पानी से लेकर कूटनीति तक: जानिए कैसे भारत के एक इशारे पर पानी-पानी हो सकती है ढाका की नई सरकार!

पानी से लेकर कूटनीति तक: जानिए कैसे भारत के एक इशारे पर पानी-पानी हो सकती है ढाका की नई सरकार!

पंद्रह अगस्त को जब पूरा भारत अपनी आजादी का जश्न मना रहा था, ठीक उसी वक्त ढाका के अंधेरे से उड़ान भरने वाली उस सीक्रेट फ्लाइट टीजी 322 में आखिर कौन बैठा था? रॉ चीफ के ढाका से लौटते ही ऐसा क्या हुआ कि बांग्लादेशी खुफिया एजेंसी डीजीएफआई के छह टॉप अधिकारी रातों-रात बैंकॉक के रास्ते सीधे पाकिस्तान के आईएसआई आकाओं की गोद में जा बैठे? क्या 1971 का बदला लेने के लिए कोई नया ब्लूप्रिंट तैयार हो चुका है? एक तरफ बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान दिल्ली के सामने हाथ जोड़कर भारत आने के लिए अनुकूल माहौल की भीख मांग रहे हैं, और दूसरी तरफ पीठ पीछे उनके ही जनरल इस्लामाबाद के बंद कमरों में भारत के खिलाफ कौन सा खूनी खेल रच रहे हैं? आखिर क्यों ढाका, दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच अचानक ये लुका-छिपी शुरू हो गई है? अमेरिका और चीन के पैसों पर इतरा रहे बांग्लादेश को क्या इस बात का अंदाजा है कि भारत सिर्फ एक झटके में पूरे बांग्लादेश को कैसे प्यासा मार सकता है? दो हजार छब्बीस में खत्म हो रही गंगा जल संधि के उस गुप्त पन्ने में आखिर ऐसा क्या लिखा है जिसे याद करते ही तारिक रहमान और उनके जनरलों के पसीने छूट रहे हैं?

आज जो कुछ मैं आपको बताने वाला हूं वो कोई जासूसी फिल्म की कहानी नहीं है, बल्कि ये वो खौफनाक भू-राजनीतिक हकीकत है जो इस वक्त भारत की पूर्वी सीमा पर आकार ले रही है। आप जो न्यूज चैनलों पर देखते हैं, वो सिर्फ सतह की लहरें हैं, लेकिन आज मैं आपको उस गहरे समंदर में लेकर जाऊंगा जहां रॉ, आईएसआई और डीजीएफआई के बीच एक ऐसा खामोश और बेरहम शैडो वॉर चल रहा है, जिसकी भनक आम आदमी को कभी नहीं लगती। इस कहानी की शुरुआत होती है पंद्रह अगस्त दो हजार छब्बीस की उस रहस्यमयी रात से। ढाका का हजरत शाह जलाल इंटरनेशनल एयरपोर्ट। एक तरफ आम मुसाफिरों की भीड़ थी, लेकिन वीआईपी लाउंज में एक अलग ही हलचल थी। थाई एयरवेज की फ्लाइट संख्या टीजी तीन सौ बाइस रनवे पर दौड़ती है और आसमान के अंधेरे में गुम हो जाती है। दुनिया की नजर में ये बैंकॉक जाने वाली एक सामान्य उड़ान थी, लेकिन भारत के खुफिया ग्रिड पर लाल बत्तियां जल उठी थीं। इस फ्लाइट में कोई आम मुसाफिर नहीं, बल्कि बांग्लादेश की मिलिट्री इंटेलिजेंस एजेंसी डीजीएफआई के छह आला अधिकारी सवार थे।

कर्नल मगफुज-उल-बारी के नेतृत्व में विंग कमांडर इमरुल कैस, मोहिउद्दीन मोहम्मद आसिफ, स्क्वाड्रन लीडर रेहान मोहम्मद चौधरी, मुराद हुसैन तुषार और खंडोकर अरिफुल इस्लाम। ये छह नाम उस सीक्रेट मिशन का हिस्सा थे, जिसका अंतिम पड़ाव बैंकॉक नहीं, बल्कि पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद था। आपको क्या लगता है, ये उड़ान अचानक भरी गई थी? बिल्कुल नहीं। इसकी पटकथा ठीक उसी दिन लिखी गई थी, जब भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के प्रमुख का ढाका का गुप्त दौरा खत्म हुआ था। रॉ चीफ की ढाका से वापसी और उसके तुरंत बाद डीजीएफआई अधिकारियों का इस्लामाबाद भागना, ये कोई इत्तेफाक नहीं था। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इत्तेफाक जैसी कोई चीज नहीं होती। यह उस बिसात की एक चाल थी, जो अगस्त दो हजार चौबीस में शेख हसीना के सत्ता से बेदखल होने के बाद से ही बुनी जा रही थी। अब सवाल यह है कि बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारत यात्रा से पहले पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ढाका के साथ मिलकर आखिर कौन सा बड़ा गेम प्लान तैयार कर रही है?

सत्ता का शून्य और बदलता राजनीतिक समीकरण

इस पूरे खुफिया चक्रव्यूह को डिकोड करने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। अगस्त दो हजार चौबीस में जब छात्रों के हिंसक प्रदर्शनों ने बांग्लादेश की सबसे ताकतवर नेता शेख हसीना को रातों-रात देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया, तब ढाका में सत्ता का एक भयानक शून्य पैदा हुआ। हसीना को अपनी जान बचाकर भारत की शरण लेनी पड़ी। इसके बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार बनी। यूनुस का काम सिर्फ चुनाव करवाना था, लेकिन उनके करीब दो साल के कार्यकाल में बांग्लादेश की विदेश नीति की धुरी पूरी तरह से घूम गई। यूनुस प्रशासन ने अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के चलते उन पुरानी रेडिकल ताकतों को फिर से जिंदा कर दिया, जिन्हें शेख हसीना ने अपने पंद्रह साल के शासनकाल में कुचल कर रख दिया था। जमात-ए-इस्लामी और पाकिस्तान समर्थक धड़े फिर से ढाका की सड़कों पर सिर उठाने लगे। चीन के साथ गुपचुप समझौते बढ़ने लगे। फिर दो हजार छब्बीस की शुरुआत में चुनाव हुए और सत्ता में वापसी हुई बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी की। तारिक रहमान, जो सालों से लंदन में निर्वासित जीवन जी रहे थे, वो रातों-रात बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री बन गए।

तारिक रहमान के सत्ता में आते ही बांग्लादेश की सेना और खुफिया एजेंसी डीजीएफआई के ढांचे में भयंकर बदलाव किए गए। मार्च दो हजार छब्बीस में मेजर जनरल कैसर राशिद चौधरी को डीजीएफआई का नया महानिदेशक बनाया गया। यह नियुक्ति कोई सामान्य रूटीन ट्रांसफर नहीं था। कार्यभार संभालने के कुछ ही हफ्तों बाद, एक अप्रैल दो हजार छब्बीस को मेजर जनरल चौधरी सीधे इस्लामाबाद पहुंच गए। वहां उन्होंने पाकिस्तानी सेना के शीर्ष कमांडरों और आईएसआई के आकाओं के साथ बंद कमरों में लंबी गुफ्तगू की। इससे पहले वो मार्च के महीने में भारत भी आए थे, लेकिन नई दिल्ली में उन्होंने जानबूझकर जो किया, वो भारत के लिए एक सीधा कूटनीतिक संदेश था। नई दिल्ली में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा के अधिकारियों से मुलाकात तो की, लेकिन बांग्लादेश के हाई कमिश्नर रियाज हमीदुल्लाह द्वारा आयोजित डिनर का सरेआम बहिष्कार कर दिया। कूटनीति की भाषा में इसका मतलब था कि बांग्लादेश अब भारत के प्रभाव क्षेत्र से बाहर निकलकर पाकिस्तान और चीन की गोद में बैठने की तैयारी कर रहा है।

रॉ का आक्रामक रुख और शैडो वॉर

अब आपके दिमाग में एक सवाल हथौड़े की तरह बज रहा होगा। जब हमारे पड़ोस में इतना बड़ा खेल हो रहा है, तो हमारी खुफिया एजेंसी रॉ क्या कर रही है? क्या भारत सरकार और प्रधानमंत्री मोदी की टीम हाथ पर हाथ धरे बैठी है? इसका जवाब आपको पर्दे के पीछे चल रहे उस शैडो वॉर में मिलेगा, जिसे भारत ने बहुत ही आक्रामक तरीके से लॉन्च कर दिया है। रॉ बहुत अच्छी तरह जानती है कि पाकिस्तान की आईएसआई इस वक्त उन्नीस सौ इकहत्तर के सरेंडर का बदला लेने की फिराक में है। पाकिस्तान की इकॉनमी भले ही वेंटिलेटर पर हो, लेकिन भारत को लहूलुहान करने की उनकी नीयत में कोई कमी नहीं आई है। पाकिस्तान का एकमात्र लक्ष्य भारत की पूर्वी सीमा यानी बांग्लादेश को कश्मीर की तरह अशांत करना है, ताकि भारतीय सेना और संसाधनों को टू-फ्रंट वॉर में उलझाया जा सके। रॉ चीफ का ढाका जाना कोई शिष्टाचार भेंट नहीं थी। वो एक सख्त अल्टीमेटम था। भारतीय खुफिया ग्रिड ने डीजीएफआई और आईएसआई के बीच हो रहे हर डिजिटल और ह्यूमन संचार को इंटरसेप्ट कर लिया था। रॉ ने ढाका में सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की आंखों में आंखें डालकर यह स्पष्ट कर दिया कि अगर बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल भारत के पूर्वोत्तर राज्यों, विशेषकर असम, मेघालय और त्रिपुरा में उग्रवाद फैलाने के लिए किया गया, तो भारत के जवाबी कदम इतने घातक होंगे कि ढाका की सत्ता उसे बर्दाश्त नहीं कर पाएगी।

आपको याद दिला दूं कि दो हजार एक से दो हजार छह के बीच जब बांग्लादेश में बीएनपी का शासन था, तब उल्फा और एनडीएफबी जैसे आतंकी गुटों के कैंप बांग्लादेश में धड़ल्ले से चलते थे। भारत किसी भी कीमत पर उस इतिहास को दोहराने नहीं देगा। रॉ इस वक्त दो मोर्चों पर एक साथ काम कर रही है। पहला है टैक्टिकल इंटेलिजेंस। इसके तहत डीजीएफआई के उन छह अधिकारियों की पल-पल की लोकेशन और उनकी मीटिंग्स को ट्रैक किया जा रहा है, जो बैंकॉक के रास्ते इस्लामाबाद गए हैं। रॉ यह पता लगाने में जुटी है कि क्या पाकिस्तान हथियारों की कोई नई खेप, ड्रोन तकनीक या साइबर वॉरफेयर का कोई सेटअप कॉक्स बाजार या चटगांव के समुद्री रास्ते से म्यांमार के विद्रोही गुटों तक पहुंचाने की योजना बना रहा है, ताकि वहां से इसे भारत के पूर्वोत्तर में धकेला जा सके। दूसरा मोर्चा है स्ट्रैटेजिक पेनिट्रेशन। रॉ ने बीएनपी सरकार के अंदर मौजूद उन यथार्थवादी नेताओं और बांग्लादेशी सेना के उन कमांडरों के साथ एक डीप बैक-चैनल संपर्क बना लिया है, जो ये अच्छी तरह जानते हैं कि पाकिस्तान के साथ जाने का मतलब बांग्लादेश का पूर्ण आर्थिक विनाश है।

भूगोल की मजबूरी और कूटनीतिक संयम

लेकिन यहाँ एक और बड़ा सवाल खड़ा होता है। जो सवाल हर सच्चे भारतीय के मन में उठ रहा है। जब तारिक रहमान की पार्टी का इतिहास इतना भारत विरोधी रहा है, जब उनका डीजीएफआई सीधे आईएसआई के साथ मिलकर साजिश रच रहा है, तो भारत तारिक रहमान को इतना भाव क्यों दे रहा है? भारत उन्हें ब्रिक्स और बिम्सटेक जैसे वैश्विक मंचों पर क्यों बुला रहा है? भारत सरकार सीधे तौर पर तारिक रहमान सरकार का बहिष्कार करके उन्हें घुटनों पर क्यों नहीं ला देती? ढाका में भारत के हाई कमिश्नर दिनेश त्रिवेदी क्यों कह रहे हैं कि मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं और हम तारिक रहमान के भारत दौरे की उम्मीद कर रहे हैं?

यहीं पर आम आदमी की सोच और एक सुपरपावर की स्ट्रैटेजिक थिंकिंग में फर्क आता है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भावनाओं, गुस्से या ईगो की कोई जगह नहीं होती। यहां सिर्फ भूगोल, अर्थव्यवस्था और नेशनल इंटरेस्ट काम करता है। भारत की यह कूटनीति कोई मजबूरी नहीं है, बल्कि यह प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर का स्ट्रैटेजिक पेशेंस और कैलकुलेटेड एंगेजमेंट है। भारत अगर आज तारिक रहमान को झटके से पटक देता है, तो इसके भयंकर परिणाम हो सकते हैं। सबसे पहला और सबसे बड़ा कारण है हमारा भूगोल। आप अपना इतिहास बदल सकते हैं, अपने दोस्त बदल सकते हैं, लेकिन आप अपना भूगोल और अपने पड़ोसी को नक्शे से मिटा नहीं सकते। भारत और बांग्लादेश के बीच चार हजार छियानबे किलोमीटर लंबी सरहद है। यह भारत की किसी भी देश के साथ सबसे लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। भारत के पांच राज्य, पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम सीधे बांग्लादेश से जुड़े हुए हैं।

इससे भी बड़ा खतरा है भारत का चिकन नेक, जिसे सिलीगुड़ी कॉरिडोर कहा जाता है। यह वो संकरा रास्ता है जो पूरे पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्से से जोड़ता है। एक जगह पर यह कॉरिडोर मात्र बाईस किलोमीटर चौड़ा है। अब जरा एक डरावने सिनेरियो की कल्पना कीजिए। अगर भारत आज गुस्से में आकर तारिक रहमान से रिश्ते तोड़ लेता है, तो इसका सीधा मतलब होगा कि बांग्लादेश पूरी तरह से चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी और पाकिस्तान की आईएसआई की गोद में बैठ जाएगा। अगर चीन और पाकिस्तान की सेनाएं ढाका के पूर्ण समर्थन के साथ भारत के चिकन नेक से मात्र पचास किलोमीटर दूर आकर बैठ जाएं, तो यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कितना बड़ा दुस्वप्न होगा। भारत किसी भी कीमत पर बांग्लादेश को दूसरा मालदीव या श्रीलंका नहीं बनने दे सकता, जहां चीन ने कर्ज के जाल में फंसाकर अपना गहरा प्रभाव बना लिया था। भारत की नीति साफ है, दुश्मन को दूर से धमकाने से बेहतर है कि उसे अपने आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव के घेरे में बांध कर रखा जाए।

शेख हसीना का ट्रम्प कार्ड और वाटर डिप्लोमेसी

दूसरा बड़ा कारण है हमारी आर्थिक और ढांचागत निर्भरता। पिछले पंद्रह सालों में भारत ने शेख हसीना के साथ मिलकर बांग्लादेश के माध्यम से पूर्वोत्तर तक पहुंचने के लिए रेल, सड़क और जलमार्ग का एक विशाल ट्रांजिट नेटवर्क तैयार किया है। अगर भारत के रिश्ते खराब होते हैं, तो अगरतला, गुवाहाटी और शिलॉन्ग तक माल पहुंचाने का खर्च और समय कई गुना बढ़ जाएगा। तारिक रहमान को साथ लेकर चलने में ही भारत का राष्ट्रीय हित छिपा है, ताकि ये रणनीतिक ट्रांजिट रूट हर हाल में खुले रहें। लेकिन आपको क्या लगता है, तारिक रहमान को भारत की इस मजबूरी का फायदा उठाने दिया जाएगा? बिल्कुल नहीं। क्योंकि भारत के पास इस वक्त कूटनीति का सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र मौजूद है, और वह ब्रह्मास्त्र है शेख हसीना। जी हां, शेख हसीना का ट्रम्प कार्ड। भारत तारिक रहमान को इसलिए भी एंगेज कर रहा है क्योंकि शेख हसीना इस वक्त दिल्ली में सुरक्षित बैठी हैं। बांग्लादेश की एक विशेष ट्रिब्यूनल उन्हें मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए फांसी की सजा सुना चुकी है और ढाका लगातार उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है। बांग्लादेश सरकार ने तो यहां तक शर्त रख दी है कि तारिक रहमान भारत तभी आएंगे जब भारत हसीना को सौंप देगा, या कम से कम प्रत्यर्पण के लिए कोई अनुकूल माहौल बनाएगा। लेकिन भारत सरकार बहुत ही शातिर और कानूनी तरीके से इस मामले को हैंडल कर रही है। भारत का विदेश मंत्रालय साफ कह चुका है कि प्रत्यर्पण का अनुरोध कानूनी जांच के दायरे में है। दुनिया जानती है कि भारत शेख हसीना को कभी वापस नहीं भेजेगा, क्योंकि यह भारत के कूटनीतिक इतिहास पर एक बदनुमा दाग होगा कि उसने अपने सबसे वफादार सहयोगी को मौत के मुंह में धकेल दिया।

लेकिन हसीना की भारत में मौजूदगी तारिक रहमान के सिर पर लटकती एक नंगी तलवार है। तारिक रहमान को यह खौफ है कि अगर वो सीमा पार करते हैं या पाकिस्तान की तरफ ज्यादा झुकते हैं, तो भारत शेख हसीना की अवामी लीग के बचे हुए लाखों काडरों को गुप्त रूप से समर्थन देकर बांग्लादेश में फिर से एक राजनीतिक तूफान खड़ा कर सकता है। हसीना ने हाल ही में बयान दिया है कि वो दिसंबर तक वापस अपने देश लौट सकती हैं। यह बयान सिर्फ एक बयान नहीं था, बल्कि तारिक रहमान के लिए दिल्ली की तरफ से एक मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा था। भारत तारिक रहमान को यह जता रहा है कि सत्ता की चाबी अभी भी दिल्ली के पास है।

अब बात करते हैं उस असल वजह की, जिसने तारिक रहमान की रातों की नींद उड़ा रखी है। बांग्लादेश की सरकार बाहर से भले ही चीन और अमेरिका के पैसों पर इतरा रही हो, लेकिन अंदर से उनकी अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह कांप रही है। ब्रुनेई दारुस्सलाम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अहसान उल्लाह ने अपने एक रिसर्च पेपर में बांग्लादेश की इस खौफनाक हकीकत को बेपर्दा किया है। चौबीस नवंबर दो हजार छब्बीस की तारीख। यह वो तारीख है जब बांग्लादेश सबसे कम विकसित देशों यानी एलडीसी की श्रेणी से बाहर आ जाएगा। बाहर से देखने पर यह सम्मान की बात लगती है, लेकिन अर्थशास्त्र की भाषा में यह बांग्लादेश के लिए एक टाइम बम है। एलडीसी से बाहर आते ही बांग्लादेश को अमेरिका और यूरोप में जो ड्यूटी-फ्री यानी बिना टैक्स के एक्सपोर्ट करने की छूट मिलती थी, वो रातों-रात खत्म हो जाएगी। आपको बता दूं कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का अस्सी प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा सिर्फ रेडीमेड गारमेंट्स यानी कपड़ा उद्योग पर टिका है। जैसे ही यह छूट खत्म होगी, बांग्लादेश का एक्सपोर्ट धड़ाम से गिरेगा और लाखों लोग रातों-रात बेरोजगार हो जाएंगे।

अमेरिका बांग्लादेश का सबसे बड़ा निर्यातक बाजार है, और चीन वहां का सबसे बड़ा इन्वेस्टर है जो उन्हें कच्चा माल सप्लाई करता है। तारिक रहमान बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि पाकिस्तान उन्हें आतंकवाद, स्लीपर सेल और धार्मिक कट्टरवाद के अलावा और कुछ नहीं दे सकता। पाकिस्तान खुद कटोरा लेकर आईएमएफ के दरवाजे पर भीख मांग रहा है, वो बांग्लादेश को क्या बचाएगा? रहमान को पता है कि अगर उन्हें अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को बचाना है, तो उन्हें भारत के एक सौ चालीस करोड़ लोगों के विशाल बाजार, भारत की सस्ती बिजली और भारत से बहने वाली नदियों की सख्त जरूरत है।

और यही वो पॉइंट है जहां भारत का सबसे खतरनाक और खामोश हथियार सामने आता है। जल कूटनीति, यानी वाटर डिप्लोमेसी। भारत और बांग्लादेश के बीच चौवन नदियां साझा होती हैं। तीस्ता नदी के पानी को लेकर तो विवाद चल ही रहा है, लेकिन उससे भी बड़ा और खौफनाक खतरा गंगा जल संधि है। उन्नीस सौ छियानवे में भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के पानी को लेकर तीस साल की एक संधि हुई थी। यह संधि दो हजार छब्बीस के अंत में खत्म हो रही है। जरा सोचिए, अगर भारत सरकार इस संधि को रिन्यू करने से मना कर दे, या अपनी शर्तें इतनी कड़ी कर दे कि बांग्लादेश को पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसना पड़े, तो क्या होगा? बांग्लादेश का एक बहुत बड़ा कृषि क्षेत्र सूखे और जल संकट की चपेट में आ जाएगा। भारत के पास पानी के रूप में एक ऐसा अचूक हथियार है, जिसके आगे न तो पाकिस्तान की आईएसआई कुछ कर सकती है और न ही चीन की कोई हाइपरसोनिक मिसाइल। तारिक रहमान और उनके जनरलों को यह बात बहुत अच्छे से पता है कि भारत अगर अपनी पर आ गया, तो वो बिना एक भी गोली चलाए पूरे बांग्लादेश को प्यासा मार सकता है।

नया भारत और आधुनिक चाणक्य नीति

यही वजह है कि जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बारह और तेरह सितंबर को होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए तारिक रहमान को आमंत्रित किया, तो ढाका में हड़कंप मच गया। भारत ने यह न्योता बहुत ही स्मार्ट तरीके से बिम्सटेक के अध्यक्ष के रूप में दिया है। यह भारत की चाणक्य नीति का सबसे बेहतरीन उदाहरण है। अगर भारत सीधे द्विपक्षीय वार्ता का न्योता देता, तो तारिक रहमान पर अपने देश के कट्टरपंथियों का दबाव होता कि वो शेख हसीना की वजह से इस न्योते को ठुकरा दें। लेकिन ब्रिक्स और बिम्सटेक जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों का न्योता देकर भारत ने गेंद तारिक रहमान के पाले में डाल दी है। अगर वो नहीं आते हैं, तो वो सिर्फ भारत का नहीं, बल्कि पूरे ब्रिक्स समूह का अपमान करेंगे, जिसमें रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे दिग्गज देश शामिल हैं। तारिक रहमान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह से अलग-थलग पड़ जाएंगे।

भारत इस वक्त ढाका के साथ माइंड गेम्स खेल रहा है। एक तरफ भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी बड़ी मीठी भाषा में कह रहे हैं कि दो संप्रभु देशों के बीच मतभेद हो सकते हैं, हमारा मकसद एक सुनहरा दौर लाना है। लेकिन दूसरी तरफ, भारत अपने कूटनीतिक मोहरों को कस रहा है। पश्चिम बंगाल पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स यानी एसटीएफ ने उत्तर चौबीस परगना के बनगांव से बांग्लादेशी राजनीतिक कार्यकर्ता उस्मान हादी की हत्या के जिन दो आरोपियों को मार्च में गिरफ्तार किया था, भारत उन्हें बांग्लादेश को सौंपने से साफ इनकार कर रहा है। भारत हर एक मोहरे, हर एक मुजरिम और हर एक समझौते का इस्तेमाल एक बहुत बड़ी कूटनीतिक सौदेबाजी के लिए कर रहा है।

अब हम इस खौफनाक खेल के क्लाइमैक्स पर पहुंच चुके हैं। पर्दे के पीछे चल क्या रहा है? इसका सीधा सा जवाब है कि इस वक्त दक्षिण एशिया में एक अदृश्य, लेकिन बेहद खतरनाक खुफिया युद्ध चल रहा है। तारिक रहमान पचास प्रतिशत से ज्यादा संभावनाओं के साथ भारत आएंगे। जब वो प्रधानमंत्री मोदी के साथ दिल्ली के साउथ ब्लॉक के किसी बंद कमरे में बैठेंगे, तो यकीन मानिए, बाहर आने वाली प्रेस रिलीज में वो सच्चाई कभी नहीं बताई जाएगी जो उस कमरे के अंदर घटेगी। उस कमरे के अंदर भारत तारिक रहमान के सामने एक बहुत ही स्पष्ट और सख्त लक्ष्मण रेखा खींचेगा।

उस लक्ष्मण रेखा के इस पार, भारत का विशाल बाजार होगा, आर्थिक पैकेज होगा, गंगा जल संधि का नवीनीकरण होगा, ट्रांजिट रूट से होने वाली अरबों डॉलर की कमाई होगी और सबसे बड़ी बात, ढाका में तारिक रहमान की एक स्थिर सरकार की गारंटी होगी। लेकिन, अगर तारिक रहमान ने वो लक्ष्मण रेखा पार की, अगर उन्होंने आईएसआई के साथ मिलकर भारत के पूर्वोत्तर में अस्थिरता फैलाने की एक भी कोशिश की, तो उस रेखा के पार सिर्फ तबाही होगी। भारत शेख हसीना के कार्ड का इस्तेमाल करके बांग्लादेश में रातों-रात एक नया राजनीतिक भूचाल ला देगा। पानी से लेकर व्यापार तक की ऐसी नाकेबंदी की जाएगी कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था घुटनों के बल गिर पड़ेगी।

आईएसआई अधिकारियों से मिलने पाकिस्तान गए डीजीएफआई के वो छह अधिकारी बैंकॉक के होटलों में बैठकर भले ही कितने ही खूनी मंसूबे क्यों न बांध लें, लेकिन रॉ का सिंडिकेट उनसे हमेशा दो कदम आगे चल रहा है। तारिक रहमान को आज नहीं तो कल यह कड़वी सच्चाई स्वीकार करनी ही होगी कि पाकिस्तान के साथ दोस्ती एक ऐसे दीमक की तरह है, जो बांग्लादेश के बचे-कूचे आर्थिक ढांचे को अंदर से पूरी तरह खोखला कर देगी। भारत की विदेश नीति बिल्कुल स्पष्ट है। हम अपने पड़ोसी को नक्शे से हटा नहीं सकते, इसलिए हम उसे झटके से पटकने के बजाय, उसे आर्थिक, भौगोलिक और कूटनीतिक मजबूरियों के एक ऐसे मजबूत जाल में फंसा कर रखेंगे, कि वो चाहकर भी हमारे दुश्मनों के हाथों का खिलौना न बन सके।

यही है नए भारत की आधुनिक चाणक्य नीति। जहां युद्ध सिर्फ सरहदों पर गोलियों से नहीं लड़ा जाता, बल्कि बंद कमरों में, खुफिया फाइलों में, पानी की संधियों में और कूटनीतिक मुस्कुराहटों के पीछे लड़ा और जीता जाता है। आने वाला सितंबर का महीना सिर्फ एक महीना नहीं है, यह वो समय है जो यह तय करेगा कि दक्षिण एशिया का यह भूगोल एक नए शांति काल में प्रवेश करेगा, या फिर एक नए, खौफनाक और अंतहीन शीत युद्ध की शुरुआत होगी। भारत पूरी तरह से तैयार है, अब बारी ढाका की है कि वो अपना भविष्य चुन ले।

You Might Also Like

View More

Latest & Breaking Updates

All Stories