11 नवंबर 2024 की सुबह ठीक 09:00 बजे, नई दिल्ली के धौला कुआं स्थित मानेकशॉ सेंटर का एक अत्यंत सुरक्षित वॉर रूम पूरी तरह सील कर दिया गया था। कमरे के चारों तरफ विशेष इलेक्ट्रॉनिक शील्डिंग थी, ताकि कोई भी बाहरी सिग्नल न तो अंदर आ सके और न ही अंदर की कोई भनक बाहर जा सके। उस हॉल के भीतर तत्कालीन चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान के साथ थल सेना, नौसेना और वायुसेना के शीर्ष ऑपरेशनल कमांडर मौजूद थे। उनके ठीक सामने बैठे थे डीआरडीओ के शीर्ष वैज्ञानिक और इसरो के रणनीतिकार। इस त्रि-सेवा अभ्यास का कोडनेम था- ‘अंतरिक्ष अभ्यास 2024’। लेकिन इस सीक्रेट मीटिंग के बाद अब स्पेस में भारत की उस गुप्त ताकत का खुलासा हुआ है जिसने अमेरिका से लेकर चीन तक को हैरान कर डाला है। भारत ने अंतरिक्ष में वो सेना तैयार कर ली है जिसकी भनक तक दुनिया की स्पेस एजेंसियों को नहीं लग पाई थी।
आखिर 11 नवंबर 2024 की सुबह दिल्ली के एक इलेक्ट्रॉनिकली शील्डेड वॉर रूम में ऐसा क्या हुआ था, जिसने भारतीय सेना की 70 साल पुरानी सैन्य नीति को हमेशा के लिए दफन कर दिया? क्या भारतीय सेना के तीनों अंग मिलकर चुपचाप एक स्वतंत्र ‘इंडियन स्पेस फोर्स’ खड़ी कर चुके हैं, और क्या 500 किलोमीटर ऊपर वह साइलेंट वॉर शुरू हो चुका है जहां से अब कोई वापसी नहीं? एलएसी पर हमारे टैंकों और बंकरों को 24 घंटे ट्रैक कर रहे चीन के 900 से ज्यादा जासूसी उपग्रहों को भारत बिना एक भी मिसाइल दागे कैसे बेअसर करने जा रहा है? क्या कुछ युवा भारतीय इंजीनियर चंद लाख के बलून्स से बीजिंग के अरबों डॉलर के स्पेस नेटवर्क को चेक-मेट कर सकते हैं?
दोस्तो, भारत की स्पेस फोर्स को लेकर आज जो खबर सामने आई है उसने पूरी दुनिया के होश ठिकाने लगा डाले हैं। जिस सेना को भारत ने धरती से 500 किलोमीटर ऊपर तैयार कर डाला है उसने चीन को सबसे बड़ा सदमा दे दिया है। भारत की इस खतरनाक तैयारी को हम पूरी तरह डिकोड करने वाले हैं।
आजादी के बाद से सात दशकों तक भारत का आधिकारिक रणनीतिक रुख हमेशा यही रहा था कि अंतरिक्ष केवल शांतिपूर्ण वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए है। विक्रम साराभाई से लेकर सतीश धवन तक, हमारी अंतरिक्ष यात्रा का केंद्र मौसम पूर्वानुमान, कृषि निगरानी, ग्रामीण शिक्षा और चंद्रयान जैसे वैज्ञानिक मिशन रहे। लेकिन 11 नवंबर 2024 को दिल्ली के उस बंद वॉर रूम में इस पुरानी नीति को हमेशा के लिए पीछे छोड़ दिया गया। भारत ने पहली बार आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार किया कि भविष्य का युद्ध केवल कश्मीर की बर्फीली चोटियों, थार के रेगिस्तान या हिंद महासागर की लहरों पर नहीं लड़ा जाएगा। आने वाले समय का असली युद्ध पृथ्वी की सतह से 160 से 36,000 किलोमीटर ऊपर लड़ा जाएगा, जहां कोई आवाज नहीं होती और जहां पारंपरिक बारूद के बिना केवल लेजर किरणों और जैमिंग से पूरे देश की सेना को पंगु बनाया जा सकता है।
यह कोई काल्पनिक परिदृश्य नहीं है, बल्कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पहली गोली चलने से बहुत पहले शुरू हो चुका एक साइलेंट ऑर्बिटल वॉर है। ‘अंतरिक्ष अभ्यास 2024’ में भारतीय सेना की डिफेंस स्पेस एजेंसी ने उन खतरों की लाइव टेस्टिंग की जो आधुनिक युद्ध की सबसे कड़वी हकीकत हैं। इसमें काइनेटिक मिसाइल हमलों से लेकर हाई-एनर्जी लेजर बीम्स द्वारा सैटेलाइट्स के कैमरों को अंधा करने, ग्राउंड स्टेशंस के संचार लिंक्स को काटने और जीपीएस सिग्नलों को भटकाने के परिदृश्यों का गहन अभ्यास किया गया। जनरल अनिल चौहान ने साफ शब्दों में रेखांकित किया कि अंतरिक्ष अब सिर्फ पारंपरिक सेनाओं का सहायक माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह जमीन, हवा, समुद्र और साइबर के साथ युद्ध का प्राथमिक और सबसे निर्णायक डोमेन बन चुका है।
भारत को अपनी दशकों पुरानी नीति बदलकर इस आक्रामक तैयारी में क्यों उतरना पड़ा, इसका सीधा जवाब है चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का अंतरिक्ष में बढ़ता वर्चस्व। अप्रैल 2024 में चीन ने अपनी सैन्य संरचना में भारी फेरबदल करते हुए सीधे अपने सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के अधीन एक स्वतंत्र ‘पीएलए एयरोस्पेस फोर्स’ का गठन किया। आज कक्षा में चीन के 900 से अधिक सक्रिय उपग्रह चक्कर काट रहे हैं, जिनमें से 400 से 500 उपग्रह सीधे सैन्य निगरानी और सिग्नल्स इंटेलिजेंस के लिए तैनात हैं। चीन के ‘याओगान’ और ‘गाओफेन’ सीरीज के 200 से अधिक उपग्रह सिंथेटिक एपर्चर रडार और हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर से लैस हैं। इनके जरिए लद्दाख के डेपसांग मैदानों से लेकर तवांग और मलक्का जलडमरूमध्य तक, भारतीय सेना के हर मूवमेंट की लोकेशन बीजिंग में हर 15 से 30 मिनट में अपडेट होती रहती है।
खतरा सिर्फ जासूसी तक सीमित नहीं है, बल्कि चीन के ‘शिजियान’ सीरीज के उपग्रहों में रोबोटिक आर्म्स लगे हैं। शिजियान-17 और शिजियान-21 जैसे उपग्रह अंतरिक्ष में किसी दूसरे देश के सैटेलाइट के करीब जाकर उसे पकड़ सकते हैं और कक्षा से बाहर धकेलकर अंतरिक्षीय कब्रिस्तान में फेंक सकते हैं। इसके साथ ही, चीन अपने इस विशाल अंतरिक्ष नेटवर्क का लाइव डेटा पाकिस्तान के साथ साझा करता है। बेइदोऊ-3 नेविगेशन और पीआरएसएस-1 उपग्रहों के जरिए पाकिस्तान को भारतीय सीमा की सटीक इंटेलिजेंस लगातार मिल रही है। 2020 के गलवान तनाव के दौरान भारतीय सेना ने खुद देखा कि कैसे चीनी उपग्रह हमारी फॉरवर्ड पोजीशंस पर नजर रख रहे थे। उस दिन साफ हो गया कि अगर भारत ने अंतरिक्ष में अपनी आंखें और ढाल तैयार नहीं की, तो जमीन पर तैनात लाखों जवान और आधुनिक हथियार युद्ध के पहले ही दिन असहाय हो सकते हैं।
अंतरिक्ष युद्ध का असर सिर्फ बॉर्डर पर तैनात सैनिकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह देश के हर आम नागरिक की जिंदगी को कैसे तहस-नहस कर सकता है, इसे रक्षा भाषा में पीएनटी यानी पोजिशनिंग, नेविगेशन और टाइमिंग सिंड्रोम कहा जाता है। आम लोग सैटेलाइट्स को केवल गूगल मैप्स या मिसाइल गाइडेंस से जोड़कर देखते हैं, लेकिन आधुनिक डिजिटल दुनिया की असली रीढ़ इसका तीसरा अक्षर है: टाइमिंग। जीपीएस या नाविक जैसे नेविगेशन उपग्रहों में बेहद सटीक रूबिडियम और सीजियम परमाणु घड़ियां लगी होती हैं, जो सेकंड के एक अरबवें हिस्से की नैनोसेकंड सटीकता से धरती पर टाइम-सिग्नल भेजती हैं। अब सोचिए कि अगर किसी युद्ध के दौरान दुश्मन हमारे इन पीएनटी सिग्नलों को सिर्फ 10 मिनट के लिए जैम या स्पूफ कर दे, तो क्या होगा?
सबसे पहला झटका देश के नेशनल पावर ग्रिड को लगेगा। भारत का पावर ग्रिड 50 हर्ट्ज की फ्रीक्वेंसी पर काम करता है और हजारों सब-स्टेशनों पर लगे फेज मेजरमेंट यूनिट्स ग्रिड को संतुलित रखने के लिए सैटेलाइट के नैनोसेकंड टाइम-स्टैम्प का इस्तेमाल करते हैं। यदि 10 मिनट के लिए यह सिग्नल कट जाए, तो सब-स्टेशन एक-दूसरे से तालमेल खो बैठेंगे। ग्रिड को जलने से बचाने के लिए स्वचालित सर्किट ब्रेकर्स ट्रिप हो जाएंगे, जिससे कन्याकुमारी से कश्मीर तक पूरा देश एक झटके में अंधेरे में डूब जाएगा। अस्पतालों के लाइफ-सपोर्ट सिस्टम रुक जाएंगे, पानी की सप्लाई ठप हो जाएगी और ब्लैक-स्टार्ट प्रक्रिया के जरिए दोबारा बिजली बहाल करने में कई दिन लग सकते हैं।
इसका दूसरा बड़ा असर बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली पर पड़ेगा। स्टॉक एक्सचेंजों में होने वाले हर ट्रेड, बैंकों के आरटीजीएस, यूपीआई नेटवर्क और एटीएम सर्वर मिलीसेकंड स्तर की सैटेलाइट टाइमिंग पर काम करते हैं। 10 मिनट के सिग्नल ब्लैकआउट का मतलब है कि देश के लाखों एटीएम नकदी देना बंद कर देंगे, ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम फ्रीज हो जाएगा और शेयर बाजारों में अरबों रुपयों का नुकसान हो जाएगा। इसके साथ ही, ब्रह्मोस और प्रलय जैसी प्रिसिजन गाइडेड मिसाइलें सैटेलाइट सुधार सिग्नलों के बिना अपने इनर्शियल नेविगेशन ड्रिफ्ट के कारण निशाने से सैकड़ों मीटर दूर भटक सकती हैं। नागरिक उड्डयन में यह खतरा पहले ही देखा जा चुका है, जहां पश्चिमी सीमा पर कमर्शियल विमानों को अचानक जीपीएस स्पूफिंग का सामना करना पड़ा है। इसलिए अंतरिक्ष की सुरक्षा अब राष्ट्रीय अस्तित्व का बुनियादी सवाल बन चुकी है।
इस खतरे से निपटने के लिए भारत की यात्रा 27 मार्च 2019 को ‘मिशन शक्ति’ के साथ शुरू हुई थी। उस दिन ओडिशा के डॉ. कलाम द्वीप से डीआरडीओ की पीडीवी-एमके-2 इंटरसेप्टर मिसाइल ने 283 किलोमीटर ऊपर 27,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ रहे एक लाइव सैटेलाइट को सीधे मारकर नष्ट किया था। भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश बना जिसके पास एंटी-सैटेलाइट मिसाइल क्षमता थी। लेकिन वह केवल एक तकनीकी परीक्षण था। इसके बाद सरकार ने अंतरिक्ष युद्ध के लिए संस्थागत ढांचा तैयार किया और बेंगलुरु में डिफेंस स्पेस एजेंसी और अनुसंधान के लिए डीएसआरओ की स्थापना की गई।
वर्तमान में जब दुनिया अमेरिका की यूएस स्पेस फोर्स और चीन की एयरोस्पेस फोर्स को देख रही है, भारत भी एक बहुत ही ठोस त्रि-चरणीय योजना पर आगे बढ़ रहा है। पहले चरण में डीएसए का गठन कर तीनों सेनाओं के बीच डेटा शेयरिंग स्थापित की गई। दूसरे चरण में, अंतरिक्ष अभ्यास के बाद, डीएसए को अपग्रेड करके एक पूर्ण ‘इंटीग्रेटेड एयरोस्पेस कमांड’ में बदला जा रहा है, ताकि वायु रक्षा और अंतरिक्ष संचालन एक साथ आ सकें। इसके बाद के चरण में, थिएटर कमांड्स के पूर्ण रूप से सक्रिय होने के साथ, भारत एक स्वतंत्र ‘इंडियन स्पेस फोर्स’ की दिशा में कदम बढ़ाएगा, जिसका अपना विशेष कैडर होगा और जो ऑर्बिटल मैन्युवरिंग, साइबर वारफेयर और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस में प्रशिक्षित होगा।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि संख्या बल में हम चीन से पीछे थे। नौसेना के पास जीएसएटी-7 रुक्मिणी, वायुसेना के पास जीएसएटी-7ए एंग्री बर्ड, सेना के लिए आगामी जीएसएटी-7बी, इलेक्ट्रॉनिक जासूसी के लिए ईमिसैट कौटिल्य, और निगरानी के लिए कार्टोसैट-3 व रीसैट जैसे 15 से भी कम समर्पित सैन्य सैटेलाइट्स थे। इस भारी अंतर को खत्म करने के लिए अक्टूबर 2024 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने ₹26,968 करोड़ के भारी बजट वाले सीक्रेट प्रोजेक्ट एसबीएस-3 यानी स्पेस बेस्ड सर्विलांस फेज-3 को मंजूरी दी।
इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत भारत अगले कुछ वर्षों में विभिन्न कक्षाओं में 52 नए मिलिट्री-ग्रेड सर्विलांस उपग्रहों का एक गतिशील जाल स्थापित करेगा। लेकिन इस प्रोजेक्ट का सबसे क्रांतिकारी पहलू यह है कि इन 52 उपग्रहों में से 21 उपग्रह इसरो बनाएगा, जबकि बाकी के 31 संवेदनशील मिलिट्री सैटेलाइट्स के निर्माण और संचालन की कमान सीधे भारत के प्राइवेट स्पेस-टेक स्टार्टअप्स को सौंप दी गई है। भारतीय रक्षा इतिहास में यह पहला मौका है जब राष्ट्रीय सुरक्षा की इतनी अहम जिम्मेदारी निजी क्षेत्र को दी गई। सरकार ने यह समझा कि पारंपरिक फाइलों और धीमी प्रक्रियाओं के दम पर 21वीं सदी का तेज स्पेस युद्ध नहीं जीता जा सकता; इसके लिए युवा स्टार्टअप्स की फुर्ती और कम लागत वाले मॉडल्स की जरूरत थी।
अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स की संख्या कम होने की स्थिति में भारतीय रणनीतिकारों ने एक ऐसा गेम-चेंजर रास्ता निकाला जो न तो पारंपरिक एयरस्पेस में आता है और न ही आउटर स्पेस में। यह समाधान छिपा है स्ट्रैटोस्फेयर यानी समताप मंडल में, जो जमीन से 18 से 30 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित है और जिसे रक्षा जगत में ‘नियर स्पेस’ या नो-मैन्स-लैंड कहा जाता है। नागरिक विमान 12 किलोमीटर तक उड़ते हैं और उपग्रह 160 किलोमीटर से ऊपर होते हैं। यह बीच का इलाका ऐसा है जहां पारंपरिक एयर डिफेंस मिसाइलें पहुंच नहीं पातीं और अंतरिक्ष की एंटी-सैटेलाइट मिसाइलें काम नहीं कर सकतीं।
भारत ने इस खाली क्षेत्र में हाई ऑल्टीट्यूड स्यूडो-सैटेलाइट्स और सुपर-प्रेशर स्ट्रैटोस्फेरिक बलून्स की तैनाती शुरू की है। नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज और न्यूस्पेस रिसर्च जैसे भारतीय स्टार्टअप्स द्वारा विकसित हैप्स एक अल्ट्रा-लाइटवेट, सौर ऊर्जा से चलने वाला यूएवी है। इसका पंखों का फैलाव बोइंग 737 विमान जितना यानी 35 मीटर है, लेकिन वजन मात्र 160 किलोग्राम के आसपास है। यह दिन में सौर ऊर्जा से बैटरी चार्ज करता है और 22 किलोमीटर की ऊंचाई पर लगातार 60 से 90 दिनों तक एक ही जगह पर मंडरा सकता है। जहां सामान्य सैटेलाइट बॉर्डर के ऊपर से कुछ ही मिनटों में गुजर जाता है, वहीं हैप्स एलएसी और एलओसी के ऊपर महीनों तक टिककर एक ऐसी आंख बन जाता है जो कभी पलक नहीं झपकाती।
इसके साथ ही, रेड बलून एयरोस्पेस जैसे भारतीय स्टार्टअप्स द्वारा विकसित सुपर-प्रेशर बलून्स असममित युद्ध का सबसे नया उदाहरण हैं। विशेष पॉलीमर से बने ये बलून्स 25 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थिर रहकर निगरानी और जैमिंग पेलोड संभालते हैं। इनका रडार क्रॉस-सेक्शन लगभग शून्य होता है, जिससे दुश्मन के आधुनिक रडार भी इन्हें नहीं पकड़ पाते। कुछ लाख रुपये में तैयार होने वाले इन बलून्स को मार गिराने के लिए अगर दुश्मन को 15 से 20 करोड़ रुपये की मिसाइल दागनी पड़े, तो यह दुश्मन को आर्थिक रूप से थकाने की सबसे अचूक रणनीति बन जाती है।
इस नए अंतरिक्ष युद्ध के सबसे अग्रिम मोर्चे पर किसी सैन्य छावनी के बुजुर्ग अधिकारी नहीं, बल्कि 20 से 30 साल के युवा भारतीय टेक इनोवेटर्स खड़े हैं। आईआईटी और बिट्स पिलानी से निकले इन युवाओं ने रक्षा तकनीक का नक्शा बदल दिया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ‘पिक्सल’ का हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट नेटवर्क। साधारण सैटेलाइट्स केवल 3 से 10 स्पेक्ट्रल बैंड्स में तस्वीरें खींचते हैं, लेकिन पिक्सल के उपग्रह सूर्य के प्रकाश को 250 से अधिक संकीर्ण स्पेक्ट्रल बैंड्स में विभाजित करके देखते हैं।
इसका सीधा अर्थ यह है कि पिक्सल के उपग्रह केवल तस्वीरें नहीं लेते, बल्कि जमीन पर मौजूद चीजों का रासायनिक फिंगरप्रिंट पढ़ लेते हैं। अगर चीनी सेना ने लद्दाख की पहाड़ियों में असली पेड़ों के बीच प्लास्टिक की जालियों से अपने टैंक या मिसाइल लॉन्चर छिपा रखे हैं, तो साधारण उपग्रह धोखा खा जाएगा क्योंकि उसे सब कुछ हरा दिखेगा। लेकिन पिक्सल का सैटेलाइट ऊपर से ही बता देगा कि असली पत्तियों का क्लोरोफिल स्पेक्ट्रम अलग है और प्लास्टिक का रासायनिक स्पेक्ट्रम अलग। यह तकनीक दुश्मन के हर छलावे को एक झटके में बेनकाब कर देती है।
इसी तरह, आईआईटी मद्रास के इनक्यूबेशन से निकले ‘गैलेक्सआई’ ने ‘दृष्टि’ नाम से दुनिया का पहला पेटेंटेड हाइब्रिड सेंसर विकसित किया है, जो एक ही सैटेलाइट पर ऑप्टिकल कैमरा और सिंथेटिक एपर्चर रडार दोनों को जोड़ता है। इनका एआई सॉफ्टवेयर दोनों डेटा को रीयल-टाइम में मिला देता है, जिसका परिणाम यह है कि चाहे घने बादल हों, मूसलाधार बारिश हो या अमावस्या की काली रात, भारतीय सेना को सीमा पार की क्रिस्टल-क्लियर तस्वीरें 24 घंटे मिलती रहती हैं। वहीं बेंगलुरु का ‘दिगंतरा’ स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस के जरिए अंतरिक्ष में एयर ट्रैफिक कंट्रोल का काम कर रहा है। उनका नेटवर्क अंतरिक्ष में 1 सेंटीमीटर जितने मलबे को भी ट्रैक कर सकता है। अगर चीन का कोई किलर-सैटेलाइट गुप्त रूप से भारत के किसी रणनीतिक सैटेलाइट के करीब आने की कोशिश करता है, तो दिगंतरा का सिस्टम भारतीय सेना को कई घंटे पहले अलर्ट दे देता है ताकि हमारे उपग्रह अपने थ्रस्टर्स चलाकर सुरक्षित दूरी बना सकें।
इस पूरे नेटवर्क के पीछे इसरो ने कुछ ऐसे मास्टरस्ट्रोक खेले हैं जिनकी भनक वैश्विक रणनीतिकारों को काफी देर से लगी। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है ‘स्पाडेक्स’ यानी स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट। बाहर से यह भारत के आगामी अंतरिक्ष स्टेशन के लिए दो उपग्रहों को आपस में जोड़ने का मासूम परीक्षण दिखता है, लेकिन इसके सामरिक मायने बेहद गहरे हैं। जो तकनीक अंतरिक्ष में दो उपग्रहों को मिलीमीटर की सटीकता से जोड़ सकती है, वह अंतरिक्ष में सर्विसिंग और रिफ्यूलिंग के साथ-साथ एक बेहद खतरनाक इन-ऑर्बिट किलर की क्षमता भी रखती है। इस क्षमता के जरिए बिना कोई मिसाइल दागे और बिना कोई मलबा फैलाए, दुश्मन के सैटेलाइट के सौर पैनलों को ढका जा सकता है या उसके सेंसरों पर स्प्रे करके उसे हमेशा के लिए अंधा किया जा सकता है।
इसके साथ ही, प्रोजेक्ट नेत्रा के तहत लद्दाख के हानले और माउंट आबू में डीप-स्पेस ट्रैकिंग रडार और टेलीस्कोप्स का नेटवर्क खड़ा किया गया है। नाविक सिस्टम के लिए अहमदाबाद के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर में पूरी तरह स्वदेशी रूबिडियम परमाणु घड़ियां विकसित करके एनवीएस सीरीज के उपग्रहों में लगा दी गई हैं। इसका मतलब यह है कि किसी बड़े वैश्विक संकट में अगर विदेशी नेविगेशन सिस्टम बंद भी हो जाएं, तब भी 1500 किलोमीटर के दायरे में हमारी हर मिसाइल, हर सुखोई और हर युद्धपोत अचूक सटीकता से वार करते रहेंगे।
अगर वर्तमान सैन्य संपत्तियों को देखें तो नेवी का जीएसएटी-7 रुक्मिणी पूरे हिंद महासागर में हमारे जंगी जहाजों और पनडुब्बियों को सुरक्षित डेटा-लिंक देता है। एयरफोर्स का जीएसएटी-7ए हमारे राफेल, सुखोई-30एमकेआई और अवाक्स विमानों को आपस में जोड़ता है। कार्टोसैट-3 अंतरिक्ष से 25 सेंटीमीटर का अल्ट्रा-हाई रेजोल्यूशन डेटा देता है, जबकि डीआरडीओ का ईमिसैट कौटिल्य सीमा पार के दुश्मन रडारों के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नलों को पकड़कर उनका पूरा ग्रिड मैप तैयार कर लेता है। अब भारत छोटे उपग्रहों को कुछ ही घंटों के नोटिस पर मोबाइल लॉन्चर से लॉन्च करने के लिए एसएसएलवी जैसी त्वरित क्षमताओं को भी ऑपरेशनल कर चुका है।
आज जब हम इस पूरे रणनीतिक परिदृश्य को देखते हैं, तो यह साफ है कि 11 नवंबर 2024 का वह अभ्यास महज एक बैठक नहीं थी। वह भारत के अंतरिक्षीय पुनर्जागरण की शुरुआत थी। आधुनिक भू-राजनीति में शक्ति केवल जमीन के सैनिकों से नहीं, बल्कि ऑर्बिटल लचीलेपन और अंतरिक्षीय प्रतिरोध से तय होती है। भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह शांति का समर्थक जरूर है, लेकिन यह शांति भिक्षा मांगकर नहीं, बल्कि 500 किलोमीटर ऊपर एक अभेद्य रक्षा दीवार खड़ी करके हासिल की जा रही है





