर्सी पर बैठा लेते हैं। लेकिन भारत ने अपनी पॉलिसी में आईएलओ (ILO) के मानकों को अपनाकर यह दिखा दिया है कि मोरल हाई ग्राउंड सिर्फ वेस्टर्न देशों की बपौती नहीं है। भारत न सिर्फ अपने मजदूरों के हकों की रक्षा कर रहा है, बल्कि विदेशी मजदूरों के खून-पसीने से बने सस्ते सामान का बहिष्कार करके एक नया ग्लोबल बेंचमार्क सेट कर रहा है।

कुल मिलाकर, भारत की इस नई विदेश व्यापार नीति ने वाशिंगटन के उन तमाम नीति-निर्माताओं को क्लीन बोल्ड कर दिया है, जो भारत पर आर्थिक लगाम कसने के सपने देख रहे थे। 12.5 फीसदी टैरिफ का जो हथियार अमेरिका भारत पर तानने की कोशिश कर रहा था, भारत ने उसी हथियार को अमेरिका के सामने बेअसर कर दिया है। यह एक राष्ट्रवादी, मजबूत और आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर है, जो ग्लोबल ट्रेड के मैदान में अपने नियम खुद तय करता है और पूरी दुनिया को अपनी धुन पर चलने के लिए मजबूर कर देता है।

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