अमेरिका और फ्रांस की राह पर नया हिंदुस्तान, POCSO के मामलों पर लगाम कसने के लिए स्कूलों का सिलेबस बदलने की तैयारी

अमेरिका और फ्रांस की राह पर नया हिंदुस्तान, POCSO के मामलों पर लगाम कसने के लिए स्कूलों का सिलेबस बदलने की तैयारी

इक्कीसवीं सदी का नया हिंदुस्तान अब सिर्फ अपनी रक्षा और अर्थव्यवस्था में ही दुनिया के विकसित देशों को टक्कर नहीं दे रहा है, बल्कि सामाजिक सुधारों और नई सोच के मामले में भी वो एक ग्लोबल लीडर बनकर उभर रहा है। एक ऐसी बंदिश, एक ऐसी झिझक जिसने दशकों से हमारे समाज की सोच को जकड़ रखा था, अब वो हमेशा के लिए टूटने जा रही है। आज हम आपको एक ऐसे ऐतिहासिक फैसले के बारे में बताने जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर देश के भविष्य, हमारे बच्चों और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा से जुड़ा है। भारत सरकार ने देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के भीतर एक ऐसा बड़ा ऐलान कर दिया है, जिसकी मांग सालों से हो रही थी लेकिन किसी भी सरकार ने यह बोल्ड कदम उठाने की हिम्मत नहीं दिखाई थी। अब अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस जैसे विकसित देशों की तरह भारत के स्कूलों में भी कॉम्प्रेहेंसिव सेक्स एजुकेशन को मुख्य सिलेबस का हिस्सा बनाया जाएगा। यह सिर्फ एक फैसला नहीं है, बल्कि एक जागरूक और सुरक्षित हिंदुस्तान की तरफ उठाया गया सबसे मजबूत कदम है।

सबसे पहले बात करते हैं कि आखिर सुप्रीम कोर्ट के भीतर हुआ क्या है। देश की सर्वोच्च अदालत में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की एक अहम बेंच बैठी थी। इसी बेंच के सामने केंद्र सरकार का पक्ष रखने के लिए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी मौजूद थीं। उन्होंने अदालत को पूरे भरोसे और स्पष्टता के साथ बताया कि भारत सरकार ने स्कूलों और कॉलेजों में कॉम्प्रेहेंसिव सेक्स एजुकेशन शुरू करने के लिए एक विशेष कमिटी की रिपोर्ट को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया है। सरकार का यह स्टैंड बिल्कुल साफ है कि जैसे ही सुप्रीम कोर्ट से इस रिपोर्ट और प्लान को अंतिम मंजूरी मिलती है, इसे पूरे देश के एजुकेशन सिस्टम में लागू कर दिया जाएगा। सरकार के इस जवाब ने यह साबित कर दिया है कि आज का सिस्टम पुरानी दकियानूसी सोच से बाहर निकलकर बच्चों के हकों और उनकी सही तालीम के लिए कड़े फैसले लेने से पीछे नहीं हटता।

अब सवाल यह उठता है कि अचानक इस एजुकेशन रिफॉर्म की जरूरत क्यों पड़ी और यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा। इसके पीछे की हकीकत को समझना बहुत जरूरी है। दरअसल पिछले कुछ सालों से हमारे देश का लीगल सिस्टम एक बहुत ही पेचीदा और गंभीर समस्या से जूझ रहा था। यह समस्या पॉक्सो एक्ट यानी प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस एक्ट से जुड़ी थी। कानून के मुताबिक अठारह साल से कम उम्र के बच्चों के बीच किसी भी तरह का शारीरिक संबंध अपराध की श्रेणी में आता है। लेकिन समाज की जमीनी हकीकत यह है कि आज के दौर में इंटरनेट और सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण टीनएजर्स यानी किशोरों के बीच आपसी सहमति से प्रेम संबंध बन रहे हैं।

ऐसे मामलों में जब कोई शिकायत दर्ज होती है, तो लड़कों को सीधे पॉक्सो जैसे बेहद सख्त कानून के तहत क्रिमिनल मान लिया जाता है, जिससे उनका पूरा भविष्य बर्बाद हो जाता है। नाबालिगों के गर्भवती होने के मामलों में भी कानूनी जटिलताएं लगातार बढ़ रही थीं। इन्हीं मामलों की बढ़ती संख्या को देखकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि वह इस समस्या का कोई ठोस और मनोवैज्ञानिक समाधान निकाले, ताकि किशोरों को क्रिमिनल बनने से रोका जा सके और उन्हें सही दिशा दिखाई जा सके। इसी आदेश के पालन में सरकार ने यह पूरा खाका तैयार किया है।

इस बड़े मिशन को अंजाम देने के लिए केंद्र सरकार ने कोई जल्दबाजी नहीं की, बल्कि एक बेहद पेशेवर और हाई लेवल कमिटी का गठन किया। महिला और बाल विकास मंत्रालय के एडिशनल सेक्रेटरी की अध्यक्षता में 26 सदस्यों वाली एक राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति बनाई गई। इस पैनल में कोई आम लोग नहीं थे, बल्कि इसमें टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के दिग्गज एक्सपर्ट्स, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, कई केंद्रीय मंत्रालयों और राज्य सरकारों के बड़े अधिकारी शामिल थे। इसके अलावा नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स और नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी के प्रतिनिधियों को भी इस पैनल का हिस्सा बनाया गया।

इस पैनल का मुख्य काम यह स्टडी करना था कि आपसी सहमति से संबंध बनाने वाले किशोरों की निजता और उनके अधिकारों को पॉक्सो एक्ट के संदर्भ में कैसे देखा जाए। इस 26 सदस्यीय एक्सपर्ट पैनल ने महीनों की रिसर्च के बाद सरकार को यह सुझाव दिया कि अब वक्त आ गया है जब स्कूलों में कॉम्प्रेहेंसिव सेक्स एजुकेशन और बच्चों के यौन शोषण जैसे बेहद संवेदनशील विषयों को मुख्य सिलेबस का एक अनिवार्य हिस्सा बना दिया जाए।

पैनल ने अपनी रिपोर्ट में हवा हवाई बातें नहीं की हैं, बल्कि ग्राउंड जीरो के लिए एक परफेक्ट ब्लूप्रिंट तैयार किया है। एक्सपर्ट्स का साफ मानना है कि बच्चों को यह शिक्षा तब नहीं दी जानी चाहिए जब वो बड़े हो जाएं, बल्कि इसकी शुरुआत फाउंडेशनल स्टेज यानी प्राइमरी स्कूलों के स्तर से ही होनी चाहिए। बच्चों को उनके शरीर के अंगों की सही जानकारी, पर्सनल हाइजीन यानी साफ सफाई की बुनियादी बातें और सबसे अहम सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श यानी गुड टच और बैड टच का फर्क बचपन से ही सिखाया जाना चाहिए। जब बच्चा यह जान लेगा कि उसकी फिजिकल बाउंड्रीज क्या हैं, तो उसके साथ होने वाले किसी भी तरह के शोषण के चांसेस न के बराबर रह जाएंगे।

इस पूरे सिलेबस को तैयार करने की जिम्मेदारी नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग यानी एनसीईआरटी को सौंपने की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट में यह बात बहुत ही मजबूती के साथ कही गई है कि किशोरों को दी जाने वाली यह तालीम नेशनल एजुकेशन पॉलिसी यानी एनईपी 2020 के बिल्कुल अनुरूप होनी चाहिए। एनईपी 2020 का मुख्य विजन बच्चों को सिर्फ रट्टा मारना नहीं सिखाता, बल्कि उनके भीतर क्रिटिकल थिंकिंग, लाइफ स्किल्स और समग्र विकास को बढ़ावा देता है। इसी विजन को ध्यान में रखते हुए मौजूदा एजुकेशन प्रोग्राम्स को अपग्रेड किया जाएगा और उम्र के हिसाब से बच्चों को सही जानकारी दी जाएगी।

इस पूरे प्लान को जमीन पर उतारने का तरीका भी बहुत ही साइंटिफिक और एडवांस रखा गया है। रिपोर्ट में यह कड़ा सुझाव दिया गया है कि प्राइमरी स्कूल के स्तर से ही हर स्कूल में एक डेडिकेटेड एक्सपर्ट टीचर यानी एक विशेष शिक्षक नियुक्त किया जाना चाहिए। यह कोई नॉर्मल क्लास नहीं होगी, बल्कि इन विषयों पर हर हफ्ते कम से कम दो बार 15 से 20 मिनट की अनिवार्य कक्षाएं आयोजित की जानी चाहिए।

कमिटी यह बात भी बहुत अच्छी तरह जानती है कि भारत जैसे समाज में यह बदलाव तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक इसमें माता पिता को शामिल न किया जाए। इसलिए यह सिफारिश भी की गई है कि पेरेंट्स, अभिभावकों और शिक्षकों के लिए भी विशेष मीटिंग्स आयोजित की जाएं। उन्हें यह समझाया जाए कि बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास कैसे होता है और उन्हें सेक्स एजुकेशन देना समाज के लिए कितना जरूरी है। जब स्कूल और घर दोनों जगह का माहौल खुले विचारों वाला होगा, तभी बच्चे अपने मन की बात बिना किसी डर के बता पाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट में जब इस बेहतरीन और रिसर्च बेस्ड रिपोर्ट को पेश किया गया, तो वहां मौजूद हर शख्स ने इसकी तारीफ की। इस मामले में एमिकस क्यूरी के तौर पर अदालत की मदद कर रहीं सीनियर वकील माधवी दीवान और लिज मैथ्यू ने भी स्पष्ट किया कि कॉम्प्रिहेंसिव सेक्स एजुकेशन को विस्तार से और पूरी गंभीरता के साथ लागू करने की सख्त जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट भी सरकार की इस पहल और कमिटी की रिपोर्ट से संतुष्ट नजर आया और वह इस मामले पर उचित आदेश पारित करने के लिए सहमत हो गया है।

अगर हम ग्लोबल पर्सपेक्टिव की बात करें, तो अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन और नीदरलैंड जैसे देशों ने दशकों पहले ही अपने स्कूलों में सेक्स एजुकेशन को अनिवार्य कर दिया था। वहां के आंकड़े बताते हैं कि सही शिक्षा मिलने के कारण टीनएज प्रेगनेंसी और चाइल्ड एब्यूज के मामलों में भारी गिरावट आई है। भारत अब उसी कतार में खड़ा होने जा रहा है।

हमारा देश युवाओं का देश है। अगर हमारी युवा पीढ़ी मानसिक रूप से मजबूत होगी, उन्हें अपने शरीर और कानून की सही जानकारी होगी, तो कोई भी उनका फायदा नहीं उठा सकेगा। यह भारत की कूटनीतिक और सामाजिक दोनों मोर्चों पर एक बड़ी जीत है। अब वह दिन दूर नहीं जब हमारे स्कूल सिर्फ डिग्रियां नहीं बांटेंगे, बल्कि एक ऐसा नागरिक तैयार करेंगे जो जागरूक होगा, निडर होगा और नए भारत की मजबूत नींव रखेगा। सरकार और सुप्रीम कोर्ट का यह तालमेल इस बात का सबूत है कि जब बात देश के बच्चों के सुरक्षित भविष्य की आती है, तो पूरा सिस्टम एक होकर काम करता है।

 

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