जब पूरी दुनिया अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और वैश्विक तेल संकट की चिंताओं में डूबी हुई थी, ठीक उसी समय भारत ने रक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा कदम उठाया। दुनिया की निगाहें मिडिल ईस्ट पर टिकी थीं, लेकिन भारत के डीआरडीओ (DRDO) ने समंदर के सीने पर अपनी बढ़ती ताकत का ऐसा ट्रेलर दिखाया कि वैश्विक रक्षा क्षेत्र में हलचल मच गई। बिना किसी शोर-शराबे के भारत ने एक ऐसी मिसाइल का परीक्षण किया, जिसने रातों-रात भारतीय नौसेना की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया। डीआरडीओ का यह अचानक किया गया टेस्ट चीन और अमेरिका की नौसेना के लिए चिंता का विषय क्यों बन गया है, और ब्रह्मोस जैसी घातक मिसाइल के होते हुए भी हमें इस स्वदेशी तकनीक की आवश्यकता क्यों पड़ी, आइए इसे गहराई से समझते हैं।
इन सवालों का उत्तर उस मास्टरप्लान में है जो भविष्य के समुद्री युद्ध का स्वरूप बदलने वाला है। भारत द्वारा परीक्षण की गई इस मिसाइल का नाम ‘नेवल एंटी-शिप मिसाइल-मीडियम रेंज’ (NASM-MR) है। यह कोई साधारण शस्त्र नहीं, बल्कि एक स्वदेशी ब्रह्मास्त्र है जो मध्यम दूरी तक दुश्मन के किसी भी युद्धपोत को पल भर में नष्ट करने की क्षमता रखता है। इसकी सटीकता और खामोशी इसे इतना घातक बनाती है कि दुश्मन के रडार पर कोई चेतावनी आने से पहले ही उसका जहाज तबाह हो चुका होता है। इस अचूक हथियार के विकास के पीछे एक बहुत बड़ी रणनीतिक और आर्थिक वजह छिपी है।
अक्सर यह सवाल उठता है कि जब हमारे पास 400 किलोमीटर से अधिक मारक क्षमता वाली सुपरसोनिक ब्रह्मोस मौजूद है, तो NASM-MR की क्या जरूरत थी? इसका उत्तर बहुत सरल है। ब्रह्मोस एक अत्यंत भारी और महंगी मिसाइल है। समंदर में छोटे जहाजों, कोर्वेट या पैट्रोलिंग बोट्स को नष्ट करने के लिए करोड़ों की ब्रह्मोस दागना किफायती नहीं है। नौसेना को एक ऐसे सटीक, हल्के और कम लागत वाले विकल्प की तलाश थी जो मध्यम आकार के ऑपरेशन्स के लिए फिट हो। NASM-MR इसी कमी को पूरा करती है। इसकी असली ताकत इसकी लागत नहीं, बल्कि रडार को चकमा देने वाली इसकी खास तकनीक है।
इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत इसकी ‘सी-स्किमिंग’ (Sea-Skimming) तकनीक है। जब इसे हेलीकॉप्टर या युद्धपोत से दागा जाता है, तो यह आसमान में ऊपर जाने के बजाय समंदर की लहरों के ठीक ऊपर, लगभग 5 से 7 मीटर की ऊंचाई पर उड़ती है। इतनी कम ऊंचाई पर उड़ने के कारण दुश्मन के रडार सिस्टम इसे ट्रैक नहीं कर पाते, जिसे रडार ‘ब्लाइंड स्पॉट’ कहा जाता है। जब तक दुश्मन को इसकी मौजूदगी का एहसास होता है, तब तक जवाबी कार्रवाई का समय निकल चुका होता है। लेकिन इसकी तबाही सिर्फ इसके छुपने में नहीं, बल्कि इसके वारहेड की ताकत में भी है।
रफ्तार के मामले में यह मिसाइल हाई-सबसोनिक स्पीड (लगभग 0.8 मैक या 1000 किमी/घंटा) से हमला करती है। यह अपने साथ 100 से 150 किलोग्राम का ‘आर्मर-पियर्सिंग’ वारहेड ले जाती है, जो जहाजों की लोहे की मजबूत चादरों को चीरने में सक्षम है। जब यह पूरी गति से टकराती है, तो जहाज के दो टुकड़े होना निश्चित है। फिलहाल इसकी रेंज 55 से 70 किलोमीटर है, लेकिन इसके आगामी संस्करणों पर काम जारी है।
डीआरडीओ अब इसके एडवांस्ड वर्जन पर काम कर रहा है जिसकी रेंज 100 किलोमीटर से अधिक होगी। यह तटीय सुरक्षा और गश्ती हेलीकॉप्टरों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगा। यह उन इलाकों में अत्यंत प्रभावी होगा जहाँ बड़े युद्धपोत नहीं पहुँच सकते। इस मिसाइल ने वैश्विक स्तर पर अमेरिका और फ्रांस जैसे बड़े हथियार निर्यातकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।
इस स्वदेशी मिसाइल के आने से विदेशी हथियारों पर भारत की निर्भरता समाप्त हो रही है। अब तक भारतीय नौसेना अमेरिका की ‘हार्पून’ या फ्रांस की ‘एक्सोसेट’ मिसाइलों पर निर्भर थी। अमेरिका के हथियारों के साथ कई कड़ी शर्तें और पाबंदियां जुड़ी होती हैं, जबकि फ्रांस की मिसाइलें बहुत महंगी पड़ती हैं। NASM-MR के साथ भारत अब आत्मनिर्भर है, और बिना किसी विदेशी दबाव के इसे भारी मात्रा में तैनात कर सकता है।
NASM-MR को नौसेना के आधुनिक MH-60R ‘रोमियो’ हेलीकॉप्टरों के साथ जोड़ा गया है। रोमियो हेलीकॉप्टर समंदर का एक उड़ता हुआ जासूसी केंद्र है। जब यह हेलीकॉप्टर दुश्मन को लोकेट कर NASM-MR दागता है, तो निशाना अचूक होता है। यह कॉम्बिनेशन खराब मौसम में भी सटीक वार करने की गारंटी देता है, जिससे भारतीय नौसेना की पहुंच समंदर में बहुत दूर तक बढ़ गई है।
डीआरडीओ का अगला लक्ष्य इसे फाइटर जेट्स और युद्धपोतों पर तैनात करना है। जब अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स से एक साथ ये मिसाइलें दागी जाएंगी, तो दुश्मन का एयर डिफेंस सिस्टम पूरी तरह फेल हो जाएगा। यह मल्टी-प्लेटफॉर्म क्षमता भारतीय नौसेना को एक साथ कई मोर्चों पर लड़ने की शक्ति प्रदान करेगी। लेकिन इस तकनीक के सामने हमारे पड़ोसी देशों का क्या हाल है?
पाकिस्तान की नौसेना मुख्य रूप से चीन की C-802 मिसाइल पर निर्भर है। चीनी मिसाइलों का नेविगेशन और रडार सिस्टम अक्सर इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (Electronic Warfare) के सामने कमजोर पड़ जाता है। इसके विपरीत, भारत की इस स्वदेशी मिसाइल में आधुनिक गाइडेंस सिस्टम लगा है जो जैमर्स के बावजूद अपने लक्ष्य को ढूंढ निकालता है। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती घुसपैठ को रोकने के लिए यह एक ‘गेमचेंजर’ हथियार है।
चीन जिस तरह हिंद महासागर में जासूसी जहाजों और पनडुब्बियों के जरिए अपना वर्चस्व बढ़ाना चाहता है, भारत ने NASM-MR के जरिए उसे स्पष्ट संदेश दे दिया है। भारत अब समुद्री सुरक्षा के मामले में एक आक्रामक रुख अपना रहा है। यह केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि भारत की उस कूटनीति का हिस्सा है जो उसे समंदर का निर्विवाद शक्तिशाली देश बनाती है।
इस सफलता ने भारत के रक्षा निर्यात (Defense Export) की राह भी आसान कर दी है। कई छोटे देश जो अपनी समुद्री सीमाएं सुरक्षित करना चाहते हैं, वे अब अमेरिका और फ्रांस के महंगे विकल्पों के बजाय भारत की ओर देख रहे हैं। इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन भारत की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगा। भारत अब दुनिया को आधुनिक और भरोसेमंद हथियार देने वाले एक प्रमुख निर्यातक के रूप में उभर रहा है।
स्वदेशी हथियारों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इनके स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस के लिए हमें किसी और देश का मुंह नहीं ताकना पड़ता। पूरा डेटाबेस और कंट्रोल सिस्टम हमारे अपने हाथों में है, जिससे डेटा लीक होने या विदेशी हस्तक्षेप का कोई खतरा नहीं रहता। यह भारत के रक्षा क्षेत्र की एक ऐतिहासिक और रणनीतिक विजय है।

