आज जब पूरी दुनिया एक बहुत बड़े एनर्जी क्राइसिस से गुजर रही है। बड़े बड़े और विकसित देश कोयले और तेल के लिए एक दूसरे के आमने सामने खड़े हैं। ग्लोबल वार्मिंग और पावर कट जैसी समस्याओं ने दुनिया भर के सिस्टम को हिला कर रख दिया है। लेकिन इन सबके बीच हमारा देश भारत खामोशी से एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेल रहा है, जिसने पूरी दुनिया के सामने एक नई नजीर पेश कर दी है। आप सोच रहे होंगे कि मैं किसी बड़े हाई-टेक शहर, किसी स्मार्ट सिटी या किसी बहुत बड़े इंडस्ट्रियल हब की बात कर रहा हूं। जी नहीं। आज मैं आपको भारत के एक ऐसे राज्य के एक ऐसे छोटे से गांव की कहानी बताने जा रहा हूं, जिसे सुनकर आपको अपने भारतीय होने पर और भारत की बदलती हुई तस्वीर पर जबरदस्त गर्व होगा। हम बात कर रहे हैं बिहार की। वही बिहार जिसे कभी पावर कट, अंधेरे और लालटेन के लिए ताने मारे जाते थे। आज उसी बिहार ने एक ऐसा साइलेंट रिवोल्यूशन कर दिया है जिसने पूरे देश के सामने ग्रामीण आत्मनिर्भरता का सबसे परफेक्ट और सबसे सॉलिड रोल मॉडल खड़ा कर दिया है।
बिहार के सीतामढ़ी जिले में एक पंचायत है महुआबा और इसी पंचायत के अंतर्गत आता है एक छोटा सा लेकिन बेहद स्मार्ट गांव जिसका नाम है लछुआ। इस नाम को आज ही याद कर लीजिए क्योंकि आने वाले समय में यह गांव पूरे भारत के लिए एक केस स्टडी बनने वाला है। इस गांव ने कुछ ऐसा कर दिखाया है जो बड़े बड़े मेट्रो शहरों के लोग आज तक सिर्फ सोच ही रहे हैं। विकास की इस रेस में लछुआ गांव के लोगों ने किसी सरकारी बिजली ग्रिड का इंतजार नहीं किया, न ही उन्होंने बिजली कटने पर कोई हंगामा किया। उन्होंने सीधा सिस्टम को ही अपग्रेड कर दिया। आज इस गांव की लगभग 75 प्रतिशत आबादी ने अपनी रोजमर्रा की बिजली जरूरतों के लिए पारंपरिक बिजली को हमेशा के लिए गुडबाय कह दिया है। इस गांव के लोगों ने पूरी तरह से सोलर सिस्टम यानी सौर ऊर्जा को अपना लिया है। अगर आप आज इस गांव में जाएंगे तो आपको लगभग हर घर की छत पर चमकते हुए सोलर पैनल नजर आएंगे। ये पैनल सिर्फ शीशे और धातु के टुकड़े नहीं हैं, ये न्यू इंडिया के वो पावर हाउस हैं जो सीधे आसमान से अपनी ऊर्जा ले रहे हैं और एक नए भारत की तस्वीर गढ़ रहे हैं।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा क्या हुआ? इसका सबसे सीधा, सबसे सटीक और सबसे बड़ा फायदा गांव वालों की जेब पर पड़ा है। महंगाई के इस दौर में जहां बिजली का बिल एक आम आदमी और मिडिल क्लास परिवार का पूरा बजट बिगाड़ देता है, वहीं लछुआ गांव के लोगों ने इस टेंशन को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है। इस शानदार और मॉडर्न बदलाव के बाद यहां के अधिकांश घरों का मंथली बिजली बिल घटकर मात्र 100 से 150 रुपये तक सिमट गया है। और हैरान करने वाली बात तो यह है कि कई गरीब और बीपीएल परिवारों का बिजली बिल अब बिल्कुल शून्य आने लगा है। जीरो बिजली बिल। स्थानीय ग्रामीण कृष्णनंदन कुमार और राम इकबाल महतो पूरे कॉन्फिडेंस के साथ बताते हैं कि पहले बिजली कटने की एक बहुत बड़ी समस्या थी। रात रात भर अंधेरा रहता था। लेकिन अब सोलर सिस्टम की वजह से 24 घंटे फुल पावर लाइट रहती है। बिना किसी ब्रेक के, बिना किसी ट्रिपिंग के। सौर ऊर्जा से मिल रही इस जबर्दस्त फाइनेंशियल राहत के कारण पूरा गांव बेहद खुश और उत्साहित है। जो पैसा पहले बिजली के बिलों में जाता था, अब वही पैसा गांव के लोग अपने बच्चों की पढ़ाई, उनकी सेहत और अपने रोजगार को बढ़ाने में इन्वेस्ट कर रहे हैं। इसे कहते हैं असली एम्पावरमेंट।
लेकिन कोई भी इतना बड़ा बदलाव रातों रात नहीं होता। इसके पीछे होती है एक विजनरी लीडरशिप और सरकारी योजनाओं का बिल्कुल डेडली कॉम्बिनेशन। लछुआ गांव को एक ‘सोलर विलेज’ यानी पूर्ण रूप से सौर ग्राम बनाने में स्थानीय मुखिया संजीव भूषण और पंचायत प्रशासन की भूमिका इतनी बेहतरीन रही है कि इसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। मुखिया ने सिर्फ बातें नहीं की, बल्कि जमीन पर उतर कर काम किया। उनके सहयोग और लोगों को जागरूक करने की वजह से ही आज पंचायत के करीब 70 प्रतिशत से ज्यादा घरों में सोलर प्लेट्स सफलतापूर्वक इंस्टॉल की जा चुकी हैं। बात सिर्फ घरों की नहीं है, पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को भी पूरी तरह से ग्रीन एनर्जी पर शिफ्ट किया जा रहा है। गांव की सुरक्षा और रात के समय रोशनी के लिए 17 प्रमुख सार्वजनिक जगहों पर 150 से अधिक पावरफुल सोलर लाइटें लगाई गई हैं। इतना ही नहीं, इन्हीं सोलर पैनल से कनेक्टेड सीसीटीवी कैमरे भी गांव में लगा दिए गए हैं। यानी अब गांव की सुरक्षा व्यवस्था भी सीधे सूर्य की रोशनी से पावर लेकर चौबीसों घंटे काम कर रही है। महुअवा पंचायत के मुखिया संजीव भूषण ने एक और शानदार जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में भारत सरकार की सबसे एंबिशियस ‘पीएम सूर्य घर योजना’ के तहत लगभग 95 नए आवेदन स्वीकृत हो चुके हैं। इसका मतलब है कि काम रुका नहीं है, बल्कि और तेज रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। गांव के स्कूल की इमारतों पर भी अब बड़े सोलर प्लांट लगाए जा रहे हैं ताकि बच्चों की पढ़ाई में कभी कोई रुकावट न आए।
केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा अलग अलग वर्गों को दी जा रही सब्सिडी इस पूरी मुहिम को एक बूस्टर डोज दे रही है। लोगों को समझ में आ गया है कि यह वन टाइम इन्वेस्टमेंट है और उसके बाद जिंदगी भर का रिटर्न है। लछुआ गांव में शुरू हुई यह सौर क्रांति अब सिर्फ रोशनी तक सीमित नहीं रह गई है। इस गांव के लोगों का माइंडसेट पूरी तरह से बदल चुका है। वो अब सोलर पावर का इस्तेमाल सिर्फ बल्ब जलाने या पंखा चलाने के लिए नहीं कर रहे हैं। अब घरों में महिलाएं पारंपरिक चूल्हों के धुएं से आजाद होकर इंडक्शन चूल्हों पर खाना पका रही हैं। वो भी उसी बिजली से जो उनके घर की छत पर बन रही है। यह हेल्थ, एन्वायरनमेंट और इकॉनमी तीनों मोर्चों पर एक साथ हासिल की गई एक बहुत बड़ी जीत है।
पंचायत प्रशासन का फ्यूचर विजन एकदम क्लियर है। उनका आगामी लक्ष्य किसी भी हाल में गांव के शत-प्रतिशत घरों को इस योजना से जोड़ना है। आने वाले कुछ ही समय में 85 प्रतिशत के टारगेट को पूरा करते हुए गांव के लगभग 700 घरों में सीधे सोलर बिजली का प्रोडक्शन सुनिश्चित किया जाएगा। जब एक छोटा सा गांव अपनी जरूरत की पूरी बिजली खुद बना सकता है, तो सोचिए अगर देश का हर गांव ऐसा ही करने लगे तो क्या होगा? हम एक ऊर्जा निर्यातक देश बन जाएंगे। हमारी कोयले और विदेशी तेल पर डिपेंडेंस पूरी तरह से खत्म हो जाएगी। यही तो असली आत्मनिर्भर भारत है। यही तो उस राष्ट्रवाद की सच्ची तस्वीर है जहां देश का हर नागरिक, हर ग्रामीण देश को मजबूत बनाने में अपना सीधा कंट्रीब्यूशन दे रहा है।
बिहार के लछुआ गांव ने पूरे देश के सामने एक खुला चैलेंज भी रखा है और एक प्रेरणा भी दी है। यह गांव बता रहा है कि विकास के लिए किसी चमत्कार की जरूरत नहीं होती, बल्कि सही सोच, सही योजना और उस पर कड़े एक्शन की जरूरत होती है। आज लछुआ गांव भारत के उस एनर्जी ट्रांजिशन का सबसे मजबूत और चमकता हुआ चेहरा बन गया है, जो दुनिया को यह बता रहा है कि भारत अब फॉलोअर नहीं, बल्कि लीडर है। और इस लीडरशिप की शुरुआत हमारे गांवों की छतों पर चमकते उन सोलर पैनल से हो चुकी है, जो हर सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही एक नए और आत्मनिर्भर भारत का ऐलान करते हैं।





