चीन की आक्रामक विस्तारवादी नीतियों और पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की हरकतों के बीच, भारत माता की सीमाओं की सुरक्षा के लिए एक ऐसा अदृश्य महाकवच तैयार किया जा रहा है, जिसे भेद पाना दुनिया की किसी भी मिसाइल या लड़ाकू विमान के लिए नामुमकिन होगा। जब दुनिया के तमाम देश अपनी हवाई सुरक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर हैं, तब भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने अपनी सबसे गोपनीय और अचूक रक्षा प्रणाली ‘प्रोजेक्ट कुशा’ को लेकर एक बड़ा धमाका कर दिया है। इस कदम ने पेंटागन से लेकर बीजिंग तक के रक्षा विशेषज्ञों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
दुश्मन के स्टील्थ फाइटर जेट्स हों, रडार को चकमा देने वाली क्रूज मिसाइलें हों या फिर तबाही मचाने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें—इन सबको आसमान में ही मिट्टी में मिला देने वाले ‘लॉन्ग रेंज सरफेस टू एयर मिसाइल’ (LR-SAM) सिस्टम की तैयारी अब निर्णायक दौर में है। इसी मिशन को दुनिया ‘प्रोजेक्ट कुशा’ कहती है। हाल ही में DRDO ने इसके लिए ‘सीकर हार्नेस’ (Seeker Harness) की खरीद प्रक्रिया शुरू कर यह स्पष्ट कर दिया है कि अब भारत विदेशी हथियारों का मोहताज नहीं रहेगा, बल्कि अपनी सुरक्षा की कमान खुद अपने हाथों में रखेगा। आखिर क्यों इस खबर से दुश्मन खेमे में खलबली है? क्या यह भारत का अपना S-400 बनने जा रहा है?
इन सवालों के जवाब उस उन्नत तकनीक में छिपे हैं जिसे ‘सीकर हार्नेस’ कहा जाता है। सरल शब्दों में कहें तो, जब कोई इंटरसेप्टर मिसाइल दुश्मन का शिकार करने निकलती है, तो उसे रास्ता दिखाने के लिए सबसे आगे ‘सीकर’ लगाया जाता है। यह मिसाइल की ‘आंख और दिमाग’ की तरह काम करता है। लेकिन इन आंखों से मिलने वाला डेटा मिसाइल के इंजन और कंट्रोल सिस्टम तक पहुंचाने के लिए जिस नसों के जाल की जरूरत होती है, उसे ही ‘सीकर हार्नेस’ कहते हैं। इसके बिना मिसाइल दिशाहीन हो सकती है।
जब यह स्वदेशी मिसाइल ध्वनि से कई गुना तेज हाइपरसोनिक रफ्तार से दुश्मन की ओर बढ़ती है, तब हवा के घर्षण से पैदा होने वाला तापमान किसी भी सामान्य तार को पिघला सकता है। सीकर हार्नेस विशेष रूप से तैयार केबल्स का ऐसा नेटवर्क है जो बिना किसी देरी के लाइव डेटा को मिसाइल के कंप्यूटर तक भेजता है। यदि दुश्मन का विमान अपना रास्ता बदलता है, तो यह हार्नेस सिग्नल पहुंचाकर मिसाइल को तुरंत मुड़ने का निर्देश देता है। DRDO द्वारा इसके लिए RFI जारी करना यह संकेत है कि प्रोजेक्ट कुशा अब फाइलों से निकलकर हकीकत में तब्दील हो रहा है।
इस स्वदेशी तकनीक का असली जादू इसके डिजिटल दिमाग में है। प्रोजेक्ट कुशा का इंटरसेप्टर सिस्टम AESA (एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे) रडार तकनीक का उपयोग करेगा। पुराने रडार में कुछ ब्लाइंड स्पॉट्स होते थे, लेकिन भारत का यह नया रडार एक ही समय में आसमान के हर कोने पर पैनी नजर रख सकता है। यह दुश्मन के लिए किसी काल से कम नहीं होगा, क्योंकि इसे चकमा देना लगभग असंभव है।
कल्पना कीजिए कि यदि दुश्मन एक साथ कई ड्रोन और मिसाइलें छोड़ दे, तो प्रोजेक्ट कुशा का AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) दिमाग चंद सेकंड्स में यह पहचान लेगा कि कौन सा खतरा सबसे बड़ा है। यह सिस्टम खुद तय करेगा कि किस मिसाइल को पहले नष्ट करना है और किसे बाद में। दुश्मन चाहे कितनी भी आधुनिक स्टील्थ तकनीक का उपयोग कर ले, कुशा के रडार उनके बारीक से बारीक सिग्नल को पकड़कर उन्हें नेस्तनाबूद कर देंगे।
क्या एक ही मिसाइल हर तरह के खतरे को रोक सकती है? इसका जवाब है—नहीं। इसीलिए प्रोजेक्ट कुशा को तीन लेयर्स में डिजाइन किया गया है, जिसमें M1, M2 और M3 मिसाइलें शामिल हैं। यह एक ऐसा त्रि-स्तरीय चक्रव्यूह है जिसे पार करना नामुमकिन है। DRDO के वैज्ञानिकों ने इसे हर तरह के हवाई हमलों—चाहे वो कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन हों या अंतरिक्ष से गिरती मिसाइलें—से निपटने के लिए तैयार किया है।
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M1 मिसाइल: यह रक्षा की पहली दीवार है, जिसकी रेंज 150 किमी है। इसका काम कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलों और फुर्तीले लड़ाकू विमानों को खत्म करना है।
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M2 मिसाइल: दूसरी लेयर के रूप में 250 किमी की मारक क्षमता वाली यह मिसाइल उन विमानों को निशाना बनाएगी जो सीमा के बाहर रहकर हमला करने की साजिश रचते हैं।
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M3 मिसाइल: यह सबसे घातक बाहुबली मिसाइल है, जिसकी रेंज 350 किमी से ज्यादा होगी। यह दुश्मन के जासूसी विमानों और टैंकरों को उनकी अपनी सीमा के अंदर ही खत्म करने की क्षमता रखती है।
रूस का S-400 सिस्टम बेशक बेहतरीन है, लेकिन किसी विदेशी हथियार के साथ सबसे बड़ी समस्या उसके सॉफ्टवेयर और स्पेयर पार्ट्स की होती है। युद्ध के समय दूसरे देश पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। यहीं पर ‘प्रोजेक्ट कुशा’ गेम चेंजर साबित होता है।
यह पूरी तरह ‘मेड इन इंडिया’ है, जिसका मतलब है कि इसका कंट्रोल पूरी तरह भारत के पास होगा। इसे हमारे स्वदेशी नेटवर्क (IACCS) के साथ आसानी से जोड़ा जा सकता है। रूस के S-400 का सोर्स कोड हमारे पास नहीं है, लेकिन कुशा के डिजिटल कोड भारत के पास होंगे। इसका फायदा यह है कि हम जब चाहें इसे अपग्रेड कर सकते हैं। भविष्य में यह सिस्टम रूस के S-500 की तरह अंतरिक्ष से आने वाले खतरों को भी भस्म करने में सक्षम होगा।
किसी भी देश की ताकत उसके शहरों और रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा पर टिकी होती है। प्रोजेक्ट कुशा भारत के महानगरों और न्यूक्लियर प्लांट्स के ऊपर 350 किमी का फौलादी सुरक्षा कवच बना देगा। इसकी ‘डेटा लिंक’ क्षमता इसे हवा में भी नया टारगेट चुनने की आजादी देती है। यह वह तकनीक है जो दुनिया के केवल 3-4 गिने-चुने देशों के पास ही उपलब्ध है।
प्रोजेक्ट कुशा केवल हथियारों का समूह नहीं, बल्कि एक गतिशील डिफेंस इकोसिस्टम है। इसके रडार और लॉन्चर ट्रकों पर फिट होंगे, जिससे इन्हें रातों-रात एक मोर्चे से दूसरे मोर्चे पर भेजा जा सकेगा। दुश्मन का सैटेलाइट कभी यह नहीं जान पाएगा कि भारत का यह रक्षा कवच अगली सुबह कहां तैनात होगा। यह गतिशीलता दुश्मन के हर हमले के प्लान को फेल कर देगी।
अमेरिका, रूस, इजरायल और फ्रांस जैसे देशों की कतार में अब भारत भी मजबूती से खड़ा है। सीकर हार्नेस जैसे जटिल पुर्जों का निर्माण भारत की अपनी इंडस्ट्री में होने से न केवल अरबों डॉलर की बचत होगी, बल्कि एक नई तकनीकी क्रांति भी आएगी। प्रोजेक्ट कुशा इस बात का प्रमाण है कि भारतीय इंजीनियर दुनिया की किसी भी तकनीक को मात देने का दम रखते हैं।
प्रोजेक्ट कुशा के साथ DRDO ने जो रफ्तार पकड़ी है, वह भारत की अखंडता को चुनौती देने वालों के लिए एक कड़ा संदेश है। आने वाले कुछ वर्षों में यह सिस्टम पूरी तरह तैनात हो जाएगा। अब भारत के आसमान में आंख उठाने से पहले किसी भी दुश्मन को सौ बार सोचना पड़ेगा। यह तकनीक और स्वदेशी जज्बा भारत को रक्षा के क्षेत्र में एक वैश्विक महाशक्ति बना रहा है।

